Sunday, April 24

समकालीन हिन्दी कविता में पर्यावरण विमर्श - श्रीमती इन्दु सिंह (हिंदी साहित्य के विविध रूप)

हिंदी साहित्य के विविध रूप






समकालीन हिन्दी कविता में पर्यावरण विमर्श

श्रीमती इन्दु सिंह


पर्यावरण में उपस्थित प्राणवायु गैस (ऑक्सीजन) मानव के लिए प्राणदायक है। हम सब श्वास द्वारा ऑक्सीजन लेते है और कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस बाहर निकालते हैं। इसी गैस को पेड़-पौधे अपना भोजन बनाने के लिए उपयोग में लाते हैं और हमें ऑक्सीजन लौटा कर हमारी रक्षा करते हैं। प्रकृति की यह बहुत ही सुन्दर व्यवस्था है कि प्रकृति जो कुछ भी एक तरफ से लेती है वह दूसरी ओर से लौटा देती है जिससे वातावरण में आवश्यक संसाधनों का संतुलन बना रहता है। पर्यावरण में वायु के साथ-साथ जल, पृथ्वी, जीव-जंतु, वनस्पति तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन भी शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर हमारे लिए संतुलित पर्यावरण की रचना करते हैं। ‘पर्यावरण’ शब्द का अर्थ अत्यंत ही व्यापक है। इसके अंतर्गत पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है। साधारण अर्थ में कहें तो ‘परि’ का अर्थ होता है ‘हमारे चारो ओर’ और ‘आवरण’ का अर्थ हुआ ‘ढकना’ या ‘घेरा’ अथार्त प्रकृति में हमारे चारो तरफ जो कुछ भी तत्व फैला हुआ है जैसे - वायु जल, मृदा, पेड़-पौधे, तथा जीव-प्राणी आदि वह सभी तत्व पर्यावरण के अंग हैं। इन्हीं से पर्यावरण की रचना होती है। प्रकृति का मानव के साथ अटूट और अन्योन्याश्रय संबंध है। मानव शरीर का निर्माण भी प्रकृति के ही इन पांच तत्वों से मिलकर हुआ है। प्रकृति से आवश्यक तत्वों का संकलन करके, प्रकृति शरीर का निर्माण करती है और जीवन के अंत होने के बाद उन तत्वों को पुनः प्रकृति को लौटा देती है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के ‘किष्किन्धाकाण्ड’ में लिखा है- “क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच तत्व से बने सरीरा”1. अथार्त पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु से मिलकर हमारा शरीर निर्मित है।

    भारतीय साहित्य और दर्शन सम्पूर्ण रूप से पर्यावरण पर केन्द्रित रहा है। मानव का प्रथम कर्तव्य होता है कि वह प्रकृति की रक्षा करे। प्रत्येक युग में साहित्यकारों ने अपने साहित्य में प्रकृति की स्तुति किया है। मानव जीवन का आधार कहे जाने वाले पांच महाभूतों का गुणगान हमेशा से होता आया है। महाकवि तुलसीदास जी के रामचरितमानस में प्रकृति के साथ-साथ गंगा और सरयू नदी के माध्यम से पर्यावरण का चिंतन मिलता है। कविवर रहीम ने भी पानी के माध्यम से जीवन के तत्व का ज्ञान कराया है-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सुन!

पानी  गए  न ऊबरे, मोती  मानुस चुन!!”2

यह युक्ति वर्तमान संदर्भ में अधिक चरितार्थ और उपयुक्त है क्योंकि अपनी स्वार्थ से लिप्त मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का बहुत ही दोहन किया है। जंगल कटने के कारण वन सम्पदा का दोहन तो हुआ ही है इससे जल और शुद्ध वायु पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। जंगल की अंधाधुंध कटाई से वर्षा कम हो गई है और नदियाँ सूखने लगी है। शहरों में बढ़ती आबादी ने जमीन के नीचे से पानी को सोख लिया है। इसप्रकार एक तरफ वर्षा की कमी और दूसरी तरफ कम वर्षा से भी मिलने वाले जल का उचित संरक्षण नहीं होने के कारण भूमिगत जल का स्तर भी दिन पर दिन गिरता जा रहा है। जल श्रोतों के इस दोहन के फलस्वरूप आज हमें पानी की  समस्याओं से जूझना पड़ रहा है और यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमें जल त्रासदी से गुजरना पड़ेगा।

    हिन्दी साहित्य में प्रारम्भ से ही प्रकृति के अनावश्यक दोहन का विरोध किया गया है। हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल के कवियों जैसे- कबीर, रहीम, गुरुनानक, रविदास, जायसी आदि ने अपने रचनाओं में प्रकृति का कई स्थानों पर रहस्मय वर्णन किया है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लक्षमण और सीता को वृक्षारोपण करते हुए दिखाया है, जैसे-

