साहित्य मंथन
छायावाद के कवि सुमित्रानंदन पंत
हिन्दी साहित्य का इतिहास में आधुनिक काल : तत्कालीन राजनैतिक गतिविधियों से प्रभावित हुआ है। इसको हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग माना जा सकता है, जिसमें पद्य के साथ-साथ गद्य, समालोचना, कहानी, नाटक व पत्रकारिता का भी विकास हुआ।
विक्रमी संवत् 1800 के उपरान्त भारत में अनेक यूरोपीय जातियाँ व्यापार के लिए आईं। उनके सम्पर्क से यहाँ पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हुआ। विदेशियों ने यहाँ के देशी राजाओं की पारस्परिक फूट से लाभ उठाकर अपने पैर जमाने में सफलता प्राप्त की। जिसके परिणाम-स्वरूप यहां पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई। अंग्रेजों ने यहाँ अपने शासन कार्य को सुचारु रूप से चलाने एवं अपने धर्म-प्रचार के लिए जन-साधारण की भाषा को अपनाया। इस कार्य के लिए गद्य ही अधिक उपयुक्त होती है। इस कारण आधुनिक युग की मुख्य विशेषता गद्य की प्रधानता रही। इस काल में होने वाले मुद्रण कला के आविष्कार ने भाषा-विकास में महान योगदान दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी आर्य समाज के ग्रन्थों की रचना राष्ट्रभाषा हिन्दी में की और अंग्रेज मिशनरियों ने भी अपनी प्रचार पुस्तकें हिन्दी गद्य में ही छपवाईं। इस तरह विभिन्न मतों के प्रचार कार्य से भी हिन्दी गद्य का समुचित विकास हुआ।
इस काल में राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। इसके लिए शृंगारी ब्रजभाषा की अपेक्षा खड़ी बोली उपयुक्त समझी गई। समय की प्रगति के साथ गद्य और पद्य दोनों रूपों में खड़ी बोली का पर्याप्त विकास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली के दोनों रूपों को सुधारने में महान प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा द्वारा हिन्दी साहित्य की सम्यक संवर्धना की।
आधुनिक काल की पृष्ठभूमि :
सन 1857 के विप्लव के बाद ही समाज-सुधार और राष्ट्रीयता का स्वर मुखरित होता है और आधुनिक काल को अलग-अलग विभागों में बांँटा गया है, जैसे कि भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, प्रसाद युग, प्रेमचंद युग और छायावादी युग आदि l
भारतेंदु युग :
नवोत्थान काल के सबसे अधिक व्यापक एवं प्रभावत्पादक स्वरूप के दर्शन हमें भारतेंदु युग में होते हैं l इस युग में भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से गद्य साहित्य की समस्या विधाओं पर उनके समकालीन लेखकों नहीं पता उन्होंने स्वयं लेखनी चलाई l भारतेंदु ने विवादास्पद गधी के स्वरूप को निश्चित किया l
इस युद्ध में नाटकों के प्रधानता रहीं l भारतेंद्र से पूर्व भी दो, चार नाटक लेकर गए थे परंतु वे नाटक कहलाने योग्य न थे l भारतेंदु जी ने स्वयं 14 नाटकों की रचना की इनमें कई प्रहसन भी हैं l इसमें सत्य हरिशचंद्र, मुद्राराक्षस, नीलदेवी, भारत दर्शन चंद्रावती आदि प्रमुख हैं l
द्विवेदी युग :
यह युग आलोचनात्मक युग था l भारतेंद्र के समय में लेखकों ने व्याकरण तथा वाक्य-विन्यास की ओर कम ध्यान दिया l अंग्रेजी पढ़े- लिखे जो लोग श्रद्धा तथा भक्ति के कारण हिंदी के क्षेत्र में प्रविष्ट हुए थे l व्याकरण के नियमों से अनभिज्ञ थे l
दिवेदी युग में हिंदी साहित्य ने अपनी शैशवावस्था छोड़कर युवावस्था में प्रवेश किया l भारतेंदु युग में भी जो बंगला साहित्य का अनुकरण हुआ था, वह द्विवेदी युग में अधिक न रहा l लेखों में मौलिकता आयी और उन्होंने ठोस साहित्य का निर्माण किया l भाषा में परिष्कृत और सांस्कृतिक हुई तथा शैली का भी परिमार्जन हुआl
प्रसाद युग :
यह कहानी तथा नाटक प्रधानता बाबू जयशंकर प्रसाद जी ने आजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, विशाखा, कामाता आदि उच्च कोटि के नाटक लिखे जिनमें प्रसाद जी की महान साहित्यिक प्रतिभा के दर्शन होते हैं l
