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आदिवासी शब्द से तात्पर्य है, जंगल में निवास करने वाला या वनवासी।सदियों पहले आर्यों से परास्त होकर ये लोग जंगलों में खदेड दिए गये थे। सामूहिक जीवन जीने वाले, प्रकृति-प्रेमी, प्रकृति के सहयात्री और सहयोगी आदिवासी जंगलों में रहकर जंगल के फल, कंदमूल खाकर बडे स्वाभिमान से अपनी भाषा, संस्कृति व जीवन शैली को जिंदा रखे हुए थे। इनके पास अपूर्व लोक साहित्य का खजाना सुरक्षित है, जिसे पीढी दर पीढी इन्होंने वाचिक परम्परा में जिंदा रखा। यह इनका संगठित सामूहिक जीवन ही था, जिसने इनके साहित्य को जिंदा ही नहीं रखा बल्कि समयानुसार उसमें कुछ नया जोडा भी।
उत्तर भारत,
पूर्वोत्तर भारत, मध्यप्रदेश,
राजस्थान, झारखण्ड, महाराष्ट्र तथा देश के अन्य
क्षेत्रों में ये आदिवासी जन-जातियाँ निवास करती है। ये नैसर्गिक वातावरण के
प्रेमी रहते है। जंगलों में रहकर कई जडी बूटियों के उपयोग तथा विभिन्न प्रकार की
व्याधियों के उपचार की जानकारी रखते है। आदिवासी लोगों का रहन-सहन,
खान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज,
परम्परा अन्य लोगों से भिन्न होती है। जंगलों में रहने के कारण इनकी भाषा औरों से
हटकर होती है। खडिया जनजाति की भाषा ‘खडिया’ है।
गोंड जनजाति की गोंडी, बंजारों की बंजारी आदि कई भाषाएं
आदिवासियों की विभिन्न जन-जातियों में प्रयुक्त होती है। इनकी भाषा अधिकांशत:
लिपिबध्द नहीं है, मौखिक होती है।
आदिवासी साहित्य
वन संस्कृति से सम्बंधित साहित्य है। आदिवासी के लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग उनका
लोक साहित्य है, जो मात्र मनोरंजक परक न होकर संस्कृतिमूलक होता है। अधिकांश आदिवासी
लोग सामान्यत: क्षेत्रीय समूह में रहते है। जल,
जमीन, जंगल से वे जुडे होते है। आदिवासी लोगों में परम्परागत धार्मिकता,
देवी-देवताओं संबंधी विश्वास, अंध विश्वास,
भूत-प्रेत विषयक मान्यताएं अपने-अपने स्तर पर प्रचलित है। आदिवासी साहित्य को
देखते है तब मौखिक साहित्य की समृध्द पंरपरा हमारे सामने दिखाई देती है,
जिसमें किस्से, गीत, पहेलियाँ,
कहावतें, मुहावरे आदि आंचलिक स्तर पर विविधता के साथ साहित्य में बखूबी से
अभिव्यक्ति पाता है।
आदिवासी जगत में
जीवन का आधार लोक कथाएँ है, लोकवार्ता एवं
संवादों के आदान-प्रदान है, विचारों को
जानना है और अभिव्यक्ति की गहराई से सोचना समझना है। इन कथाओं में अवसाद-विषाद,
राग-व्दैष, पूर्वाग्रह- दुराग्रह, प्रेम-प्यार,
आनन्द, पीडा की आवाजें होती है। आदिवासियों की कथाओं को गौर से देखा जाए तो
वे न तो अतीत के अवशेष है, न शिक्षितजनों
की जीवन-शैली से सम्बन्धित व्याख्यान है। वे एक समृध्द संस्कृति की निरंतरता और
उसके साथ अपने वर्तमान को नई सीख के साथ जीवन योग्य बनाने के नुस्खे है। रोजमर्रा
की जिंदगी से जुडी लोक-कथाएं उन आदिवासियों के जीवन का इतिहास है। उनकी मानसिकता
सोच और चिंतन की व्याख्या है। पं. विधानिवास मिश्र के शब्दों में “आदिवासियों की
लोक कथाएं एक पीढी से दूसरी पीढी के बीच प्रवाह के साधन है।” आदिवासी लोग अपनी
विशिष्ट जीवन शैली और संस्कृति को लेकर जी रहे है।
आदिवासी लोक
संस्कृति के उपादान में लोक कथाएँ, लोकगीत,
लोकनृत्य, कहावते आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। आदिवासी संस्कृति पाषाण युग से
परमाणु युग तक की लंबी यात्रा तय करते हुए कई पडावों से गुजरी है। हर पडाव ने इसे
एक नई उपलब्धी और अभूतपूर्व अनुभूति के उपहारों से सजाया और संवारा है। परंपरागत
संस्कार अर्जित ज्ञान, कार्य अनुभव और जीवंत प्रयोगों ने
कुछ परिणाम दिए। यहीं परिणाम और निष्कर्ष हमारी संस्कृति के प्रहरी और मार्ग दर्शक
का काम करने लगे। पीढीयां इन्हें पूर्वजों की विरासत मानकर इन पर अमल करने लगी। आज
