Wednesday, April 27

उदय प्रकाश की कहानियों का सृजनात्मक पक्ष - उषा कुमारी (हिंदी साहित्य के विविध रूप)

 हिंदी साहित्य के विविध रूप


उदय प्रकाश  की कहानियों का सृजनात्मक पक्ष
            - उषा कुमारी 


    उदय प्रकाश हिंदी के महत्वपूर्ण कवि के साथ-साथ अप्रतिम कथाकार भी है |  एक कहानीकार के रूप में वह इतने प्रसिद्ध हुए है कि उनके द्वारा लिखी गई दूसरी रचनाओं की अनदेखी तक हुई है | उदय प्रकाश कहानीकार के नाते भाषा, वस्तु, प्रविधि और समूची संरचना में हेर- फेर करके जो कहानियां निर्मित करते हैं उनकी हिंदी में स्पष्टत: कोई परंपरा नहीं है | यह उनकी प्रतिभा की आत्मीयता का और उनकी यथार्थ को भेदने वाली अंतर्यामी दृष्टि का पराक्रम है कि वे ऐसी कहानियों की रचना कर पाए | जिसके कारण किसी दूसरे साहित्यकार तथा कहानीकार को ईर्ष्या होना संभावित ही है| 

    उदय प्रकाश जी की लेखन परंपरा एक यात्रा के रूप में दृष्टिगोचर होती है | उन्होंने अपने समाज, समय और परिवेश के अनुरूप ही कहानियों की रचना की है | अपनी खुली आंखों से राजनीतिक, सामाजिक, साहित्य, षड्यंत्र के बीच आम आदमी की वर्तमान समाज से जूझने वाली परिस्थितियों को महसूस करते हैं तथा अपने अनुभव के आधार पर खुलकर अभिव्यक्ति करने का साहस भी रखते है | उनकी कहानियां अपने समय, समाज के विभिन्न बिंदुओं को केंद्र बनाती है | भूमंडलीकरण से उपजी उपभोक्ता, संस्कृति और बाजारवाद के साथ-साथ सांस्कृतिक विमर्श चेतना को लेकर बहस करने वाले साहित्य-कारों में उदय प्रकाश का नाम अग्रणी है | उनकी कहानियां इन विमर्श के भीतर अपनी जगह बनाती है और एक नैतिक संकल्प की सैद्धांतिकी निर्मित करती हैं | अपने इस प्रयास में वे कई बार अकेले पड़ जाते हैं और ऐसे लेखकों की यह नियति भी देखने को मिलती है कि वे किसी भीड़ का हिस्सा नहीं बन पाते | उनकी कहानियों में कहानी शीर्षक, पात्रों का नामकरण, कहानी का आरंभ और अंत, कहानी में अकारगत प्रयोग तथा कहानी के उद्देश्य आदि में नयापन परिलक्षित होता हैं |


कहानी शीर्षक

  उदय प्रकाश की कहानियों में शीर्षक का चयन पात्रों के आधार पर,  प्रतीकों के रूप में, पशु- पक्षियों के नाम पर, घटना तथा स्थान के आधार पर हुआ है | जैसे- दरियाई घोड़ा, जंगली छिपकली (तिरिछ), दादाजी ,मौसाजी, पीली छतरी वाली लड़की, पॉल गोमरा का स्कूटर, और अंत में प्रार्थना, मोहनदास और मैंगोसिल आदि |

    उदय प्रकाश जी ने अपनी कहानियों के शीर्षक का चयन परंपरा और नवीनता दोनों के आवश्यकता अनुसार किया है | कहानी के मुख्य पात्र, घटना के आधार पर कहानी का नामकरण तो प्रेमचंद युग से ही प्रचलित रहा है |  उनकी कहानियों के शीर्षक व्यक्तिवाचक, मुख्य पात्रों के आधार पर, नाम पर, जीव- जंतुओं के आधार पर, रोगों के नाम पर, वस्तुओं के नाम पर आदि विषयों को केंद्र बनाकर शीर्षक का चयन किया है |

 उदय प्रकाश  की कहानियों में शीर्षक हम इस प्रकार से समझ सकते हैं-

  कथ्य को या कथावस्तु को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए अच्छी कहानी के साथ- साथ उसके शीर्षक की सार्थकता का उपयोग भी रहता है | उदय प्रकाश द्वारा लिखित पहला  कहानी संग्रह ‘दरियाई- घोड़ा’ है | इस संग्रह में लगभग सात कहानियां है | ‘दरियाई घोड़ा’ संग्रह की पहली कहानी है ‘ मूंगा धागा और आम का बौर ‘ यह कहानी परिवार की आत्मीयता को प्रकट करती है | इस कहानी में मां धागा है तथा बच्चे मूंगे हैं  | “अगर मां होती  तब भी क्या घर में ऐसा सन्नाटा होता | तब भी क्या हम इतने ही अलग-अलग होते | एक बहुत  घिसा -पिटा वाक्य याद आ रहा था सब लोग धागा टूटते ही मूंगों की तरह अलग-अलग छिटक गये | हम मूंगे थे | माँ धागा थीं | जो टूट गयी |”१

  इस संग्रह की दूसरी कहानी ‘दरियाई घोड़ा’ है | इस कहानी के नाम पर ही कहानी संग्रह का नामकरण हुआ है |  इस कहानी में भी पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता पर प्रकाश डालने का लेखक ने प्रयास किया है | कहानी में पिताजी कैंसर की बीमारी के कारण अस्पताल में होते हैं | उनके मुंह के कैंसर का ऑपरेशन हुआ था | उनके मुंह को देखकर लड़का अपने पिताजी के बारे में यह सोचता है कि –“ दादा दरियाई घोड़ा थे | .....उनका चेहरा काला हुआ , पूंछ  उगी और लंगूर की तरह वे मुंडेर के पार कूद गये......|”२

