Wednesday, April 20

21वीं शताब्दी में कबीर साहित्य की प्रासंगिकता - डॉ के संगीता (साहित्य के विविध रूप)

साहित्य के विविध रूप



21वीं शताब्दी में कबीर साहित्य की प्रासंगिकता

डॉ के संगीता


    बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कबीर एक ग्रहस्थ थे, अलमस्त व फक्कड थे, अक्खड, निर्भय व स्पष्टवादी थे। कबीर एक महान संत व कवि तथा समाज सुधारक थे। सामाजिक, धार्मिक सुधार, मानवतावादी चिंतन, भक्ति, दर्शन एवं साहित्य के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनके इस बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष उनका सामाजिक सरोकार एवं आम आदमी से जुडाव है, जिसकी वजह से एक संत, कवि, सुधारक, दार्शनिक क्रान्तिकारी के रुप में जनसामान्य में उनकी लोकप्रियता आज भी है और आगे भी रहेगी।

कबीर के जन्म के संबंध में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। कई किवदन्तियां भी प्रसिद्ध है। कबीर की रचनाओं से पता चलता है कबीर का जन्म काशी में हुआ जैसे “ काशी में हम प्रगट भये” जातिपाति के कट्टर विरोधी कबीर ने बडे गर्व से कहा “जाति जुलाहा नाम कबीरा”

नीरु और नीमा जुलाहा दम्पत्ति ने कबीर का पालन पोषण किया। कबीर ग्रहस्थ संत थे किंतु ग्रहस्थी में उनकी आसक्ति नहीं थी।

“कहत कबीर सुनह रे लोई, हम न किसी के न हमारा कोई”।

कबीर रामानन्द के शिष्य थे जैसे कबीर ने कहा “रामानन्द चेताये” कबीर ने रामनाम का मंत्र मान लिया था, कबीर ने कहा “दशरथ सुत तीन्हु लोक बखाना, रामनाम का मरम न जाना”। 

    कबीर को हरिचर्चा एवं संत सेवा में गहन आसक्ति थी। वे संत समागम एवं देशाटन करते थे। प्रकृति से संत व वैरागी कबीर ईश्वर से इतना ही चाहते थे कि उन्हें इतना मिल जाये कि उनका व उनके परिवार का पेट भर जाये और घर आये साधु संत का भी यथोचित सत्कार किया जा सके।

“साई इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय|

मैं भी भूखा न रहुँ, साधु न भूखा जाय”||

कबीर ईश्वर की भक्ति को ही जीवन में सबसे बडी उपलब्धि मानते थे। उनका कहना था कि सम्पत्ति संग्रह की प्रवृत्ति तथा सुख वैभव की लालसा इसमें बाधक होती है। अपने पुत्र में यह प्रवृत्ति देख वे बहुत दुखी थे,उनका कहना था,

“बूडा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल्|

हरि का सुमिरन छांडिके, ले आया घर माल”॥

अक्षर भ्रम के परम साधक कबीर ने स्वीकार किया कि “मसि कागद छूयो नहि, कलम गहि नहीं हाथ”। कबीर ने जो ज्ञान प्राप्त किया वह संत समागम, गुरु की शिक्षा व सामाजिक जीवन के अनुभव से प्राप्त किया। कबीर ने सारभूत बातों को ग्रहण करने पर बल दिया जैसे “सार-सार को गहि रहे थोथा देय उडायं”। 

    कबीर का अधिकांश जीवन काशी में बीता। कबीर ने उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया। जीवन के आखिरी दिनों में वे काशी छोडकर मगहर चले गये जहाँ 120 वर्ष की आयु में परमतत्व में विलीन हो गये। 

“हेरत-हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराय्।

बूँद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाय”॥

कबीर को गुजरे लगभग 600 वर्ष बीत गये फिर भी उनकी वाणी आज भी जन-जन में व्याप्त है। कबीर का काव्य 21 वीं शताब्दीं में भी प्रासंगिक है। प्रासंगिकता साहित्य को वर्तमान में प्रतिफलित होने का सामर्थ्य देती है। श्रेष्ठ कवि जितना वर्तमान में जीता है उससे कहीं अधिक भविष्य में जीता है। कबीर ने सांसारिक जीवन में रहकर ब्रम्ह की प्राप्ति की। कबीर की वाणी एवं संदेश आज भी प्रासंगिक एवं उपयोगी सिध्द हुए है जैसे- मध्यकाल में जातीय भेदभाव की भावना गहरे रुप में विधमान थी। समाज चार वर्णों में विभाजित था। समाज में जाप्याभिमान से प्रेरित ऊँची जाति अपने पर गर्व करती थी। कबीर ने जाति-पाति का विरोध करते हुए कहा-

