Friday, April 29

महान हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद - सुनीता प्रयाकर राव (हिंदी साहित्य के विविध रूप)

हिंदी साहित्य के विविध रूप


महान हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद
            - सुनीता प्रयाकर राव 

    लेखन एक ऐसी कला है l जिसका प्रभाव किसी भी समाज में दूरगामी होता है और हमारे समाज में ऐसे अनेको महापुरुष पैदा है l जिनके जो अपनी लेखन शक्ति से समाज की सोच को सकरात्मक दिशा में ले गये ऐसे महानतम महान लेखको में मुंशी प्रेमचन्द का भी नाम आता है जिनके साहित्य और उपन्यास में योगदान को देखते इन्हें ‘’उपन्यास सम्राट’’ भी कहा जाता है l
    हिन्दी को हर दिन एक नया रूप, एक नई पहचान देने वाले थे, उसके साहित्यकार उसके लेखक,  उन्ही में  से, एक महान छवि थी मुंशी प्रेमचंद की  वे एक ऐसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे, जिसने हिन्दी विषय की काया पलट दी l  वे एक ऐसे लेखक थे, जो समय के साथ बदलते गये और  हिन्दी साहित्य को आधुनिक रूप प्रदान किया l मुंशी प्रेमचंद ने सरल सहज हिन्दी को, ऐसा साहित्य प्रदान किया जिसे लोग, कभी नही भूल सकते l बड़ी कठिन परिस्थियों का सामना करते हुए हिन्दी जैसे, खुबसूरत विषय मे, अपनी अमिट छाप छोड़ी l मुंशी प्रेमचंद हिन्दी के लेखक ही नही बल्कि, एक महान साहित्यकार, नाटककार, उपन्यासकार जैसी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे l

जन्म :

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जमुंशी प्रेमचंद
पूरा नाम         धनपत राय
जन्म         31 जुलाई 1880
जन्म स्थल वाराणसी के लमही गाँव मे हुआ था .
मृत्यु         8 अक्टूबर 1936
पिता         अजायब राय
माता         आनंदी देवी
भाषा         हिन्दी व उर्दू
राष्ट्रीयता     हिन्दुस्तानी
प्रमुख रचनाये गोदान, गबन

आगे हम मुंशी प्रेमचंद जी के, सुन्दर व्यक्तित्व और सम्पूर्ण जीवन का वर्णन करेंगे l

बचपन :

31 जुलाई 1880 को , बनारस के एक छोटे से गाँव लमही में, जहा प्रेमचंद जी का जन्म हुआ था l  प्रेमचंद जी एक छोटे और सामान्य परिवार से थे l उनके दादाजी गुर सहाय राय जोकि, पटवारी थे और पिता अजायब राय जोकि, पोस्ट मास्टर थे l  बचपन से ही उनका जीवन बहुत ही, संघर्षो से गुजरा था l  जब प्रेमचंद जी महज आठ वर्ष की उम्र मे थे तब, एक गंभीर बीमारी मे, उनकी माता जी का देहांत हो गया l

बहुत कम उम्र मे, माताजी के देहांत हो जाने से, प्रेमचंद जी को, बचपन से ही माता–पिता का प्यार नही मिल पाया l  सरकारी नौकरी के चलते, पिताजी का तबादला गौरखपुर हुआ और, कुछ समय बाद पिताजी ने दूसरा विवाह कर लिया l सौतेली माता ने कभी प्रेमचंद जी को, पूर्ण रूप से नही अपनाया l  उनका बचपन से ही हिन्दी की तरफ, एक अलग ही लगाव था l  जिसके लिये उन्होंने स्वयं प्रयास करना प्रारंभ किया, और छोटे-छोटे उपन्यास से इसकी शुरूवात की l अपनी रूचि के अनुसार, छोटे-छोटे उपन्यास पढ़ा करते थे l  पढ़ने की इसी रूचि के साथ उन्होंने, एक पुस्तकों के थोक व्यापारी के यहा पर, नौकरी करना प्रारंभ कर दिया l