    उदय प्रकाश जी द्वारा रचित दूसरा कहानी संग्रह ' तिरिछ' है | इस संग्रह में कुल 9 कहानियां है | इस संग्रह की पहली कहानी ‘नेल कटर’ है जो पारिवारिक संदेश देती है | इस कहानी के माध्यम से मां और बेटे के मध्य का अटूट प्रेम दर्शाया गया है | मां को अस्पताल से घर लाया गया और दक्षिण की ओर कमरे में रखा गया | मां ने बालक के सामने हथेली फैला दी | तब वह समझ चुका था कि “ दायें हाथ की सबसे छोटी  उँगली की बगल वाली उँगली का नाखून एक जगह से उखड़ गया था | उससे उन्हें बेचैनी होती रही होगी |  इस उँगली को सूर्य की उँगली कहते है | मैं समझ गया और नेलकटर लाकर माँ के पलँग  के निचे फर्श  पर बैठ गया |”३ माँ का तो स्वर्गवास हो जाता है किन्तु अंत समय में जो नेलकटर से बालक की भावना जुड़ जाति है  | उसी आधार पर इस कहानी का नामकरण ‘नेलकटर’ पड़ा |

    इस संग्रह की सबसे लोकप्रिय कहानी ‘तिरिछ’  है | इस कहानी के आधार पर ही कहानी संग्रह का नामकरण लेखक ने किया है | तिरिछ नाम एक जंगली छिपकली के लिए कहानी में प्रयुक्त हुआ है | कहानी में बालक अपने पिताजी के बारे में उनके व्यक्तित्व तथा वर्तमान समाज के परिस्थितियों का सामना करते हुए किस प्रकार अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया है और अंत तक परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते अपने प्राणों को त्याग दिया है इस विषय पर बाल मनोवैज्ञानिक विधि से लेखक में प्रकाश डालने का प्रयास किया है | उदय प्रकाश जी ने जंगली छिपकली के नाम पर ही कहानी शीर्षक रखा है | नैरेटर के कथनानुसार-" लेकिन उस दिन शाम को, पिताजी बाहर से टहल कर आए तो उनके  टखने में पट्टी बंधी थी | थोड़ी देर में गांव के कई लोग वहां आ गए | पता चला पिताजी को जंगल में तिरिछ ( विष खापर , एक जहरीला लिजर्ड ) ने काट लिया है |"४ उदय प्रकाश जी ने अपनी कहानियों के शीर्षक का चयन बहुत ही सोच विचार करके किया है  | उनके कहानी शीर्षक बहुत ही संदर्भ अनुसार जान पड़ते हैं |

    तीसरा कहानी संग्रह उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित ' और अंत में प्रार्थना 'है | इस संग्रह में उन्नीस कहानियां है | चार कहानियां आत्मकथाएं पद्धति पर आधारित है | तेरह कहानियां छोटे-छोटे किस्सों में किस्सगोई शैली में है लिखी गई हैं | तथा अंत में दो कहानियां अत्यंत यह लंबी कहानी के रूप में प्रतीत होती हैं | इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी और अंत में प्रार्थना है | इस कहानी का नायक डॉक्टर वाकणकर है| जो मूलतः एक मानवतावादी व्यक्ति है | उनका यह मानवतावाद काफी विवेक संपन्न और पूर्वाग्रह- मुक्त है | वे एक इमानदार डॉक्टर है और अपना कार्य अत्यंत ही निष्ठा से संपन्न करने में निपुण है | वे एक संघ से भी जुड़े हैं| संघ की सेवा में हमेशा तत्पर रहते हैं | उनके परिवार में पत्नी के अलावा चार बेटियां हैं |  " सभी का नाम उन्होंने अपनी पसंद से रखा है: पूजा, उपासना, प्रार्थना और तपस्या|"५ वह एक धार्मिक व्यक्ति तथा आस्थावादी थे यह उक्त नामकरण से ही सिद्ध हो जाता है | उनकी ईमानदारी के कारण उनका कई बार तबादला कर दिया जाता है | उनके इस व्यवहार से पत्नी भी चिंतित रहती हैं | उनके जीवन में अनेक घटनाएं घटित होती हैं | जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करने के कारण अंत में उन्हें इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती कराना पड़ता है | कहानी शीर्षक अपनी सार्थकता को दर्शाने में सफल जान पड़ता है |

    उदय प्रकाश द्वारा लिखित  चौथा कहानी  संग्रह ‘दत्तात्रेय के दुख’ नाम से लिखा है | इस संग्रह में दत्तात्रेय नामक पात्र को लेकर तेरह छोटी-छोटी कहानियों को लिखा गया है इसके अतिरिक्त इन कहानियां  में तीन लंबी  कहानियाँ है | संग्रह में कुल सोलह कहानियां है | 

