Tuesday, April 26

भीष्म साहनी का व्यक्तित्व - मन्नेन गंगय्या (हिंदी साहित्य के विविध रूप)

हिंदी साहित्य के विविध रूप


भीष्म साहनी का व्यक्तित्व 
            मन्नेन गंगय्या



जीवन परिचय

          हिन्दी साहित्य जगत के प्रगतिशील, चेतनासंपन्न, समाजाभिमुख साहित्यकार तथा अपने समकालीनों द्वारा हिन्दी कर्थासाहित्य के भीष्म पितामहकहलाने वाले भीष्म साहनी जी का जन्म 8 अगस्त, 1915 को रावलपिंडी (पाकिस्तान) के छाछीमुहल्ले के एक सम्भ्रान्त एवं सुशिक्षित  परिवार में हुआ था। उनके पिताजी श्री  हरबंसलाल  साहनी  एक अध्यवसायी (परिश्रमी) व्यापारी थे जो कट्टर आर्यसमाजी होते हुए भी सामाजिक कार्यों में बर्ढ़चढ़कर भाग लेते थे। भीष्म जी के शब्दों में – “मेरे बचपन के दिनों में घर के माहौल में कट्टरता थी बेशक़ लेकिन उग्र कट्टरता नहीं थी । पिताजी कट्टर आर्यसमाजी थे पर समाज सुधार में भी गहरी दिलचस्पी रखते थे ।आर्य समाज द्वारा संचालित अस्पताल,वनिता आश्रम,स्कूल,कॉलेज आदि में सकिय रूप से काम करते थे, जिसका असर एक तरह से अच्छा हुआ कि हम समाजोन्मुख  हुए ।1 उनकी माताजी श्रीमती लक्ष्मी देवी सीर्धी सादी,कोमल) दय, धर्म परायण तथा ज्ञानपिपासु महिला थीं । अपनी माताजी का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं – “मॉ धार्मिक वृत्ति की थीं, पर उनमें कट्टरता नहीं थी । वह मंदिर हो या गुरूद्वारा या आर्य समाज मंदिर, हर जगह पहुँच जाती थी । उन्हें स्कूल जाने का मौका नहीं मिला था, पर अपनी मेहनत से उन्होंने पढ़ी-लिख लिया था । उनकी जिज्ञासा कभी शान्त नहीं हो पाती थी, न ही ज्ञार्न विज्ञान की उनकी भूख। कभी उर्दू सीखने बैठ जाती, कभी अंग्रेज़ी । एक बार तो संस्कृत भी पढ़ने लगी थी । घर में जो सार्धु सन्त आता, उसी से शंका समाधान करने बैठ जाती ।2

          भीष्म जी के जीवन पर माता-पिता द्वारा दिए संस्कारों का गहरा प्रभाव था । इस विषय में असग़र वजाहत जी से हुए साक्षात्कार में वह कहते हैं – “माता-पिता द्वारा कहे ऐसे ढेरों वाक्य हैं, जो बार-बार  याद आते हैं, मसलन पिताजी कहा करते थे – “मुठ्ठीभर मिट्टी भी उठानी हो तो बड़े ढेर में से उठाना । मॉ कहा करती थीं – “थोड़ा लद्द सवेले आ (पंजाबी की कहावत है कि अपने गधे पर उतना ही सामान लादो कि उसे बेचकर जल्दी घर लौट सको ।”3

          साहनी  जी  सात  भार्ईबहनों  में  सबसे  छोटे  थे । उनकी  पॉच  बहनों  की  मृत्यु  के पश्चात परिवार में वह और उनके बड़े भाई (बलराज साहनी जो कि सिने जगत के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे) ही शेष रह गए थे । जहॉ एक ओर उनके मन में बहनों की याद सदा रही वहीं दूसरी ओर भाई के प्रति गहरा आदरभाव भी था । उनके परिवार में स्नेह, सादगी और आज्ञापालन को विशेष महत्त्व दिया जाता था तथा गाली देने वाला या टप्पे गाने वाला कठोर दण्ड का भागी होता था । इस संदर्भ में उनका कथन है कि पुत्रियों की मृत्यु के पश्चात माता की प्रवृत्ति थोड़ी निराशावादी हो गई थी जिसके कारण वे अक्सर बारहमासासुनाती  और  पिताजी  कोधित  हो  जाया  करते  तथा  उन्हें  डॉटते  और  समझाते  कि  ये निराशा के गीत हैं,बच्चों को अच्र्छे अच्छे,आशा के गीत सुनाने चाहिए । इनके कानों में वेदमंत्र पढ़ने चाहिए । तू विराग के गीत ले बैठती है। शाम के वक्त ये गीत गाओ तो बच्चों के दिल पर बुरा असर पड़ता है ।”4