“तुलसी तरुवर विविध सुहाए। कहुं-कहुं सिय, कहुं लखन लगाए”।।3  

    रीतिकाल के कवियों ने भी प्रकृति की सुन्दरता का अलंकारिक वर्णन करके अपनी रचनाओं में चार चाँद लगा दिया है। बिहारी, देव, पद्माकर, सेनापति आदि कवियों ने प्रकृति के सौंदर्य को अपनत्व दिया है। कवि बिहारी ने मलयानिल की शीतलता और सुगंधी का बिम्बात्मक वर्णन करते हुए कहा है-

चुवत स्वेद मकरंद कण, तरु-तरु तर बिरमाय।

आवंट  दच्छिन  देष  ते  थक्यो बटोही बाय”।।4

    इसी काल में मैथिल-कोकिल विधापति द्वरा रचित पदावली में ऋतुराज बसंत का स्वागत राजा के आगमन जैसा किया गया है। इस पद में प्रकृति के प्रति ममत्व का दर्शन होता है-

आएल रितुपति राज बसंत, धाओल अलिकुल माधवि-पंथ।

 दिनकर  किरण  भेल पौगंड, केसर कुसुम धएल हेमदंड।

 नृप-आसन  नव  पीठल पात, कांचन  कुसुम छत्र माथ।

 मौलि रसाल-मुकुल भेल ताब, समुखही कोकिल पंचम गाय”।।5  

    आधुनिककाल के साहित्यकारों में जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद दिवेदी आदि कवियों ने भी प्रकृति के अनावश्यक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाकर मनुष्य को प्रेरित किया है। आदिकाल साहित्य से लेकर आधुनिक साहित्य तक कवियों ने अपनी कविताओं में  पर्यावरण / प्रकृति का सुन्दर चित्रण किया है। आज की कविताओं में पर्यावरण के रमणीय दृश्यों के साथ-साथ प्रकृति में होने वाली प्राकृतिक विपदाओं का भी हृदय विदारक चित्र अंकित किया गया है। प्रकृति की छटा का सुन्दर रूप मैथिलीशरण गुप्त जी ने साकेत, पंचवटी, सिद्धराज, यशोधरा आदि ग्रंथों में किया है। रात्रिकालीन वेला की प्राकृतिक छटा का बड़ा ही मनोहारी वर्णन इन पंक्तियों में मिलता है-

चारू चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में,

स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है अवनी और अम्बरतल में”।6  

    कवि श्रीधर पाठक ने ‘कश्मीर की सुषमा’ कविता में प्रकृति के स्वरूप का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है तो कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔंध’ ने अपने ‘प्रिय-प्रवास’ (महाकाव्य) में राधारानी की हृदय व्यथा का प्रकृति के उपादानों के माध्यम से सुन्दर रूप व्यंजित किया है। कृष्ण भी अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति में प्राकृतिक प्रतिकों का सहारा लेते हुए दीखते हैं।

“उत्कंठा के विवष नभ को, भूमि को पादपों को।

ताराओं  को  मनुज मुख  को प्रायष: देखता हूँ।

प्यारी! ऐसी न ध्वनि मुझको है कहीं भी सुनाती।

जो चिंता से चलित-चित की शांति का हेतु होवें”।7  

    छायावादी काव्य में भी प्रकृति के सूक्ष्म व उत्कृष्ट रूपों का वर्णन मिलता है। महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने भी अपनी कविताओं में प्रकृति के रूपों का अनोखा वर्णन किया है। सुमित्रानन्दन पंत प्रकृति की सुन्दरता में इतने मुग्ध हो जाते हैं कि उन्हें अपनी प्रेयसी का प्यार भी तुच्छ लगने लगता है और वे कहते हैं-

“छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,

 बाले, तेरे बाल-जाल में, कैसे  उलझा  दूँ लोचन”।8  

    कवि निराला जी ने भी संध्या की बेला को सुंदरी के रूप में वर्णन करते हुए कहा है-

                  “दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है।

                   वह  संध्या   सुन्दरी  परी-सी,   धीरे,  धीरे,  धीरे”।9  

    कवि दिनकर जी ने ‘कामायनी’ काव्य में आरम्भ से ही प्रकृति के भयानक रूप का वर्णन किया है। इस काव्य में जल प्रलय के बाद सबकुछ नष्ट हो जाता है। कवि का संकेत है कि प्रकृति से कभी भी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।

“हिमगिरि के उतुंग शिखर पर, बैठ शीला की शीतल छाँह।

 एक  पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा  है  प्रलय-प्रवाह”।10