जिससे वह अपना पूरा दिन, पुस्तक पढ़ने के अपने इस शौक को भी पूरा करते रहे l  प्रेमचंद जी बहुत ही सरल और सहज स्वभाव के, दयालु प्रवत्ति के थे l  कभी किसी से बिना बात बहस नही करते थे, दुसरो की मदद के लिये सदा तत्पर रहते थे l ईश्वर के प्रति अपार श्रध्दा रखते थे l घर की तंगी को दूर करने के लिये, सबसे प्रारंभ मे एक वकील के यहा, पाँच रूपये मासिक वेतन पर नौकरी की l  धीरे-धीरे उन्होंने खुद को हर विषय मे पारंगत किया l जिसका फायदा उन्हें आगे जाकर मिला ,एक अच्छी नौकरी के रूप मे मिला,  और एक मिशनरी विद्यालय के प्रधानाचार्य के रूप मे, नियुक्त किये गये l हर तरह का संघर्ष उन्होंने, हँसते – हँसते किया और अंत मे, 8 अक्टूबर 1936 को अपनी अंतिम सास ली l

मुंशी प्रेमचंद की शिक्षा :

प्रेमचंद जी की प्रारम्भिक शिक्षा, सात साल की उम्र से, अपने ही गाँव लमही के, एक छोटे से मदरसा से शुरू हुई थी l मदरसा मे रह कर, उन्होंने हिन्दी के साथ उर्दू व थोडा बहुत अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान प्राप्त किया l 

*ऐसे करते हुए धीरे-धीरे स्वयं के, बल-बूते पर उन्होंने अपनी शिक्षा को आगे बढाया, और आगे स्नातक की पढ़ाई के लिये , बनारस के एक कालेज मे दाखिला लिया l पैसो की तंगी के चलते अपनी पढ़ाई बीच मे ही छोड़नी पड़ी l बड़ी कठिनाईयों से जैसे-तैसे मैट्रिक पास की थी l परन्तु उन्होंने जीवन के किसी पढ़ाव पर हार नही मानी, और 1919 मे फिर से अध्ययन कर बी.ए की डिग्री प्राप्त करी l

मुंशी प्रेमचंद का विवाह  :

प्रेमचंद जी बचपन से, किस्मत की लड़ाई से लड़ रहे थे l  कभी परिवार का लाड-प्यार और सुख ठीक से प्राप्त नही हुआ l पुराने रिवाजों  के चलते, पिताजी के दबाव मे आकर, बहुत ही कम उम्र मे पन्द्रह वर्ष की उम्र में  उनका विवाह हो गया,  प्रेमचंद जी का यह विवाह उनकी मर्जी के बिना,  उनसे बिना पूछे एक ऐसी कन्या से हुआ जोकि, स्वभाव मे बहुत ही झगड़ालू प्रवति की और, बदसूरत सी थी l पिताजी ने सिर्फ अमीर परिवार की कन्या को देख कर, विवाह कर दिया l
थोड़े समय मे, पिताजी की भी मृत्यु हो गयी, पूरा भार प्रेमचंद जी पर आ गया l एक समय ऐसा आया कि, उनको नौकरी के बाद भी जरुरत के समय अपनी बहुमूल्य वास्तुओ को बेच कर, घर चलाना पड़ा l बहुत कम उम्र मे ग्रहस्थी का पूरा बोझ अकेले पर आ गया l उसके चलते प्रेमचंद की प्रथम पत्नी से, उनकी बिल्कुल नही जमती थी जिसके चलते उन्होंने उसे तलाक दे दिया और कुछ समय गुजर जाने के बाद, अपनी पसंद से दूसरा विवाह , लगभग पच्चीस साल की उम्र मे एक विधवा स्त्री से किया l प्रेमचंद जी का दूसरा विवाह बहुत ही संपन्न रहा उन्हें इसके बाद, दिनों दिन तरक्की मिलती गई l

*मुंशी प्रेमचंद की कार्यशैली  :