          साहनी जी की प्रारंभिक शिक्षा हिन्दी और संस्कृत के माध्यम से घर पर ही आरम्भ हुई, इसके पश्चात वे अपने बड़े भाई के साथ गुरूकुल जाने लगे जहॉ वे अष्टाध्यायी के सूत्र कंठस्थ करते थे ।  गुरूकुल की पढ़ाई उनके पिताजी को सीमित सी लगने जगी इसलिए उन्होंने, उन्हें डी..वी. स्कूल भेज दिया जहॉ शिक्षा का माध्यम उर्दू था और पॉचवी कक्षा से अंग्रेज़ी का ज्ञान भी दिया जाता था । आपके घर में तीनों भाषाओं पंजाबी, हिन्दी और संस्कृत का बोलबाला था । अपनी इन्टर तक की शिक्षा आपने रावलपिंडी में पूरी की । इसके पश्चात आप लाहौर के सुप्रसिद्ध गवर्नमेंट कॉलेज़ डी..वी. इंटरमीडिएट कॉलेज में पढ़ने चले गए जहॉ से सन् 1937 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.. की उपाधि प्राप्त की । पंजाब विश्वविद्यालय  में  डॉ.इन्द्रनाथ मदान के निर्देशन में  हिन्दी  उपन्यास  में  नायक  की अवधारणा  विषय  पर  पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की, तथा थीसिस अंग्रेज़ी भाषा में ‘Concept of the Hero in Hindi Novel’ शीर्षक के अंतर्गत लिखीं ।

          एम.. करने  के  पश्चात  वह  सरकारी  अफसर  बनना  चाहते  थे,  इसलिए  उन्होंने अंग्रेज़ी विषय का चयन किया परन्तु गॉधी जी के विचारों से प्रभावित होकर तथा बड़े भाई (बलराज) द्वारा  पिता  के  व्यापार  से  अलग  होकर  किसी  अन्य  व्यवसाय  की  तलाश  में शांतिनिकेतनचले जाने के कारण उन्होंने सरकारी अफसर बनने का विचार त्याग दिया और पिताजी के व्यापार का कार्य भार अपने कंधों पर ले लिया । व्यवसाय करना उनकी विवशता थी,  इसलिए उनका मन इससे उचट गया और अपनी अंदर की उदासी व ऊब को दूर करने हेतु वह विकल्प खोजने लगे । व्यापार के सार्थसाथ डी..  वी. कॉलेज़रावलपिंडी में आनरेरी तौर पर अंग्रेज़ी पढा, ने के साथ-साथ नाटकों में अभिनय भी करने   लगे । इसके अतिरिक्त वह कॉग्रेस के कार्यों में भी हाथ बटाते रहे और इस प्रकार दस वर्षों (1937-47) तक इस अरूचिपूर्ण कार्य से जुड़े रहने के बाद वे देर्शविभाजन के कारण 13 अगस्त, 1947 में पाकिस्तान छोड़कर दिल्ली आ गए । व्यापार करने की विवशता के कारणों की चर्चा करते हुए वह कहते हैं – “व्यापार का तौक भी दस साल तक गले में लटका रहा । इससे निजात तब मिली,जब देश का बॅटवारा हो गया । तब मैंने सचमुच बड़ा आज़ाद महसूस किया । इसे पहले छोड़ नहीं सकता था, क्योंकि भाई एक बार घर से निकले तो लौटकर नहीं आए, और हम केवल दो ही भाई थे और हम दोनों ही माँ-बाप को छोड़कर घर से निकल जायें, यह सही नहीं लगता था । फिर व्यापार की घुटन नाटक खेलने, कॉग्रेस में काम करने और कॉलेज में पढ़ाने से बहुत कछु कम हो गई थी ।”5

          सन् 1950 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहे । उन्होंने अम्बाला के एक कॉलेज और खालसा कॉलेज अमृतसर में भी नौकरी   की । इसके अतिरिक्त उन्होंने पत्रकारिता और इण्डियन पीपुल्स थिएटर एशोसिएशन नाटक मंडली तथा जयंत देसाई की एक फिल्म की डबिंग द्वारा भी अर्थोपार्जन किया । सन् 1957 में भारत सरकार ने उनका चयन सोवियत संघ(मॉस्को) में अनुवादक रूप में किया । सात वर्ष पश्चात दिल्ली लौट आने पर वे पुनः अध्यापन कार्य से जुड़े तथा सन् 1965-67 तक नई कहानियॉका संपादन भी किया और सन् 1980 में अध्यापन कार्य से निवृत होकर स्वतन्त्र लेखन कार्य में जुटे रहे ।