जिस प्रकार द्विजेंद्र लाला राय ने मुगलकालीन भारत का चित्र उपस्थित किया है उसी प्रकार प्रसाद जी ने विशेष रूप से बौद्धकालीन भारत के इतिहास को अपनाया l प्रसाद जी ने हिंदुओं को सभ्यता तथा नैतिक श्रेष्ठता दिखायी l प्रसाद जी के नाटकों में मनोवैज्ञानिकता पर्याप्त मात्रा में हैं l
प्रेमचंद युग :
यह उपन्यासों का युग था l यद्यपि प्रसाद जी ने भी कंकाल और तितली उपन्यास लिखे थे, परंतु नाटककार के रूप में प्रसाद जी अधिक सफल हुए l "उपन्यास सम्राट "के रूप में प्रेमचंद्र जी आते हैं l इनके प्रतिज्ञा, गबन, गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, सेवा सदन, निर्मला, प्रेमाश्रम आदि उपन्यास अधिक प्रसिद्ध हैं l
प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों में समाज के उपेक्षित लोगों की ओर पाठकों का अध्ययन आकर्षित किया है l प्रेमचंद के युग के अन्य कलाकारों में पंडित विश्वंभर नाथ कौशिक, सुदर्शन, वृंदावनलाल वर्मा, मुंशी प्रताप नारायण, श्रीवास्तव चिंडी आदि प्रमुख हैं l
छायावादी युग :(1920-1936)
प्राय : द्विवेदी युग के बाद के समय को छायावादी युग कहा जाता है l
बीसवीं सदी का पूर्वार्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था l इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेव वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, और सुमित्रानंदन पंत जैसे छायावादी प्रकृति उपासक-सौंदर्य पूजक कवियों का युग कहा जाता है l
छायावादी काव्य की विशेषताएँ :
1. व्यक्तिवाद की प्रधानता - छायावाद में व्यक्तिगत भावनाओं की प्रधानता है यहां कभी अपने सुख-दुख एवं हर्ष शोक को ही वाणी प्रदान करते हुए खुद को अभिव्यक्त करता है।
2. श्रृंगार भावना - छायावादी काव्य शुद्धता श्रृंगारी काव्य है , किंतु उसका श्रृंगार सूक्ष्म श्रृंगार है।
3. जीवन दर्शन - छायावादी कवियों ने जीवन के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण अपनाया है।
4. नारी के प्रति नवीन भावना - छायावाद में श्रृंगार मुख्यतः और सुंदर का संबंध नारी है ।
5. प्रकृति का मानवीकरण - प्रकृति पर मानव जीवन का आरोप छायावाद की एक प्रमुख विशेषता है।
प्रमुख छायावादी कवि और रचनाएँ :
1.जयशंकर प्रसाद:
लहर, आंसू ,कामायनी, उर्वशी, कानन कुसुम, झरना, महाराणा का महत्व, प्रेम पथिक, शोकोच्छ्वास, बुभ्रवाहन, प्रेम राज्य, अयोध्या का उद्धार (केवल झरना से लेकर कामायनी तक छायावादी कविताएं)
2.सूर्यकांत त्रिपाठी निराला :
गीतिका,अनामिका,राम की शक्ति पूजा,परिमल,तुलसीदास, सरोज स्मृती l
3.महादेवी वर्मा :
नीरजा ,रश्मि ,निहार, सांध्य गीत l
4. सुमित्रानंदन पंत :
सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) के कैसोनी गाँव में 20 मई 1900 को हुआ था। इनके जन्म के कुछ घंटों पश्चात् ही इनकी माँ चल बसी। आपका पालन-पोषण आपकी दादी ने ही किया। आपका वास्तविक नाम गुसाई दत्त रखा गया था। आपको अपना नाम पसंद नहीं था सो आपने अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया।
प्रारंभिक शिक्षा :
आपकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में ही हुई। 1918 में वे अपने भाई के साथ काशी आ गए और वहां क्वींस कॉलेज में पढने लगे। मेट्रिक उतीर्ण करने के बाद आप इलाहबाद आ गए। वहां इंटर तक अध्ययन किया। 1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हो गए। हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला का स्वाध्याय किया। आपका प्रकृति से असीम लगाव था। बचपन से ही सुन्दर रचनाएँ लिखा करते थे।
प्रमुख कृतियांँ :
वीणा, उच्छावास, पल्लव, ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन पल्लवणी, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युग पथ, सत्यकाम।
पुरस्कार/सम्मान :
"चिदम्बरा" के लिये भारतीय ज्ञानपीठ, लोकायतन के लिये सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार और हिन्दी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिये उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। सन 1905 में घर के पुरोहित द्वारा विद्यारम्भ कराये जाने के पश्चात् सुमित्रानंदन को कौसानी के वर्नाक्युलर स्कूल में प्रवेश दिलाया गया l संस्कृत तथा पर्शियन भाषा का ज्ञान इन्हें इनके फूफाजी ने कराया तथा अंग्रेजी व संगीत का ज्ञान भी इन्हें घर पर ही प्राप्त हुआ l
