Monday, April 25

अरुण कमल की कविताओं में पर्यावरण विमर्श - पार्वती भगवानराव देशपांडे (हिंदी साहित्य के विविध रूप)

 हिंदी साहित्य के विविध रूप






अरुण कमल की कविताओं में पर्यावरण विमर्श

पार्वती भगवानराव देशपांडे 


    अरुण कमल की कविताओं के सन्दर्भ में पर्यावरण हमारे लिए प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है जो हमे चारों ओर से घेरे हुयी है जिसमे हम जीवनयापन करते है| जिसपर मानव समाज निर्भर रहता है| प्रकृति और पुरुष एक दूसरे के पूरक है|प्रकृति के अभाव में मनुष्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती| भारतीय साहित्य में प्रकृति को शक्ति के रूप में माना गया है| प्राचीन साहित्य और मानव की जीवनशैली में प्रकृति विविध रूप और प्रकारों में उपस्थित रही है|साहित्य हो या मनोरंजन उसमे कहीं न कहीं प्रकृति विद्यमान रही है|कविता मानव की दुख-दर्द में जड़ीबूटी का काम करती है|सिनेमा के गीत हो या साहित्य की कविता हो प्रकृति का जिक्र यत्र - तत्र हुआ है|हिंदी साहित्य में छायावाद को महत्त्वपूर्ण स्थान है|सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति के सुकुमार कवि कहा जाता है|प्रकृति के उपादानों से कवियों ने कविता को रूपाकार दिया है | प्रकृति की ही गोद में ही मनुष्य अपने दुख को भूलकर सुख की अनुभूति करता है|प्रकृति हमेशा मानव को मानव की तरह रहने की सीख देती है|वह सबका समान रूप से स्वागत करती है| परन्तु विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का अत्याधिक शोषण हो रहा है|विकास की दौड़ में पर्यावरण को ध्यान में रखकर योजना की नियामन करने की अत्यंत आवश्यकता है| 

    समाज का वास्तविक चित्रण साहित्यकार अपने साहित्य में करने का हमेशा प्रयास करते है|समकालीन हिंदी कवियों ने पर्यावरण की ओर ध्यान देकर अपनी कविताओंको पर्यावरणीय स्वर दिया है|सुपरिचित कवीअरुण कमल ‘झरना‘ कविता में पर्यावरण के बारे में लिखते है - 

एक झड़ता है /एक उगता है /

 एक ही डालपर पुराणा रुक्ष पत्ता /और सटे हुए एक नयी पत्ती जलभरी /

 जैसे बाबा के हाथो में पोते की हथेली|1

     कवी आधुनिक समाज की विकास की दौड़ और समस्याओंसे चिंतित है|औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से जल,वायु, ध्वनि केप्रदूषण से वसुंधरा आक्रांत है|जनसंख्या का विस्फोट, भयानक विश्वयुद्ध, अतिव्यस्त जीवन में अनावश्यक चीजों का उपयोग हो रहा है, जिससे पर्यावरण का असंतुलन बढ़ रहा है|कवी ‘‘अपनी पीढ़ी के लिए‘‘ कविता में आधुनिक समाज का वास्तव चित्रण करते है-

 सब हमारे लिए /

 ईसा की बीसवीं शताब्दी की अंतिम पीढ़ी के लिए/

 वे सारे युद्ध तबाहियाँ /

 मेला उखड़ने के बाद का कचड़ा महामारियां/

 समुद्र में डूबता सबसे प्राचीन बंदरगाह /

 और टूट कर गिरता सर्वोच्य शिखर /

 सब हमारे लिए /

 पॉलीथिन थैलियों पर जीवित गौओ का/

 दूध हमारे लिए………………|2

     20 वी शताब्दी के अंतिम पीढ़ी को सन्देश देते है की मानव - मानव के लिए जो भी विकास के नाम कर रहा है वह वास्तव में विकास नहीं है|मूल्यों का पूरी तरह से र्हास हो गया है|नयी -पूरानी पीढ़ी में संघर्ष जारी है|सारे युद्ध तबाही मचा देते है|मानव मानव को ही मारता है इससे कहीं सालों तक मानवइसके दुष्परिणामों को सहता है , तो कही बीमारिँया बेगुनाह लोगों को शिकार बनाती है|पूर्वजों के संस्कार धराशायी हो जाते है|पालीथीन की थैलियों का दूध मासूम बच्चों का भोजन बन जाता है|प्राकृतिक सौन्दर्य नष्ट हो रहा है|गावों का सामान्य जन - जीवन महानगरों में जाने अनजाने व्यस्त हो गया है|