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित पांचवा कहानी संग्रह है ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’| इस संग्रह में कोई चार कहानियां है |  इस संग्रह की सबसे चर्चित कहानी ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ है | इस कहानी के नाम पर ही कहानी संग्रह का नाम पड़ा है | इस कहानी में मुख्य पात्र है रामगोपाल सक्सेना | नायक को अपने जीवन में दो  चीजों का फैसला करना था | पहला तो वे स्वयं का नाम बदलना चाहते है  क्योंकि आधुनिक समाज के अनुरूप उनका नाम नहीं है | इसीलिए उसे बदलकर अपना नाम रामगोपाल से ‘पॉल गोमरा’ रख लेते हैं | दूसरी चीज स्कूटर लेना  होता है | क्योंकि बस से सफर करने में उनका चार- पांच घंटा प्रतिदिन व्यर्थ होता है | इस कारण उन्होंने लोन लेकर स्कूटर भी खरीद ली, चलाना तो उन्हें आता ना था | आधुनिक  उपभोक्तावाद का शिकार पॉल गोमरा  अपने आप को समाज के अनुरूप बनाने के प्रयास में निरंतर लगा रहता है | अंततः स्कूटर का एक्सीडेंट हो जाता है और  पॉल गोमरा दिमागी रूप से पागल हो जाते हैं | इस प्रकार ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ कहानी शीर्षक युक्त जान पड़ता है | 

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित ' पीली छतरी वाली लड़की' कहानी संग्रह छठा कहानी संग्रह है | आधुनिक समाज की विश्वविद्यालयीन स्थिति और उसमें प्रशासन व्यवस्था जो कि राजनीतिक क्षेत्र से प्रभावित है, इसका विस्तार से विवेचन किया गया है | कहानी के मुख्य पृष्ठ पर जो चित्र है उसकी रचना स्वयं उदय उदय प्रकाश जी द्वारा की गई है | कहानी में चित्रित चित्रों का श्रेय पूर्णतया उदय प्रकाश जी को ही जाता है | कहानी शीर्षक ' पीली छतरी वाली लड़की' दिखने में लंबी कहानी है | शीर्षक देने के पीछे लेखक का उद्देश्य कहानी के प्रति पाठकों में  उत्सुकता तथा रुचि पैदा करना है |

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित सातवा कहानी संग्रह ‘ मोहनदास’ है | इस कहानी का नायक मोहनदास है | यह कहानी वास्तविक जीवन पर आधारित है | उदय प्रकाश जी के संबंध में शंभू गुप्त के विचार इस प्रकार हैं-" उदय प्रकाश की कहानियों के अध्ययन की सबसे पहली और बड़ी समस्या यह है कि वे हमारे अब तक के अधिकांश अध्ययनास्वाद, पाठकीय संस्कार और आलोचना की कसौटी को अपर्याप्त सिद्ध कर देती है | वे हमें एक भिन्न और उत्तेजक कथा -संसार में ले जाती है जहां न केवल कहानी का स्वरूप बदला हुआ है बल्कि उसकी संवेदना भी काफी कुछ नयी है |”६ इस कहानी के संबंध में अनेक विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत हैं | जो इस कहानी की लोकप्रियता को दर्शाते हैं | इस कहानी के मुख्य पात्र मोहनदास के जीवन के विषय परिस्थिति, जानलेवा त्रासदी, किसी भी संवेदनशील पाठक को झकझोर सकने में सक्षम है |

    प्रकाश जी द्वारा लिखित आठवां कहानी संग्रह का नाम है ‘मैंगोसिल’ | इस संग्रह के अंतर्गत तीन लंबी कहानियों का संग्रह किया गया है | लेखक ने कहानी में मैंगोसिल नामक रोग का वर्णन किया है | इस प्रकार कहानी में मैंगोसिल नामक रोग का विस्तार से वर्णन देखने को मिलता है |

  उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित अंतिम कहानी संग्रह का नाम ‘अरेबा- परेबा’ है | इस संग्रह में संकलित कहानियों की चर्चा पूर्व संग्रह में ही हो चुकी है |

कहानी का आरंभ और अंत 

    उदय प्रकाश जी अपनी कहानियों का आरंभ और अंत दोनों को प्रभावशाली ढंग से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने में सक्षम रहे हैं | कहानी में प्रयोग की कई संभावनाएं हैं | किंतु इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता की कहानी एक घुड़दौड़ के समान है होती है, जिसका आरंभ और अंत विशेष महत्वपूर्ण स्थान रखता है | 

    उदय प्रकाश जी ने अपनी कहानियों के आरंभ के लिए कई प्रयोग किए हैं | पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने हेतु उन्होंने आरंभिक अनुच्छेद विशेष रोचक व चित्रात्मक बनाने का प्रयास किया है | आरंभ में हिंदी साहित्य में हिंदी कहानी वर्णन प्रधान होती थी, तब इसका आरंभ स्थान विशेष के सूक्ष्म विवरणों अथवा प्रवृत्ति-चित्रण से होता था | बाद में नई कहानी के दौर में इस संदर्भ में अनेक प्रयोग किए गए |

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित पहला कहानी संग्रह ‘दरियाई घोड़ा’ है | इस संग्रह की अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी दरियाई घोड़ा है | इस कहानी के आधार पर संग्रह का नाम रखा गया | कहानी का आरंभ लेखक ने अत्यंत रोचक ढंग से किया है |"अंधेरा ही दादा की आंखों में रहा होगा | वे किसी भी चीज को देखते नहीं लग रहे थे | सारी चीजें जैसे पारदर्शी हो गई हो......... अपना अस्तित्व उन्होंने खो दिया हो और दादा की आंखें जैसे उनके पार कहीं अटक गयी हो | ऐसे अंधेरे में कई- कई रंगों के गुब्बारे तैरते  हैं.......... ज्यामितियाँ और आकृतियां बनती है | फिर भी सब नष्ट हो जाती है |"७ कहानी में लेखक ने पिता और बेटे के मध्य के संबंध को दर्शाने का प्रयास किया है | बेटा किशोरावस्था में है और उसे यह सोचकर गर्व होता है कि उसने अपने कैंसर पीड़ित पिता को रक्तदान दिया है | पिता अस्पताल में ही बेड पर पड़े है | पिताजी को अस्पताल में ही कई प्रकार की समस्याओं से संबंधित बातों का सामना करना पड़ता है | लड़का जब पिताजी को उसी हालत में अस्पताल छोड़कर प्लेटफार्म पर रेल पकड़ने आता है | तब उसे याद आता है कि -“दादा के नाखून बहुत बढ़ गए थे और उन में मैल भरा हुआ था | मैंने अपने मुंह के दोनों छोरों पर उंगलियां फँसायी और खींचा और मेरा जबड़ा फैल गया | दरियाई घोड़े की तरह | मैं फूट-फूट कर रो रहा था ,प्लेटफार्म पर | भीड़ के बीच तमाशा था मैं |"८