प्रेमचंद जी अपने कार्यो को लेकर, बचपन से ही सक्रीय थे l बहुत कठिनाईयों के बावजूद भी उन्होंने, आखरी समय तक हार नही मानी l और अंतिम क्षण तक कुछ ना कुछ करते रहे, और हिन्दी ही नही उर्दू मे भी, अपनी अमूल्य लेखन छोड़ कर गये l

 *लमही गाँव छोड़ देने के बाद, कम से कम चार साल वह कानपुर मे रहे, और वही रह कर एक पत्रिका के संपादक से मुलाकात करी, और कई लेख और कहानियों को प्रकाशित कराया l इस बीच स्वतंत्रता आदोलन के लिये भी कई कविताएँ लिखी l

*धीरे-धीरे उनकी कहानियों,कविताओं, लेख आदि को लोगो की तरफ से, बहुत सरहाना मिलने लगी l

 *जिसके चलते उनकी पदोन्नति हुई और गौरखपुर तबादला हो गया l यहा भी लगातार एक के बाद एक प्रकाशन आते रहे, इस बीच उन्होंने महात्मा गाँधी के आंदोलनो मे भी, उनका साथ देकर अपनी सक्रीय भागीदारी रखी l उनके कुछ उपन्यास हिन्दी मे तो, कुछ उर्दू मे प्रकाशित हुए l

*उन्नीस सौ इक्कीस में  अपनी पत्नी से, सलाह करने के बाद उन्होंने, बनारस आकर सरकारी नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया  और अपनी रूचि के अनुसार लेखन पर ध्यान दिया l 

*एक समय के बाद अपनी लेखन रूचि में, नया बदलाव लाने के लिये उन्होंने सिनेमा जगत मे, अपनी किस्मत अजमाने पर जोर दिया, और वह मुंबई पहुच गये और, कुछ फिल्मो की स्क्रिप्ट भी लिखी परन्तु , किस्मत ने साथ नही दिया और, वह फ़िल्म पूरी नही बन पाई . जिससे प्रेमचंद जी को नुकसानी उठानी पड़ी और, आख़िरकार उन्होंने मुंबई छोड़ने का निर्णय लिया और, पुनः बनारस आगये . इस तरह जीवन मे, हर एक प्रयास और मेहनत कर उन्होंने आखरी सास तक प्रयत्न किये l

साहित्य लेखन  :

मुंशी प्रेमचंद की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में प्रवृत्त हुई। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। प्रमुखतया उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित हुए।

उन्होंने कुल १५ उपन्यास, ३०० से कुछ अधिक कहानियाँ, ३ नाटक, १० अनुवाद, ७ बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की। मंगलसूत्र उनकी एक अपूर्ण (अधूरी) रचना है। अंग्रेजों द्वारा उनकी रचना सोज़-ए-वतन को जब्त कर लिया गया था।

उपन्यास :

असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य’ उर्दू साप्ताहिक ‘'आवाज-ए-खल्क़'’ में ८ अक्टूबर, १९०३ से १ फरवरी, १९०५ तक 

 हिंदी में उपन्यास :

सेवासदन (१९१८)
प्रेमाश्रम १९२२
रंगभूमि १९२५
निर्मला (१९२५)
कायाकल्प १९२७
गबन (१९२८)
कर्मभूमि (१९३२)
गोदान  (१९३६)
 मंगलसूत्र] (अपूर्ण)

नाटक :

मुंशी जी ने तीन नाटक भी लिखे किन्तु नाटक के क्षेत्र में प्रेमचंद को कोई खास सफलता नहीं मिली। 

1. संग्राम] (1923)
2. कर्बला] (1924)
 3. प्रेम की वेदी] (1933)

कहानियाँ  :