     वर्तमान समाज में पानी ज्वलंत समस्या बन गयी है|भारतवर्ष में कई नदियाँ सांस्कृतिक धरोहर है वह प्रदूषित हो रही है|चाहे आस्था के नाम पर या औद्योगिकीकरण पर जल प्रदूषण भयंकर समस्या का रूप धारण कर रहा है|स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक को पीने का शुद्ध जल भी खरीदना पड़ता है|जल ,जमीन व जंगल पर आधुनिकीकरण ने आक्रमण किया| इससे भूस्तर, भूजल प्रदूषित होकर नदी नालों में रीस रहा है|धरती के नाभि से निकलते पानी का वह स्त्रोत शुद्ध नहीं है|कवीझरना कविता में लिखते है -

 जीवन के आरंभ से लेकर आज अभी तक/

 धरती को जो रहा भिगोये /

 वहीं पुराणा जल यह अपना /

 पहली ही पहली बार हमने तुमने देखा झरना /

 झरते जल को देख हिला /

 अपने भीतर का भी जल|3

     गावों के प्राकृतिक सौंदर्य को धीरे -धीरे लुप्त होते देख कवि का ह्दय कराह उठता है|वह सभ्य मानव को खतरे की सुचना देते है|जिस गांव में बुजुर्ग दादा -दादी, माता -पिता बच्चों का सुन्दर जीवन एक ही घर के अंदर बीतता था मगर आज संयुक्त परिवार की जगह एक्कल परिवार ने लेने के कारण गावों की सुन्दर संस्कृति तहस- नहस हो रही है|इकीसवीं शताब्दी की ओर जानबूझ कर अनजाने या मजबूरन बढ़ रही अमानवीयता का चित्रणकवी ने इस तरह किया है -

 हर नदी का घाट स्मशान

 हर बगीचा कब्रिस्तान बन रहा है

 और हम इकीसवीं शताब्दी की ओर जा रहे है| 4

     पर्यावरण के असंतुलन से गावों की संस्कृति के पुराने चिन्ह पल प्रतिफल अप्रत्यक्ष हो जा रहे है और उस जगह पर बहुमंजिले मकान बनवाये जा रहे है|कवी को वह पीपल का पेड़, जमींन का वह खली टुकड़ा नजर नहीं आ रहा है उन्हें ऐसा आभास हो रहा है कि वे किसी ओर जगह आ गए है|

 इस नए बसते इलाकों में

 जहाँ रोज बन रहे नए -नए मकान

 मै अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ|

……………………………………………………..

यहाँ स्मृति का कोई भरोसा नहीं|5

     भागीरथी गंगा भारत के प्रत्येक व्यक्ति के लिए माँ है|गंगा सांस्कृतिक विरासत का चिन्ह है|लेकिन आज इसकी स्थिति अत्यंत नाजुक है|‘‘गंगा को प्यार‘‘ शीर्षक कविता के माध्यम से कवी इस श्रेष्ट नदी के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की है|

 असंभव

 असंभव है सोचना

 जिनकी मिट्टी गंगा - पानी सेगुंथींहै

 उनके के लिए असंभव है सोचना कि एकदिन

 गंगा के ऊपर उड़ता हुआ पक्षी

 विष कि दाह सेझुलसजायेगा

 कि एक दिन गंगा

 नहीं रहेगी और फिर गंगा……………

 वे रख जाए है गंगा के द्वार पर विषपात्र

 षड़यंत्र

 गंगा के साथ षड़यंत्र

 हिमालय के साथ

 पृथ्वी नक्षत्र समस्त मंडल के साथ|6

     कवि गंगा के किनारे बैठ देख रहे है कि जलकी सतह को लगभग छाती से छूता पक्षी निशब्द वापस मुड़ता है और जल पीने उतरी गाय के नथुनों के नीचे गंगा हिल गयी है|गंगा कि यह दूःस्थिति देख कवि आगे कहते है - जिसकी मृदा गंगा पानी से गुंथी है उनके लिए यह सोचना असंभव है कि एकदिन गंगा के ऊपर उड़ता हुआ पक्षी विष कि दाह से झुलस जायेगा और एकदिन गंगा का अस्तित्त्वहीमीट जायेगा| पानीका अभाव वायु प्रदूषण बढ़ती गर्मी, पिघलती बर्फ समाज का हीनहीं बल्कि प्रकृति का संकट भी विस्फोटक रूप लेता जा रहाहै|आज व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु गंगा, हिमालय, पृथ्वी और समस्त नक्षत्र मंडल के साथ षड़यंत्र चला रहा है|