    तिरिछ कहानी संग्रह के अंतर्गत ‘छप्पन तोले का करधन’ कहानी में लेखक ने समाज में स्थित परिवार की स्थिति तथा लोगों की मनोदशा का मार्मिक वर्णन किया है | कहानी का आरंभ लेखक ने प्रतीकों के माध्यम से किया है | " रात घर में अंधेरा बहुत होता था | दूसरे घरों से कहीं बहुत ज्यादा और गाढा | दीवारें पूरी तरह उसमें डूब जाती | हवा बहुत भारी और घनत्व वाली हो जाती, जिसमें कई तरह की गंद घुली होती| "९ कहानी में बूढ़ी दादी है जिसके पास एक छप्पन तोले का करधन है | परिवार अत्यंत गरीबी से गुजर रहा होता है | सभी को यही लगता है कि यदि दादी करधन दे दे तो घर की समस्याओं का समाधान हो सकता है | करधन के कारण दादी को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है | उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है | समाज की यथार्थता तथा स्वार्थपरता का सुंदर चित्रण कहानी में देखने को मिलता है | कहानी का अंत कुछ इस प्रकार से होता है-" थोड़ी देर बाद काली बिल्ली पूरे घर में घूमने लगी | अम्मा और बुआ के रोने के साथ बीच-बीच में भी विलाप करने लगती थी|"१० दादी की मृत्यु हो जाती है परंतु करधन की खोज जारी रहती है |

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित अत्यंत चर्चित और महत्वपूर्ण कहानी है ‘मोहनदास’ | मोहन दास नामक व्यक्ति समाज में अपने व्यक्तित्व की पहचान के लिए सारा जीवन लड़ता रहता है| और जब वह उसे प्राप्त हो जाता है तो उस पहचान से पीछा छुड़ाने के लिए वह संघर्ष कर रहा होता है | सामाजिक प्रशासन व्यवस्था की बर्बरता और उसकी यथार्थता को सभी के समक्ष प्रस्तुत करने में कहानी ने सफलता प्राप्त की है | सामाजिक यथार्थ के विषय में ललित कार्तिकेय जी का कथन इस प्रकार है-" किंतु प्रश्न यह है कि सामाजिक यथार्थ के सृजनात्मक व्यवहार का नया प्रयोग सामाजिक यथार्थ के रचनाकार के नये , गुणात्मक संबंध का सूचक है अथवा यथार्थ को साध पाने की अक्षमता में अंदाज और अंदाज़ेबयां मात्र से किया गया नया व्यवहार या फिर नये संबंध के पर्याप्त विकसित न हो पाने की स्थिति में दोनों का सम्मिश्रण ?"११

    ‘मैंगोसिल’ कहानी का आरंभ लेखक ने कुछ इस प्रकार से किया है- " प्रलय का प्राक्कथन के अंतर्गत यह किस्सा चंद्रकांत थोराट का है | और मेरा भी है | और यह किस्सा अभी का है | इसी समय का है | अभी हाल-फिलहाल की तारीखों का | इसमें कुछ ऐसे पात्र हैं, जो अपने दिक् और काल के बाहर फेंक दिए गए हैं और अब वे किसी प्रलय की प्रतीक्षा में है | मैं भी उन्हीं कुछ ऐसे पात्रों में से एक हूं, जो अपने दिक और काल के बाहर, किसी मलिन बस्ती में, नगर सभ्यता से दूर रहते हैं | अलग-अलग सत्ताओं द्वारा अधिग्रहित कर ली गई धरती पर, किसी उपनगर में जीवन बिताने की चेष्टाएँ  भी, किसी एक अभागे दिन, किसी टाउन प्लानर, दलाल या किसी कॉलोनाइजर के नक्शे में दिखाई दे जाती है |"१२ कहानी में मुख्य पात्र सूर्यकांत है जो चंद्रकांत का बेटा है | उसे एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर की तुलना में सिर का आकर बढ़ता ही जाता है | इस बीमारी को मैंगोसिल नाम दिया गया है | बालक सूर्यकांत सामान्य बालक की भांति अपना जीवन यापन करने में असमर्थ होता है | वह अत्यंत ही समझदार एवं भावुक व्यक्तित्व वाला बालक है | छोटे भाई के प्रति मां-बाप का प्रेम और उसके प्रति उदासीनता ने सूर्यकांत को अत्यंत ही निराश किया | अंत में वह अपने जीवन का अंत कर लेता है | लेखक ने इस समस्या से जूझ रहे बच्चों का आंकड़ा भी बताया है | कहानी के अंत में वे इसकी सूचना देते हैं-" पेंटागन के मुताबिक इस समस्या के सभी देशों की सभी सरकारों को इन बड़े सिर वाले बच्चों पर निगाह रखनी होगी | उनकी आईडेंटिटी यह है कि- " वे गरीब घरों में गंदगी और कुपोषण के बीच पैदा हुए हैं | उनकी आंखें चीटियों की तरह लाल है | और उन्हें नींद नहीं आती |...... और शायद वे सब कुछ जानते हैं !! "१३