1. अंधेर
2. अनाथ लड़की
3. अपनी करनी
4. अमृत
5. अलग्योझा
6. आख़िरी तोहफ़ा
7. आखिरी मंजिल
8. आत्म-संगीत
9. आत्माराम
10. दो बैलों की कथा
11. आल्हा
12. इज्जत का खून
13. इस्तीफा
14. ईदगाह
15. ईश्वरीय न्याय
16. उद्धार
17. एक ऑंच की कसर
18. एक्ट्रेस
19. कप्तान साहब
20. कर्मों का फल
21. क्रिकेट मैच
22. कवच
23. क़ातिल
24. कोई दुख न हो तो बकरी खरीद ला
25. कौशल़
26. खुदी
27. गैरत की कटार
28. गुल्‍ली डण्डा
29. घमण्ड का पुतला
30. ज्‍योति
31. जेल
32. जुलूस
33. झांकी
34. ठाकुर का कुआं
35. तेंतर
36. त्रिया-चरित्र
37. तांगेवाले की बड़
38. तिरसूल
39. दण्ड
40. दुर्गा का मन्दिर
41. देवी
42. देवी - एक और कहानी
43. दूसरी शादी
44. दिल की रानी
45. दो सखियाँ
46. धिक्कार
47 धिक्कार - एक और कहानी
48. नेउर
49. नेकी
50. नब़ी का नीति-निर्वाह
51. नरक का मार्ग
52. नैराश्य
53. नैराश्य लीला
54. नशा
55. नसीहतों का दफ्तर
56. नाग-पूजा
57. नादान दोस्त
58. निर्वासन
59. पंच परमेश्वर
60. पत्नी से पति
61. पुत्र-प्रेम
62. पैपुजी
63. प्रतिशोध
64. प्रेम-सूत्र
65. पर्वत-यात्रा
66. प्रायश्चित
67. परीक्षा
68. पूस की रात
69. बैंक का दिवाला
70. बेटोंवाली विधवा
71. बड़े घर की बेटी
72. बड़े बाबू
73. बड़े भाई साहब
74. बन्द दरवाजा
75. बाँका जमींदार
76. बोहनी
77. मैकू
78. मन्त्र
79. मन्दिर और मस्जिद
80. मनावन
81. मुबारक बीमारी
82. ममता
83. माँ
84. माता का ह्रदय
85. मिलाप
86. मोटेराम जी शास्त्री
87. र्स्वग की देवी
88. राजहठ
89. राष्ट्र का सेवक
90. लैला
91. वफ़ा का ख़जर
92. वासना की कड़ियॉँ
93. विजय
94. विश्वास
95. शंखनाद
96. शूद्र
97. शराब की दुकान
98. शान्ति
99. शादी की वजह
100. शान्ति
101. स्त्री और पुरूष
102. स्वर्ग की देवी
103. स्वांग
104. सभ्यता का रहस्य
105. समर यात्रा
106. समस्या
107. सैलानी बन्दर
108. स्‍वामिनी
109. सिर्फ एक आवाज
110. सोहाग का शव
111. सौत
112. होली की छुट्टी
113.नम क का दरोगा
114.गृह-दाह
115.सवा सेर गेहुँ नमक का दरोगा
116.दुध का दाम
117.मुक्तिधन
118.कफ़न

300 से अधिक कहानियांँ :

भारत के हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद का नाम अमर है। उन्होंने हिंदी कहानी को एक नई पहचान और नया जीवन दिया। आधुनिक कथा साहित्य का जनक कहा जाता है।

उन्हें कथा सम्राट की उपाधि से विभूषित किया गया था। उन्होंने 300 से अधिक कहानियाँ लिखी हैं। इन कहानियों में उन्होंने मनुष्य के जीवन की सच्ची तस्वीर खींची है।

मृत्यु :

उन्होंने अपनी कहानियों में आम आदमी के घुटन, चुभन और अपशब्दों को दर्शाया है। उन्होंने अपनी कहानियों में न केवल समय को पूरी तरह से चित्रित किया है बल्कि भारत के विचारों और आदर्शों का भी वर्णन किया है। 8 अक्टूबर 1936 को जलोदर से उनकी मृत्यु हो गयी l


सुनीता प्रयाकर राव 
कलम का नाम :वासिनी, 
 हिंदी अध्यापिका, 
 करीमनगर -9553599001

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