     प्रकृति और पर्यावरण पर मनुष्य का जितना अधिकार है उतना अन्य सभी प्राणीवर्ग का भी है|लेकिन वर्तमान मानव ने दूसरे पशुपक्षियों एवं वृक्षलताओ का ख्याल न रखते हुए धरती और पर्यावरण पर अपना अधिकार जमाता जा रहा है|फलस्वरूप उसके जीवन सेसुख-शांति दूर हो जा रहा है|अरुण कमल जी का ‘‘वृद्धतांत्रिक ‘कहता है -

 वास्तुशांति नहीं हैदेवी

…………………………………………..

 जहाँ तुम्हारा शयन कक्ष है वही

 ठीक उसके नीचे याद करो

 कोई वृक्ष था जामुन का

 नींव पड़ने के पहले

 छोटी गुठली वालेकाले जामुनों का वृक्ष

 वही वृक्षतुम्हें हिला रहा है

 एक पक्षी अभी भी ढूँढता हैवही अपना नीड़

वे चींटिंयाँ खोजती हैअपनावाल्मीक

इस ब्रह्माण्ड में सबका अधिकार है देवी|7

     कवी कहते है -वास्तुशांति यह सब कुछ नहीं होता| जिसनींवपरजो ईमारत खड़ी है, कुछ वर्ष पहले वहाँ एक जामुन का पेड़ था और तुम्हे जो अशांति महसूस हो रही है वहकिसी वास्तुशांति का दोष नहीं है बल्कि वह पेड़ तुम्हे हिला रहा है|जो पक्षी ईमारत के आसपास चक्कर लगा रही है वह उस पेड़ को ढूंढ रही है जो उसका निवास स्थान था| ईश्वर ने सभी के लिए समान रूप से इस पर्यावरण की निर्मित्ति की है लेकिन वर्तमान मानव अपने स्वार्थ हेतु पर्यावरण पर अपना अधिकार जमाना चाहता है लेकिन उसे इस कुकृत्य के लिए शांति कभीनहीं मिलेगी|

     भोग की अति प्रवृत्ति ही प्रकृति का दोहन करती है |आज वर्तमान व्यक्ति इतना स्वार्थी बन चूका है कि अपने बुद्धि से प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहता है|परिणाम स्वरुप प्रकृति नष्ट होती जा रही है|पर्यावरण का संतुलन बनाये रखना तथा उसे प्रदूषित होने से बचाना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी हैऔर सामाजिक कर्त्तव्य भी|हमें अपनी सुरक्षा व भावी पीढ़ी के भविष्य के लिए यह सामाजिक दायित्त्वनिभाना होगा, चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनी तरफ से कोई भी अनावश्यक प्रदुषण ना करे| प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए और अधिक से अधिक लोगों को पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागरूक करने का प्रयास करें|

 

सन्दर्भ सूची

झरना, अपनी केवल धार, अरुण कमल पृष्ट संख्या 46

2 अपनी पीढ़ी के लिए, पुतली मै संसार, अरुण कमल पृष्ट संख्या 45

3 झरना, अपनी केवल धार, अरुण कमल पृष्ट संख्या 46

4 इक्कीसवी शताब्दी की ओर, सबूत, अरुण कमल पृष्ट संख्या 76

5 नए इलाके मे, नए इलाके मे, अरुण कमल पृष्ट संख्या 13

6 गंगा को प्यार, अपनी केवल धार अरुण कमल पृष्ट संख्या 63

7 सुख, नए इलाके मे, अरुण कमल पृष्ट संख्या 60

 



पार्वती भगवानराव देशपांडे

पीएच. डी शोधार्थी 

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,

खैरताबाद

 98499 49440

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