          वह स्वतंत्रता संग्राम में भी सकिय रूप से भाग लेते रहे । उन्होंने हिन्र्दुमुस्लिम दंगे और अंग्रेज़ों की दमन नीति को अपनी चित्रात्मक शैली द्वारा प्रस्तुत कर सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलनको आगे बढ़ाया । आप प्रगतिशील लेखक महासंघऔर एफो एशियाई राइटर्ससे भी जुड़े रहे । विभाजन के पश्चात वे कई राहत समितियों के साथ काम करते रहे । 1946 में इप्टाके सम्पर्क में आने से उनके विचारों और कार्य शैली में व्यापक परिवर्तन हुआ और वह कांग्रेस से अलग होकर कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए।  इप्टा  के  अतिरिक्त  वह  आई। एस. सी. व्ही. एस.’  और  पी.डब्ल्यू..जैसी देशव्यापी आंदोलन संस्थाओं में समन्वित रूप से कार्य करते रहे तथा दिल्ली की नाट्र्यमंडली प्रयोग (हानूश, कबिरा खड़ा बाज़ार में और माधवी नामक नाटकों का मंचन करने वाली मंडली) के अध्यक्ष भी रहे थे।

          सन् 1943 में उनका विवाह श्रीमती शीलाजी से हुआ, जिन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में उनके अंदर के कलाकार को जगाए रखा । वह उनकी रचनाओं की प्रथम पाठिका और सलाहकार  थीं । भीष्म  जी के  शब्दों  में    यहॉ मेरी पत्नी की भूमिका बड़ी ठोस और प्रभावशाली रही । देश का बॅटवारा हो जाने के बाद एक तो हमारा परिवार उखड़ गया था, और बिखर गया था । दूसरे, उन दिनों जहॉ आर्थिक रूप से पैर जमाने की ज़रूरत थी, वहॉ मेरा ध्यान लेखन की ओर तथा वाम विचारधारा की ओर बड़ी प्रबलता से जाने लगा था । नौकरी तो मैंने की लेकिन उससे भी दो बार निकाल दिया गया । उस समय शीला ने सहारा दिया । हालॉकि मेरी वजह से उसे भी एक बार नौकरी से निकाल दिया गया । उसने स्वयं नौकरी भी की, दो बच्चों को भी पाला और लेखन कार्य में भी मेरा संबल बनी रहीं । इनकी अपनी रूचि संगीत और चित्रकला में थी और इसमें वह बड़ी उन्नति कर सकती थी, पर उसकी भी उसे कुर्बानी देनी पड़ी । पर  लेखन  के  क्षेत्र  में  मेरे  लिए  उसकी  सबसे सार्थक भूमिका इस बात में रही है कि वह मेरी रचनाओं पर अपनी दो टूक राय देती रही है, बिना किसी लार्ग लपेट के । ऐसा परामर्श किसी भी लेखक के लिए बड़ा सहायक होता है । वह मेरी रचनाओं की सबसे पहली पाठिका है और मेरे लिए सबसे बड़ा अवलंब । ”6 और 2 अगस्त, 1999 को वह चिर निद्रा में लीन हो गईं । उनसे बिछड़ने के दुःख व अकेलेपन को व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने मित्र गुरदयाल सिंह से कहा था  – “बस अचानक छोड़कर चले गएहुण बहुत कल्ला महसूस करदा वां। पर इस मौत अग्गे किसे दा कदी कोई बस नहीं चलदा । ए दुख ते बर्दाशत ही करना पैंदा ।”7  पत्नी की मृत्यु के पश्चात उन्होंने स्वयं को रचनात्मक कर्म में लीन कर दिया और सन 2002 में प्रकाशित उपन्यास नीलू नीलिमा नीलोफरको शीलाजी को समर्पित करते हुए समपर्ण में लिखा शीला के नाम, यह आखिरी जाम ।

निष्कर्षतः भीष्म जी सदा एक सच्चे साहित्यकार की भांति साहित्य विधा के प्रति समर्पित रहे और अपनी सेवाओं द्वारा हिन्दी साहित्य में अमूल्य योगदान दिया ।


मन्नेन गंगय्या

शोधार्थी हिन्दी विभाग,

आन्ध्रविश्वविद्यालय,

विशाखापट्टणम

आन्ध्रप्रदेश, भारत,

मो. 9000825670

ई-मेइलः gangayyanannana1984@gmail.com


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