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लिजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पडा रहने दो म्यान”॥

आज का हिंदू समाज भी चार वर्णों में विभाजित है। जीवन के हर क्षेत्र में जाति सम्बन्धी विषमता देखने को मिलती है। आज भी जाति पर गर्व करने की प्रक्रिया बडी उग्र है। 21वी सदी में भी हम इस तरह की संकीर्णता को नजर अंदाज नहीं कर सकते जो समाज के विकास में बाधक तत्व है। जातिवाद के इस मकडजाल से उभरने के लिए कबीर की बातों को समझना होगा। 

हमारे देश में धर्म के नाम पर विव्दैष की भावना फैली हुई है। मध्ययुगीन समाज में हिंदू और मुसलमान अपनी-अपनी कट्टरता का राग अलापते थे। मुसलमान शासक हिंदुओं पर अत्याचार करते, मंदिरों को तोडना और कत्लेआम करना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति बन गयी थी। आज भी देश में सम्प्रदाय के नाम पर दंगे हो रहे है। युग बदला पर परिस्थिति वैसी ही है। धर्मान्धता व संकीर्णता के कारण वे आपस में लड रहे है। कबीर ने अपनी वाणी से समकालीन समाज में दोनो धर्मो को निकट लाकर एकता का पाठ पढाने का प्रयास किया। 

“हिंदू तुरक का करता एकै, ता गति लखि न जाई।

हमारे राम रहीम करीम केसो, अलह राम सति सोई”॥

कबीर सामाजिक जीवन में आपसी भाई-चारा एवं सामाजिक सहिष्णुता पर बल देते है। नये समाज के निर्माण में कबीर वाणी आज भी प्रासंगिक एवं उपयोगी प्रमाणित हुई है। कबीर की वाणियों को आधार बनाकर शांति, भाई-चारा स्थापित करने का प्रयास करना है। देश के विकास के लिए यह आवश्यक है इसलिए हमें इनकी वाणियों को आत्मसात कर आचरण करना होगा ताकि धर्म की कट्टरता से निजात पा सके। 

    मध्ययुगीन समाज में सत्ताधारी के व्दारा किसान मजदूर और कारीगर पिस रहे थे। कबीर ने कहा-          

“एकानि दीना पटंबर, एकानि सेज निवारा।

एकानि दीना गैर गूदरी, एकानि सेज प्यारा”॥

सामाजिक समता को स्थापित करने में अतिशय धन बाधक बनता है। अमीर धनवान होता जाता है, गरीब धनहीन होता जाता है। अमीर गरीब का शोषण व दमन करता है। धन जुटाने के लिए लोग भ्रष्टाचार, चोरी, ठगी, अपहरण में लिप्त पाये जाते है। सत्ताधारी शासक जो प्रजा को कई प्रकार के वचन देकर उनका पालन नहीं कर पाते थे उनके लिए कबीर ने कथनी और करनी के सम्बंध में कहा कि- 

“कथनी मीठी खाण्ड सी करती विष की लोय।

कथनी तजी करनी कर, विष से अमृत होय”॥

21वीं सदी में जनता भौतिक सुखों के पीछे दौड रही है। लोभ उनके मन में घर बना चुका है। सामाजिक जीवन से प्रेम का लोप होता जा रहा है। जिसके कारण नैतिक पतन होता जा रहा है। वर्तमान युग में सामाजिक सदभाव एवं प्रेम का स्थान स्वार्थ ने ग्रहण कर लिया। सामाजिक जीवन विद्रुपता से भर गया है। आज के युग में स्वार्थ विहीन समाज की आवश्यकता है। कबीर का काव्य निस्वार्थ जीवन के संदेशों से भरा है। 

    सामाजिक विश्रृंखलता से भरे युग में कबीर ने गुरु को ईश्वर से ज्यादा महत्व दिया। वर्तमान समय में गुरु एवं शिष्य के संबंध में विद्रुपताओं का समावेश हो गया है। प्राचीन काल में शिक्षा का सीधा संबंध व्यक्तित्व विकास से था। विधार्थी को कर्मयोगी बने इसके लिए गुरु महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिष्य अपने भविष्य के निर्माण में गुरु के संदेश एवं सलाह का अनुपालन करे। कबीर कहते है- 