पत्रों का नामकरण 

    उदय प्रकाश जी ने अपने कहानी संग्रह में कहानी के अंतर्गत पात्रों का नामकरण विशेष रूप से और विभिन्न प्रकार से करने का प्रयत्न किया है | पत्रों के नामकरण की दृष्टि से भी समकालीन कहानियों में विशेष रुप से लेखकों ने कई प्रकार के प्रयोग किए हैं | यह प्रयोग आकर्षक समयानुसार महत्वपूर्ण भी जान पड़ते हैं | कहानी में पात्रों के नामकरण के अंतर्गत व्यक्तिवाचक नाम, भाववाचक संज्ञा तथा संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग दृष्टिगोचर होने लगा है | कहानी में लेखक ने ' मैं ',' हम', तथा ' तुम ' से लेकर ' वह ' तथा ' वे ' के चर्चा कहानी के अंतर्गत करते हुए पाए जाते हैं | आज के आधुनिक कहानियों में इन सर्वनाम शब्दों मैं, हम, तुम तथा वे शब्दों की चर्चा कहानियों में देखने को मिलती है | इस संदर्भ में डॉ. अशोक भाटिया जी का कथन देखने को मिलता है | पात्रों के नामकरण के संदर्भ में भाटिया जी इस प्रकार अपने विचार प्रस्तुत करते हैं- " महिला लेखिकाएं आठवें दशक हिंदी कहानी में जिस त्वरा के साथ प्रविष्ट होती हैं , उसी त्वरा के साथ ही  ‘ मैं ' पात्र का आगमन समकालीन कहानी में होता है | किंतु अधिकांश महिला कहानीकार कहानीकारों का लेखन स्त्रेंण कोटी का होता है | इस कारण इनके ' मैं ' पात्र भाव- विभोर, भावाकुल होते , गिरते- पडते अपनी कहानियां कहते रहे , कोई पृथक पहचान वे नहीं बना पाए |"१४ 

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित पहला कहानी संग्रह ‘दरियाई घोड़ा' | इस संग्रह में कुल सात कहानियां है | पहली कहानी ' मूंगा, धागा और आम का बौर ' है | प्रस्तुत कहानी में पात्रों का नामकरण इस प्रकार से देखने को मिलता है –‘ बालक ‘ जो कि स्वयं कहानी कह रहा है| पिताजी, नीता, मां और मैं आदि पात्र हैं | कहानी मानवीय संवेदना और लगाव को लेकर लिखी गई है | इस कहानी में मैं, पिताजी ,दीदी, नीता, और भाई सभी मूंगे थे और ‘मां’ धागा थी |

    उदय प्रकाश ने अपनी कहानियों के पात्रों का नामकरण भाववाचक संज्ञा मैं दिया गया है | कहीं-कहीं तो पात्रों के नामकरण रेखागणित और बीजगणित की प्रणाली पर हुआ है- ज्ञ,जेड अलिफ, जगपति और कर्फ्यू रखा है | कहानी में पात्रों के नामकरण इस प्रकार से हैं- ज्ञ, जेड, अलिफ और जगपति तथा डॉक्टर, नर्स और श्रीमती नीना तिलक आदि | 

    इस संग्रह की अंतिम कहानी ' टेपचू' | ‘टेपचू’ कहानी का नामकरण कि उसके शारीरिक विशेषताओं के आधार पर हुआ है | टेपचू एक संघर्षशील प्राणी है | जिसने जीवन में बहुत अधिक संघर्ष किया था | कहानी के मुख्य पात्रों में अब्बी, फिरोजा, टेपचू, परमे सुरा , किशनपाल सिंह, पटवारी, मदन सिंह, पंडिताइन , दरोगा करीम बख्श, सिपाही, गजाधर शर्मा आदि | 

    ‘तिरिछ’ कहानी संग्रह के सबसे प्रसिद्ध कहानी है | कहानी का मुख्य पात्र पिताजी है| कहानी में पिताजी, थाना, पंडित राम औतार, बैंक कर्मचारी, एस. एच. ओ, राघवेंद्र प्रताप सिंह, राम स्वारथ प्रसाद, सतनाम सिंह ,पुलिस तथा ‘मैं’ है |

    ‘ और अंत में प्रार्थना’ कहानी के मुख्य पात्र हैं- डॉ. दिनेश मनोहर वाकणकर, उनकी पत्नी ज्योत्स्ना, चार बेटियां, नितिन प्रताप सिंह, थूकरा महाराज, हरवंश पंडित, सिस्टर पोन्नम्मा, डॉक्टर सुरेश गुप्ता, प्रधानमंत्री, कलेक्टर, श्री.एन.एस. खरे, आई.ए.एस, पटवारी, जिलाधीश एन .एस. खरे, एस. पी. डबराल, तथा इंस्पेक्टर आदि हैं | लेखक के अनुसार वाकणकर को छोड़कर सारे पात्र काल्पनिक हैं |