 मनुष्य के भोगवादी प्रवृति ने आज प्रकृति के संतुलन को खतरे में डाल दिया है। यही कारण है कि हमें अकाल, बाढ़, सुखा आदि का निरन्तर सामना करना पड़ रहा है। हर वर्ष कहीं न कहीं प्राकृतिक विनाश की घटनायें घटती ही रहती है। भोगवादी मानव के साथ वैज्ञानिक प्रयोगों से भी प्रकृति को नष्ट किया जा रहा है। अज्ञेय ने अपनी कविता ‘हिरोशिमा’ में कहा है कि- “मानव का रचा हुआ सूरज मानव को भाप बनकर सोख रहा है”। अज्ञेय के काव्य में मानव और पर्यावरण के अंतः संबंधों की चालाकी दिखाई देती है। उन्होंने अपनी कविता ‘असाध्य वीणा’ में मनुष्य को अहं का त्याग करने तथा आत्मानुभूति प्राप्त करने की प्रेरणा दिया है। वर्तमान में अब तकनीक बदल रहा है, आज के समय में अधिकतम कार्य उर्जा उत्पादन, विधुत उत्पादन नाभीकीय विखंडन एवं नाभीकीय संलयन आदि विधियों से किया जा रहा है। इनसे अधिक मात्रा में रेडियोएक्टिव विकिरण उत्सर्जित होता है। वनों के नष्ट होने के कारण ताप में लगातार वृद्धि हो रही है। इसके दुष्परिणामों ने भी साहित्यकारों का ध्यान आकर्षित किया है-

सिर पर सम्मुख

 जलता सूरज

 भभक रहा है

 लपटों में घिर देह बचाती

 पृथ्वी का हरियाला आंचल

 झुलस गया है

 न जाने क्यों नाराज हुए इन्द्रदेव”

    आज जंगलों और वृक्षों के नष्ट हो जाने से कई जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं और जो शेष बचे हुए हैं उनका भी भविष्य ठीक नहीं दिख रहा है। अतः कवि दीपक कुमार कहते हैं -

“पास के एक गांव में भटकी एक कोयल

 कूक रही है भरी दुपहरिया में

 कंक्रीट की अमरैया में,

 कहाँ बची है छाँव

 जो इत्मिनान से तू ले सके आलाप

 कोई तो अमराई बची होगी कहीं पर

    आज समूचा विश्व ग्लोबल वार्मिंग जैसे शब्द से भलीभांति परिचित है औए पीड़ित भी है। कार्बनिक गैसों के उत्सर्जन से हमारे जीवन को सुरक्षा पहुँचाने वाली ओजोन परत में छिद्र हो गया है, धरती का ताप दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। कवि अरुणकमल भी इस बात से अछूते नहीं हैं। वे कहते हैं –

“आ रहा है ग्रीष्म

 देह का एक-एक रोम अब

 खुल रहा है साफ और अलग

 नभ इतना खुला और फैलता हुआ

 सूरज के डूबने के बाद भी”     

    प्रदूषित हो रही नदियों, उनकी सफाई तथा उनके रख रखाव पर सरकारी नीतियों के कार्यक्रमों की जो प्रक्रिया है वह भी कुछ खाश नहीं है। कवि उनपर भी प्रश्न उठाते हुए कहते हैं

नदियाँ कल भी बहती थी

बहती है आज भी

अवरोधों से

हमेशा जूझती नदियाँ वे कल भी पाषाण थे

आज भी पाषाण है

व्यवस्था के नाम पर

उल्टी बहती नदियाँ

पर्वतों के उस पार खंजरों के धार पर है नदियाँ

वे पोखरों को बताते हैं नदियां       

    प्रकृति का वर्णन अनेक वर्षों से, सभी काल में, कविता के माध्यम से किया जाता रहा है। आज के परिवर्तनशील परिस्थितियों को केन्द्र में रखकर अनेक कवियों ने अपने-अपने तरीके से, समकालीन हिन्दी कविता में प्रकृति का बहुत ही सजीव चित्रण किया है। बढ़ते हुए प्रदुषण के कारण पर्यावरण असंतुलित होता जा रहा है जिसके प्रति सामाजिक कार्यकर्ता, वैज्ञानिक आदि की तरह कवि और साहित्यकार भी काफी चिंतित हैं। ये सब अपने कविताओं और साहित्य के माध्यम से पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता व्यक्त किये हैं। समकालीन कविता वास्तव में पर्यावरण त्रासदी का युग है जिसे अनेक कवियों ने अपने काव्य का विषय बनाया है -

आओ हम सब पर्यावरण बचाएं, सुन्दर सा एक दृश्य बनायें।

बदलें  हम  तस्वीर  जहाँ  की  यह संदेश चहु ओर फैलाएं।


संदर्भ ग्रंथ :

1.   तुलसीदास, रामचरितमानस के ‘किष्किन्धाकाण्ड’

2.   रहीम के दोहे

3. रामचरितमानस, तुलसिदास, 2/236/ 3

4. बिहारी प्रकाश, बिहारी, पृष्ठ स. 31

5. विद्यापति, पदावली, पृष्ठ स. 295

6. पंचवटी मैथलीशरण गुप्त, ‘कविताकोश’ वेब पेज से

7. प्रियप्रवास, हरिऔंध, उद्धरित आधुनिक काव्य सोपान, पृष्ठ स. 5

8. सुमित्रानंदन पंत, संचयन, कुमार विमल, पृष्ठ स. 51

9. कवि श्री, निराला, सं. सियारामशरण गुप्त, पृष्ठ स. 11  

10 . कामायनी, जयशंकर प्रसाद, चिंता सर्ग, पृष्ठ स.5



श्रीमती इन्दु सिंह

                      एम ए (हिन्दी), बी०एड०, एम फिल                

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