इन्हें ही हम आम भाषा में लोक गाथाएं या कहावतें कहकर पुकारते है। आदिवासी संस्कृति
में कहावतों का विशिष्ट स्थान है। ये पीढी दर पीढी हस्तांतरित होती है।
ये कहावतें
बहुमूल्य एवं अमल करने के योग्य है। भारत की लोक संस्कृति में कहावतों का विशेष
स्थान रहा है। कहावतें समाज के दीर्घकालीन अनुभव के आधार पर बनती है। लोक जीवन के
अनुभवों को सरल शब्दों से व्यक्त करती है। इनके लिए विशेष वाक्यों की आवश्यकता
होती है। अन्यथा इनका अर्थ अस्पष्ट हो जाता है। कहावतों से भाषा में सौंदर्य आ
जाता है और लोगों को तत्काल समझ में आ जाता है। इनका शब्द-चयन और वाक्य रचना इतनी
सरल होती है कि ये जुबान पर आसानी से चढ जाती है। इन्हें कंठस्थ भी कर लेते है।
भाषा प्रभावोत्पादक बन जाती है। इनके प्रयोग से भाषा में निखार आ जाता है। कहावत
में अभिव्यक्ति के प्राण बसते है। भारत की लोक संस्कृति में कहावतों का विशेष
स्थान है।
आदिवासी बिना
किसी उपकरण मात्र के कुछ प्रकृति परिवेक्षणों और वंशानुगत अनुभवों के आधार पर इसकी
व्याख्या करते है। आकाश में तीतर पंखी [चितकबरे] बादलों को देख कहते है-
“तीतरपंखी बादली जिस दिन नभ में होय।
तब तो निश्चय जानिये,
तुरंत ही वर्षा होय॥”
शाम का इन्द्र
धनुष व मोर की आवाज सुन अनुमान लगाते है-
सांचे धनुष सकारे मोरा;
यह दोनों पानी के बोरा।
जब बर्तन में
रखा पानी अत्यधिक गर्म होने लगे और चिडिया धूल में नहाती नजर आएं तथा चींटिया अपना
अंडा लेकर उपर चढती दिखाई दे तो इसे अच्छी बरसात की भविष्यवाणी मानते है-
कलसा पानी गर्म है,
चिडियाँ नहाएँ धूल।
अंडा ले चींटी चढे बरसे घाघ भरपूर।।
किसी चीज की
अधिकता पर टिप्पणी करते हुए कहा गया है-
अति का बुरा है बोलना, अति
की बुरी है चुप ।
अति का बुरा है बरतना, अति
की बुरी है धूप ।।
संग्रह की
उपयोगिता के संदर्भ में कहते है-
बूंद-बूंद से घट भरे, राई
बने पहाड ।
पैसा पाई जोड ली, बुरे
दिनों की आड ।।
अपनी कडी मेहनत
की रुखी-सुखी रोटी पर संतोष करना मानव धर्म है। वहीं दूसरों के हक को हडपना अधर्म
है। जैसे-
रुखी-सूखी खायके,
ठंडा पानी पीव ।
देख पराई चुपडी, मत
ललचाये जीभ।।
अविश्वास दिखाने
वाली यह कहावत-
पत्थर पर जब जामे कुरमी।
तबहु ना होश्ने आपन कुरमी॥
बन ले पल्ल, बिगर ले कुरमी।
धन से मुक्त
होने पर मल्ल के नाम से पुकारे जाते है, परंतु गरीब
होने पर कुरमी की संज्ञा मिलती है।
भर न करे
भुइंहार के, पौंछी न चेर सियार के अर्थात् भूमिहार को सेवक नहीं बनना चाहिए और
सियार की पूंछ कभी नहीं पकडनी चाहिए।
मुसहर के बेटी न नैहरे सुख, न
ससुरा दैह सुख ।
बडे अपराध के
लिए- गाई मारि के जूता दान ।
इसी प्रकार
स्वयं अभावग्रस्त रहकर दूसरे के प्रति अनुचित व्यय करने वाले व्यक्ति के लिए- कनिया
के माँड ना लोकमी के बुनियाँ ।
अर्थात् वधू को
माँड भी नहीं मिलता और नौकरानी को बूंदी दी जाती है।
भांग मांगे भूंगडा,
सुलफी मांगे घी,
दारु मांगे जूतियाँ,
खुशी हो तो पी।
भांग पर भुने
हुए चने और सुलफे पर घी से बने व्यंजन और शराबी को तो जूते पडने पर ही उसकी अकल
ठिकाने आती है।
इसी तरह अन्य
कहावते-
‘राम राखे तो कोई
नी चाखे’
‘कोख में छोरों
ने गांव में ढिंढोरों’
‘खेत में नालों न
घर में सालों’
‘बूंद-बूंद ती घडो
भरे’
‘हल्दी लागे ने फंटकारी, रंग
चोखो आवे’
‘गरीब की लुगाई, सब
की भौजाई’
‘ओखली में माथों
दियो तो मुसल से कई डर’
‘खेत राजा के, ने
बेटी पराई के’
‘माल खावे माटी
को, ने गीत गावै
वीरां का’
सतसई के दोहों
के बारे में यह सच है कि वे देखने में छोटे लगते है, पर
घाव गंभीर करते है। यहीं बात कहावतों के लिए भी है। छोटी होने के बावजूद इनमें
बहुत गहरे अर्थ छुपे है। कभी ये कडवी भी लगती है पर सीख भी देती है। गाँव और
कस्बों में आज भी अनुभव के निचोड से जन्मी ये कहावतें अपना विशेष स्थान रखती है।
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