कहानी में आकरगत प्रयोग

    उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित कहानियां हमें 9 संग्रहों में प्राप्त होती हैं | उनके द्वारा लिखित प्रत्येक संग्रह में, छोटी, लंबी किस्से प्रकार की कई कहानियां देखने को मिलती है | समकालीन कहानी में कई लंबी कहानियां लिखी गई है | ‘नई कहानी’ के दौर में ‘राजा निरबंसिया’ जैसी लंबी कहानियां लिखी है | यद्यपि आठवें-नवें दशक में तो ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ और ‘धर्म-युग’ आदि पत्रिकाओं में धारावाहिक रूप से लंबी कहानियां निरंतर प्रकाशित की गई हैं | लंबी कहानियों की यह परंपरा आज भी प्रचलित है | ‘सारिका’ में भी सभी प्रतिष्ठित कहानीकारों की लंबी कहानियों की सीरीज प्रकाशित की गई | इस प्रकार इस प्रकार आधुनिक समय में भी अनेक लेखकों ने इस पद्धति का अनुसरण किया है | उनमें उदय प्रकाश जी ने भी एक प्रकार से लंबी कहानियों की संरचना की है | उनके द्वारा लिखित कहानियों को अध्ययन की सुविधा हेतु इस प्रकार से विभाजित किया जा सकता है-

१. लघु कहानियाँ

२. लंबी कहानियाँ

३. औपन्यासिक कहानियाँ | 


लघु कहानियाँ

    उदय प्रकाश जी ने अत्यंत लघु कहानियों की रचना की है | इन कहानियों में हम कम से कम पृष्ठों में लिखे गए कहानियों का संग्रह करेंगे | उनके द्वारा लिखित कुछ लघु कहानियां इस प्रकार हैं –

  ‘फिल्म’  कहानी -पांच पृष्ठों में, ‘ सहायक ’ कहानी -सात  पृष्ठों में , ‘दोपहर’ कहानी- एक पृष्ठ में, ‘सिर’ कहानी -एक पृष्ठ में,  ‘गंगू’ कहानी- तीन पृष्ठों में, ‘सायरन’ कहानी –चार पृष्ठों में , ‘नेल कटर’ कहानी- चार पृष्ठों में , ‘आचार्य की रजाई’ कहानी- आठ पृष्ठों में,  ‘दिल्ली’ कहानी -पांच पृष्ठों में, ‘मौसाजी’ कहानी-ग्यारह पृष्ठों में, ‘अपराध’ कहानी- पांच पृष्ठों में आदि |


लंबी कहानियाँ

    उदय प्रकाश की कहानियों में लम्बी कहानियों की सूची भी अधिक है | लम्बी कहानियों को 15- 20 मिनट अथवा एक ही बैठक में नहीं पढ़ा जा सकता | कहीं-कहीं यह लंबी कहानियां ‘लघु उपन्यास’ का रूप धारण कर लेती हैं | लंबी कहानियों के विषय में यह धारणा है कि उसमें एक ही जीवन स्थिति, एक ही समस्या,एक ही परिस्थितियों के संघात से उत्पन्न एक ही मन स्थिति,  एक ही विचारणा का विस्तार में चित्रण हो सकता है | जबकि लघु उपन्यास में अथवा उपन्यास के संदर्भ में बहुआयामी हो सकते हैं | लघु उपन्यास तो अब एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्वीकृति को पा चुका है | उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित  लंबी कहानियां इस प्रकार है-

‘ दिल्ली की दीवार’ कहानी चालीस पृष्ठों में , ‘साइकिल’ कहानी  छब्बीस पृष्ठों में, अरेबा-परेबा कहानी - चालीस पृष्ठों में ,’छतरियाँ’ कहानी- अड़तीस पृष्ठों में, ‘भाई का सत्याग्रह’ कहानी –छब्बीस पृष्ठों में, ‘छप्पन तोले का करधन’ कहानी – तेईस पृष्ठों में,  ‘टेपचू’ कहानी-इक्कीस पृष्ठों में आदि |


औपन्यासिक कहानियाँ

    आधुनिक  हिंदी कहानियों में एक और शैल्पिक प्रयोग हुए हैं | जिसे ‘औपन्यासिक कहानी’ की संज्ञा दी गई है | उदय प्रकाश जी ने अपनी कहानियों में  लघु कहानियों तथा लंबी कहानियों के साथ- साथ ‘ औपन्यासिक कहानियां’ भी लिखी हैं | औपन्यासिक कहानियों के संदर्भ में उदय प्रकाश जी का मंतव्य इस प्रकार है – “लेकिन याद रखें यह लंबी कहानी है, उपन्यास नहीं | इतने सारे पृष्ठों के बावजूद इसमें से जो चीज़ अनुपस्थित है वह है ‘औपन्यासिकता’ या ‘एपिकैलीटी’ | यह तो इसी समय यथार्थ में अभी भी जिये जा रहे जीवन का एक ब्यौरा भर है | एक अनिर्णीत आख्यान का एक टुकड़ा |”१५

    यह कहानी लंबी कहानी के समान आकार में लंबी हो सकती है और सामान्य आकार की भी, किंतु इसमें कहानी की कथा-वस्तु उपन्यासों के समान अध्यायों में विभक्त होती है | तथा दो- दो या तीन- तीन पंक्तियों में छोटे-छोटे अनुच्छेदों को अध्याय का परिच्छेद एक,दो,तीन आदि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है | यह कहानी अपने- आपमें उपन्यास की तुलना में किसी भी प्रकार से छोटी नहीं होती |इस कारण से एसी कहानियों को ‘औपन्यासिक कहानी’ कहना अधिक उपयुक्त होगा | उनके द्वारा लिखित औपन्यासिक कहानियां इस प्रकार है-

