Wednesday, January 12

स्वतन्त्रता से अमृतत्व - डॉ रत्ना पुरोहित (स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य)

स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य


स्वतन्त्रता से अमृतत्व


आओ, मिलकर जीयें, स्वतन्त्रता के कुछ पल 

मन के विकारों से होकर सदैव उन्मुक्त प्रतिपल

स्वतन्त्रता के सीखें कुछ ऐसे गुर

मन के मनोविकारों से रहें हम दूर

स्वतन्त्र हो, करें मन-वाणी का सन्तुलन

सहज हो, करें सुविचारों का क्रियान्वयन

समन्वित होकर बनें हम सहनशील

संयमित हो, करें स्वयं को गतिशील

अन्तर्मन का कर आलिंगन, जगत में रहें प्रयत्नशील

अमृत-हेतु, मृत-तुल्य हो न बनें दुश्शील

सेवा-साधना से संजोयें जीवन के सुविचार

कर्म करें सजग होकर, पर रहे धैर्य साकार

अवगुणों का हो अवलोकन औ’ प्रतिपल तिरस्कार

मूल्यों औ’ गुणों का क्षण-क्षण हो नूतन विस्तार

प्रसन्न हो स्वीकारें स्वयं की विफलता सहर्ष

सफलता हेतु करें प्रयत्न  संकल्पित हो’ सगर्व

स्वतन्त्र औ’ स्व-विजयी होकर करें नित अमृत-पान

सहज औ’ कर्मयोगी होकर करें निज पर अनुशासन

सेवा-साधना को संजोयें औ’ करें कर्म निष्काम

अनुभव के ताने-बाने से बुनें वस्त्र सुदृढ औ’ सुसूक्ष्म

शिव-संकल्प की करें साधना लेकर सत्याश्रय

स्वतन्त्र हैं हम, करें सदैव धिक्कार पराश्रय

फिर क्यों न हो ‘ सं गच्छध्वं सं वदध्वं ‘की पूर्ण साधना,

क्यों न हो ‘ समानो मन्त्र: समिति: समानी’,

अवश्य होंगे ‘समानं मन: सह चित्तमेषाम्

प्रकाशित होंगी ‘समानी व आकूति: समाना हृदयानि वः

मनायें महोत्सव आजादी का स्वतन्त्र की अमरता से

‘जड़ है जीवन, मरण है चैतन्य’, स्वीकारें हम, सजगता से

फिर न होगी कोई त्रुटि, न ग्लानि, न मनोविकार

अमृतत्व को पाने हेतु करें स्वतन्त्रता स्वीकार



डॉ रत्ना पुरोहित 

ratna.purohit@gmail.com

93466 25830


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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami

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