इस प्रकार घर पर ही पंत जी को अपने कवि व्यक्तित्व के प्रस्फुटन का अनुकूल वातावरण प्राप्त होता रहा l अल्मोड़ा में इंटर फर्स्ट इयर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात, सेकंड इयर की पढाई करने के लिए ये अपने बड़े भाई के साथ बनारस चले गये l सन 1919 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सुमित्रानंदन पन्त प्रयाग आ गये और 10 वर्ष तक प्रयाग में ही रहे l अपने ‘वीणा’ तथा ‘पल्लव’ काव्य संग्रह की अधिकांश कविताओ की रचना उन्होंने प्रयाग में ही की l
सन 1931 में पंतजी अपने बड़े भाई हरीदत्त पन्त के पास लखनऊ चले गये l जहाँ उनकी मुलाकात महाकवि ‘निराला’ व कालाकांकर स्टेट के कुंवर सुरेश सिंह व उनकी धर्मपत्नी से हुई l कुंवर सुरेश सिंह को उनका सानिध्य इतना भाया की कुछ ही समय में वह प्रगाढ़ मैत्री में बदल गया l इसी मैत्री के फलस्वरूप उनके जीवन का अधिकांश समय कालाकांकर में बीता l कुंवर सुरेश सिंह के आग्रह पर ही उन्होंने वर्ष 1938 में रूपाभ नामक प्रगतिशील मासिक पत्रिका का संपादन किया l
साहित्य सृजन :
नारी पर कविता:
यदि स्वर्ग कहीं है पृथ्वी पर, तो वह नारी उर के भीतर,
दल पर दल खोल हृदय के अस्तर
जब बिठलाती प्रसन्न होकर
वह अमर प्रणय के शतदल पर l
मादकता जग कहीं अगर, वह नारी अधरों में सुखकर,
क्षण में प्राणों की पीड़ा हर,
नव जीवन का दे सकती वर
वह अधरों पर धर मदिराधर l
यदि कहीं नरक है इस भू पर,
तो वह भी नारी के अंदर,
वासनावर्त में डाल प्रखर
वह अंध गर्त में चिर दुस्तर
नर को ढकेल सकती सत्वर l
सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। १९१८ के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। १९२६-२७ में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। १९३८ में उन्होंने ‘” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे।
वे १९५५ से १९६२ तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। “वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है।
उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैं – प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान :
1921 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया था, पर देश के स्वतंत्रता संग्राम की गंभीरता के प्रति उनका ध्यान 1930 के नमक सत्याग्रह के समय से अधिक केंद्रित होने लगा, इन्हीं दिनों संयोगवश उन्हें कालाकांकर में ग्राम जीवन के अधिक निकट संपर्क में आने का अवसर मिला। उस ग्राम जीवन की पृष्ठभूमि में जो संवेदन उनके हृदय में अंकित होने लगे, उन्हें वाणी देने का प्रयत्न उन्होंने युगवाणी (1938) और ग्राम्या (1940) में किया। यहाँ से उनका काव्य, युग का जीवन-संघर्ष तथा नई चेतना का दर्पण बन जाता है।
संग्रहालय :
उत्तराखंड राज्य के कौसानी में महाकवि पंत की जन्म स्थली को सरकारी तौर पर अधिग्रहीत कर उनके नाम पर एक राजकीय संग्रहालय बनाया गया है, जिसकी देखरेख एक स्थानीय व्यक्ति करता है। इस स्थल के प्रवेश द्वार से लगे भवन की छत पर महाकवि की मूर्ति स्थापित है। वर्ष 1990 में स्थापित इस मूर्ति का अनावरण वयोवृद्ध साहित्यकार तथा इतिहासवेत्ता पंडित नित्यनंद मिश्र द्वारा उनके जन्म दिवस 20 मई को किया गया था। महाकवि सुमित्रानंदन पंत का पैत्रक ग्राम यहां से कुछ ही दूरी पर है; परन्तु वह आज भी अनजाना तथा तिरस्कृत है। संग्रहालय में महाकवि द्वारा उपयोग में लायी गयी दैनिक वस्तुएँ यथा शॉल, दीपक, पुस्तकों की अलमारी तथा महाकवि को समर्पित कुछ सम्मान-पत्र, पुस्तकें तथा हस्तलिपि सुरक्षित हैं।
निधन :
28 दिसम्बर 1977 को आपका निधन हो गया।
सुनीता प्रयाकर राव
करीमनगर
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