‘ मोहनदास’ कहानी –एक सौ ग्यारह पृष्ठों में,  ‘मैंगोसिल’ कहानी -सौ पृष्ठों में , ‘और अंत में प्रार्थना’ कहानी- एक सौ एक पृष्ठों में,  ‘वारेन हेस्टिंग का सांड’ कहानी- चौवन पृष्ठों में ,  ‘पीली छतरी वाली लड़की’ कहानी –दो सौ तीन पृष्ठों में आदि |

कहानी के उद्देश्य

    उदय प्रकाश जी को हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में स्थान प्राप्त है | उनके द्वारा लिखित प्रत्येक कहानी समसामयिक सन्दर्भों से भरी होती है | उनकी कहानियों के कथानक पात्र, वातावरण, भाषा और शिल्प के स्तर पर बेहद प्रयोगशील और दूसरों से अलग अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हैं | स्वयं यह मानते हैं कि वे यथार्थ के नहीं उसकी आत्मा के रचनाकार है | स्पष्ट है कि उनकी नजर यथार्थ के स्थूल पक्ष तक सीमित न रह कर उसके तह तक जाती है | उदय प्रकाश जी केवल मनोरंजनार्थ अपना लेखन कार्य नहीं करते | उनका लेखन महान उद्देश्य और विचारों से प्रेरित लेखन है | कहानी लेखन उनके लिए बौद्धिक कर्म है | उनकी सारी कहानियां इस बात का साक्ष्य है | यह कहानियां पाठक को आनंदित करने के साथ-साथ उन्हें समय के प्रति उद्वेलित भी करती हैं और उनके चिंतन स्तर को भी प्रभावित करते हैं |

    प्रत्येक लेखक अपनी रचनाओं का सृजन कोई ना कोई लक्ष्य पूर्ति ही करता है | उदय प्रकाश जी भी अपनी कहानियों द्वारा निश्चित उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हुए दिख पड़ते हैं | वे मानते हैं कि लेखक को अपनी खुली आंखों से अपने समय में होने वाले बदलावों, परिवर्तनों को देखते रहना चाहिए और उसकी विसंगतियों की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है | वे मानते हैं कि लेखक अपने समय का चितेरा होता है |

    ‘ दरियाई घोड़ा’ संग्रह के अंतर्गत ‘टेपचू’ कहानी में गांव की समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है | लड़कों का बुरी नजर से फिरोजा को देखना, पुलिस द्वारा मुर्गे और शराब पीकर इन मामलों को रफा-दफा करना, गांव के बाहर के आम के बगीचे में गांव के कुलीन घरानों की लड़कियों द्वारा जन्में नवजात शिशुओं का मिलना | कहानी के पूर्वार्ध में आवारा, अलहड टेपचू आगे जाकर मजदूरों का लीडर बन जाता है | मजदूरों के साथ मिलकर पुलिस और कारखानेदारों के विरुद्ध संघर्ष करता हुआ प्रतीत होता है | लेखक का उद्देश्य टेपचू के माध्यम से सर्वहारा वर्ग में अन्याय और शोषण के खिलाफ घृणा पैदा करना है | अंत में गोली खाकर भी टेपचू का जिंदा होना उसके जीवन संघर्ष की भावना का जिंदा होना दर्शाता है | अर्थात टेपचू कभी भी नहीं मारा था न मारेगा | अंत में लेखक अपना उद्देश्य इस प्रकार अभिव्यक्त करते हैं - " मैंने भी पहले ही अर्ज किया था कि यह कहानी नहीं है, सच्चाई है | आप स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि जीवन की वास्तविकता किसी भी काल्पनिक साहित्यिक कहानी से ज्यादा हैरतअंगेज होती है | और फिर ऐसी वास्तविकता जो किसी मजदूर के जीवन से जुड़ी हुई हो|.......... आगे लेखक कहते हैं........ आप चाहे तो मैं आपको टेपचू से मिलवा सकता हूं |"१६ उदय प्रकाश की कहानी संरचना विशेष उद्देश्य पूर्ति हेतु होते हैं | वे निश्चित देश की अपनी कहानियों का सृजन कार्य करते हैं |

    ‘हीरालाल का भूत’ कहानी में लेखक ने फैंटेसी के माध्यम से तथा जादुई यथार्थवाद के माध्यम से एक गरीब दीन- दुर्बल व्यक्ति पर ठाकुरों द्वारा किए गए अत्याचारों एवं अन्याय का वर्णन किया है | हीरालाल भूत बनकर अपने प्रति हुए अन्याय एवं अत्याचार का प्रतिकार लेना जनसामान्य में अन्याय के प्रति क्रांति की भावना को जगाना ही लेखक का  उद्देश्य है | 

    ‘भाई का सत्याग्रह’ कहानी का उद्देश्य वर्तमान प्रशासन व्यवस्था पर करारा प्रहार है | गैरकानूनी टोल टैक्स वसूली के विरुद्ध सत्याग्रह करने वाले भाई के पैर गुंडों द्वारा चूर-चूर कर दिए जाते हैं | पुलिस भाई को बचाने का प्रयास नहीं करती है | उल्टा ही भाई पर यातायात रोकने तथा सामान्य जन की असुविधा का अपराध दर्ज कर देती है |

    ‘मोहनदास’ कहानी आदिवासी समाज के सामाजिक शोषण को उजागर करती है | शोषित वर्ग की दमन नीति के बारे में बताता है | इस कहानी द्वारा लेखक का शोषित वर्ग के प्रति गहरी प्रतिबद्धता देखने को मिलती है | उच्च जाति वर्ग द्वारा निम्न जाति वर्ग की शोषण प्रक्रिया प्राचीन समय से ही देखने को मिलती है | आज भी यह शोषण की प्रक्रिया जारी है | कहानी की कथावस्तु बिल्कुल नयी है | कहानी का नायक मोहनदास है |