“गुरु धोबी शिष कापडा, साबुन सिरजन हार,

सुरति सिला पर धोइए, निकसे ज्योति अपार”।

कबीर ने बाहय आडंबरों का खंडन किया वे धर्म के सामान्य तत्वों सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा, संयम, सदाचार को मानव के लिए आवश्यक मानते थे। ये सभी गुण मध्यकाल में भी प्रासंगिक थे, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा।

कबीर ने मध्यकालीन समाज एवं जन-जीवन से सम्बन्धित जिन खामियों को उजागर कर दूर किये जाने पर जोर दिया उनमें से अधिकांश आज भी बरकरार है। आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुडे ऐसे बहुत से मुद्दे उन्होंने उठाये जिनका परम्पराओं के अन्धानुकरण के अलावा लोगों के जीवन में न तो कोई अर्थ था न ही कोई प्रयोजन। बहुत हद तक ये मुद्दे अभी भी बने हुये है जिनसे समाज आज भी बुरी तरह त्रस्त है। इन बुराइयों से निजात पाने के लिए लोगों की सोच को बदलना जरुरी है। इस कार्य में कबीर के विचार बहुत उपयोगी हो सकते है, क्योंकि कबीर का दर्शन आम आदमी का दर्शन है। आम आदमी को अज्ञान के अंधेरे से निकाल कर ज्ञान की रोशनी की ओर ले जाता है। कबीर का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की आज से छ: सौ साल पहले था।

21वीं सदी में कबीर की प्रासंगिकता की मुख्य तीन वजह है। एक यह कि बाहय और आंतरिक जगत के बीच प्राथमिकता के विषय पर कबीर का जो नजरिया था वह मध्ययुगीन समाज के आदमी की तुलना में आधुनिक उच्च तकनीकी समाज के आदमी का पथ प्रदर्शन करने और उनकी समस्याओं को सुलझाने में कहीं अधिक उपयोगी है। दूसरे, मध्यकालीन समाज की जिन विसंगतियों विशेषरुप से जातिगत, वर्णगत व लिंगगत भेद तथा ऊँच-नीच एवं छुआछूत की ओर उन्होंने उँगली उठाई थी वे गई नहीं है, अपितु किन्हीं मामलों में पहले से कहीं अधिक मजबूत ही हुई है। तीसरे, धर्म के मामले में तत्कालीन समाज में विधमान कर्मकाण्ड पाखण्डों एवं आडम्बरों की सार्थकता पर कबीर ने जो सवाल उठाये थे वे आज भी समीचीन है। 

समाज में सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों में तब से अब तक तो सुधार हुआ है किंतु धर्म और समाज में जो लचीलापन आना था वह नहीं आ पाया है। इसमें कठोरता ही बढी है, परस्पर सदभाव की जगह कटुता ही बढी है। ऐसे में समाज से इन बुराइयों को दूर करने के लिए कबीर के संदेशों को लोगों तक पहुँचाना आज पहले से कहीं ज्यादा जरुरी हो गया है। 

सामाजिक एवं धार्मिक परिदृश्य से वे सभी मुद्दे जिनकी निरर्थकता व खोखलेपन को कबीर ने उजागर किया था, ओझल हो जाते तब भी कबीर की प्रासंगिकता समाप्त नहीं होती। कबीर तब भी प्रासंगिक थे व रहेंगे। 

कबीर ने जो चेतावनियाँ दी है, वे समाज के लिए सदैव कल्याणकारी है। वे कल भी थे, वे आज भी है और कल भी रहेंगे क्योंकि कबीर की अनुभूति के कुछ ऐसे क्षेत्र है जिन्हें 21वीं शताब्दी का सचेत नागरिक भी अनुभव करता है, जो आज भी हमारे सामाजिक जीवन में प्रासंगिक था, आज भी पूर्णत: व्यवहारिक है और भविष्य में बना रहेगा। 

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि कबीर ने तत्कालीन अस्त व्यस्त समाज को देखकर अपने कल्याणकारी वचनों से जनता को प्रबोधित किया। कबीर के काव्य की प्रासंगिकता तब भी थी और आज भी है।


संदर्भ:

1] कबीर साहित्य: सिध्दान्त और साधना- परशुराम चतुर्वेदी

2] कबीर- विजयेंद्र स्नातक 

3] कबीर का जीवनवृत- श्याम सुन्दरदास 

4] कबीर {सम्पादित} नई दिल्ली 

5] कबीर हजारी प्रसाद व्दिवेदी 

6] कबीर एक विवेचन- डा. सरनासिंह शर्मा 

7] भक्ति आंदोलन- इतिहास और संस्कृति 

8] कबीर की प्रासंगिकता- पूर्वा देव


 



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