    ‘मैंगोसिल’ कहानी में लेखक ने लाइलाज बीमारी के माध्यम से वर्तमान भूमंडलीकरण के वातावरण में प्रगति की असंतुल्यता की ओर संकेत करने का प्रयास किया है | मैंगोसिल एक ऐसा रोग है जिसमें बच्चे का शारीरिक विकास असंतुलित प्रकार से  देखने को मिलता है | बच्चे का सिर, हाथ, पैर के अनुपात में ज्यादा बढ़ जाता है | इस बीमारी का कारण  लेखक गरीबी, कुपोषण और गंदगी बताते हैं | दुनिया के कई ऐसे गरीब देश है जहां पर ऐसे बच्चे रोज गरीबी, कुपोषण और गंदगी के कारण जिन असंख्य जानलेवा बीमारियों के शिकार होते हैं | उनमें से पिछले कुछ वर्षों में एक नई बीमारी शामिल हो गई है, जिसका नाम मैंगोसिल है | इस बीमारी में जो बच्चे आते हैं उनका शारीर दिन- प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है | मस्तिष्क का व्यवहार अस्वाभावि ही है | समाज में हो रहे विकास के बावजूद भी एक आम आदमी का जीवन अत्यंत ही कठिनाइयों से गुजर रहा है | वह ऐसी परिस्थिति में भी अपना जीवन जीने के लिए अभिशप्त है | एक गरीब आदमी के जीवन जीने की इस व्यथा को ही उदय प्रकाश जी ने मैंगोसिल कहानी में दर्शाने का प्रयास किया है |


निष्कर्ष

    निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि उदय प्रकाश जी ने कहानी के परंपरागत ढांचे को अस्वीकार किया है | उन्होंने अपनी कहानियों में कई प्रयोग किए हैं | कहानी का शीर्षक, आरंभ और अंत, पात्रों के नामकरण, कहानी के आकारगत प्रयोग तथा उद्देशात्मक कहानियों की रचना करना इनके प्रयोगों के मुख्य अंग है | उदय प्रकाश एक सामाजिक कहानीकार के रूप में उभर कर हमारे सामने प्रस्तुत हुए हैं | उनकी कहानियों में अपने समय का लगातार बदलता यथार्थ देखने को मिलता है | साथ ही साथ बदलाव के निमित्त जो कारक है उसकी भी चर्चा देखने को मिलती हैं | उनकी कहानियों का कैनवास बहुत अधिक व्यापक है | प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जिस पर अभी तक किसी रचनाकार की दृष्टि नहीं पड़ी | उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर की समस्याएं देखने को मिलती हैं | उनकी रचनाएं वर्तमान समाज, समय और परिवेश को लेकर चलती हैं | उदय प्रकाश जी ने कहानी शीर्षक के चयन में नवीनता और आधुनिक संदर्भों का यथा अनुसार प्रयोग किया है | कहानी विधा में प्रयोगों की अनेक संभावनाएं होती है | लेखक अपनी रचनाओं का सृजन किसी ना किसी लक्ष्य हेतु करता है | उनका मानना है कि लेखक जो भी रचना करता है उसमें अपने वर्तमान समाज की सत्यता को परिलक्षित करें | समाज में होने वाले परिवर्तन और बदलाव के बारे में पाठकों को परिचित कराना ही कहानीकार का लक्ष्य होना चाहिए |


संदर्भ

१. दरियाई घोड़ा- मूंगा ,धागा और आम का बौर- उदय प्रकाश, पृष्ठ संख्या १६

२. दरियाई घोड़ा- उदय प्रकाश,                                      मुखपृष्ठ 

३. तिरिछ- नेलकटर- उदय प्रकाश,                                   पृष्ठ संख्या -१२ 

४. तिरिछ - उदय प्रकाश,                                            पृष्ठ संख्या -२५

५. और अंत में प्रार्थना -उदय प्रकाश,                               पृष्ठ संख्या -१०२

६. मोहनदास-कुछ पत्र पत्रिकाएं- उदय प्रकाश,                   पृष्ठ संख्या- १०९

७. दरियाई घोड़ा- उदय प्रकाश,                                      पृष्ठ संख्या -२१

८. दरियाई घोड़ा- उदय प्रकाश,                                       पृष्ठ संख्या- ४०

९.   तिरिछ- छप्पन तोले का करधन- उदय प्रकाश,                पृष्ठ संख्या -५०

 १०. तिरिछ-छप्पन तोले का करधन- उदय प्रकाश,                पृष्ठ संख्या-७१

११. ललित कार्तिकेय- हंस- दिसंबर-१९८७,                  पृष्ठ संख्या-९४

१२. मैंगोसिल-उदय प्रकाश ,                                           पृष्ठ संख्या-७८

१३. मैंगोसिल-उदय प्रकाश ,                                          पृष्ठ संख्या-१७७

१४.डॉ. अशोक भाटिया-समकालीन कहानी का इतिहास,       पृष्ठ संख्या-२४६

१५. विश्वनाथ त्रिपाठी-कुछ कहानियाँ कुछ विचार,              पृष्ठ संख्या-१०८-१०९

१६. दरियाई घोड़ा-टेपचू-उदय प्रकाश,                              पृष्ठ संख्या-१२०



उषा कुमारी             

पी.हेच.डी, स्टूडेंट,

उस्मानिया यूनिवर्सिटी,

हैदराबाद |


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