Wednesday, January 12

हिंदी साहित्य का पूर्व भाग - प्रसादराव जामि (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


हिंदी साहित्य का पूर्व भाग

 

    हिंदी साहित्य का पूर्व भाग भारतीय संस्कृति संप्रदायों से जुड़ा हुआ है। भारतीय साहित्य के विभिन्न संप्रदाय हैं। वेदों, पुराणों, उपनिषदों  में भारतीय हिंदी साहित्य का वर्णन  अनेक प्रकार झलक दिखाई पड़ती है।  वेदों ,पुराणों, उपनिषदों की भाषा देव भाषा संस्कृति है। देवताओं और दानवों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहा ।दानव भ्रष्ट थे और देवताओं को पकड़कर मारते थे ।और देवताओं पर हिंसा करते थे। इस तरह दानव को हर वक्त देवताओंको के ऊपर जुलूस करते और उन्हें तंग करते रहते थे। सभी देवता गण देवताओं की श्रेष्ठ विष्णु भगवान के पास सभी देवता गण जाते हैं ।देवता विष्णु परेशान हो जाते हैं। और इनकी कठिनाइयों का कैसे दूर किया जाए बड़ी सोच में पड़ जाते हैं। तब उन्हें देवताओं के गुरु बृहस्पति स्मरण आते हैं। तब विष्णु मूर्ति देवों के गुरु बृहस्पति के पास देवताओं को भेजते हैं ।सभी देवता गण मिलजुलकर बृहस्पति के शरण में जाते हैं।  अपनी आपत्ति बताते हैं ।तब बृहस्पति उनकी व्यथा को सुनकर उन्होंने सोच विचार करके एक भोग दर्शन का मार्ग निकालते हैं और वह देवताओं को कहते हैं कि यह ग्रंथ आप जाकर दानव में यह विषय फैलाए की यह ग्रंथ से बहुत लाभ है तब वह भोग विलास में पड़ जाएंगे और आप को छोड़ देंगे। सभी प्रसन्नता खुशी से उत्सुक होकर बृहस्पति को प्रणाम करते हैं और विदा लेते हैं। कुछ दिन बाद बृहस्पति उस ग्रंथ का पूर्ण करते हैं और उसी ग्रंथ का नाम चार्वाक दर्शन रखते हैं। कुछ दिन पश्चात देवता बृहस्पति के दर्शन के लिए जाते हैं। बृहस्पति उन्हें अपने द्वारा लिखी गई भोग विलास चार्वाक दर्शन को देवताओं को देते हैं और देवताओं से कहते हैं कि इसे आप मत पढ़ना और जाकर दानवों को तक पहुंचा देना देवता जी गुरु जी कहकर बृहस्पति से विदा लेते हैं और दानव तक पहुंचाने के लिए कुछ देवता ही निकलते हैं। जाते-जाते मार्ग में वह बहुत थक जाते हैं और एक पेड़ के नीचे विश्राम करते हैं ।तब उनमें से एक देवता को लगती है कि इसमें एक ग्रंथ क्या है हमें क्यों पढ़ने के लिए मना किया गया इसमें भाव क्या है। जरूर इसमें कुछ रहस्य छिपी हुई है ।उसे भी हम देवताओं क्यों ना ग्रहण करें इस प्रकार वह ना मानते हुए भी वह पुस्तक की पठन चार्वाक दर्शन को पड़ने लगता है पर वह बहुत अच्छा महसूस करता है। इतना अच्छा महसूस करता है कि इनकी भावनाओं को समझ लेता है और उसे उसे बहुत पसंद आती है बाकी देवताओं ने वह विषय फैला देता है कि यहां ऐसा ऐसा लिखा गया है कि स्वर्ग को पाना है तो हर दिन अलग-अलग स्त्री से संभोग करना यह बहुत बड़ी बात है और सुंदर सुंदर अति सुंदर स्त्रियों से भोग करना संभोग करना यह बहुत उससे हमें स्वर्ग प्राप्त होगा। यह बात बृहस्पति ने हम से छुपाया है। हमें करना है। बल्कि उन्होंने उल्टा सोचने लगा और वह पुस्तक दानवों को नहीं दिया और वह स्वयं पढ़ने लगे और भूमि पर आकर अनेक भूमिपर निवास स्त्रियों के साथ संपर्क जोड़ने लगे और जो भी सुंदर स्त्री उनकी नजर में आती थी। उनके साथ वह भोग संभोग करने लगे।

     हिंदी शब्द का अर्थ संस्कृत से हिंदी का विकास हुआ है यह 545 ईसवी में हिंदी ईरानियों देशों के द्वारा दी गई वरदान है। यह ईरानियों सिंधु नदी को सही-सही पुकार नहीं सकते थे वह सिंधु को हिंदू कह कर बुलाते थे क्योंकि सी अक्षर के बदले हुए हि अक्षर का प्रयोग करते थे। और धू के बदले दू का प्रयोग करते थे। अनुस्वर का प्रयोग तो अनुस्वर करते थे। इस तरह सिंधु हिंदू बन गई ।हिना का अर्थ यानी हिंदी हिंदू दो शब्दों से बना है हिना का अर्थ है दुष्ट और दुकान थे ।दुष्टों का नाश करने वाला अब हम साहित्य की बात करते हैं ।संस्कृत को वांग्मय कहते हैं। वांग्मय मैं दो शब्दों से बना है एक है वह दूसरा है मैं जो कुछ बोला जाता है उसे हम साहित्य कहते हैं। साहित्य हिंदी साहित्य का पहला भाग 10 वीं शताब्दी में हम ले सकते हैं इसे का काव्यमीमांसा जो राजशेखर ने लिखी है। दूसरी प्रकार कार्य राजा भोज ने लिखी है उसकी रचना है सरस्वती कंठ अभरण। अब तीसरी का भी है शैलेंद्र जी श्रुति श्रुति तिलक इसी तरह संस्कृत के आचार्य धामा ने काव्यालंकार लिखा और दूसरी संस्कृत की रचना है रुद्राक्ष भी काव्यालंकार लिखें और तीसरे हैं मम्मट काव्यप्रकाश लिखें उन्होंने यह कहा कि तक दोषों शब्दार्थ सगुना अलंकृति पुनः का वापी इसका अर्थ है कि काव्य में शब्द हो सकते हैं 200 शब्दों का अर्थ हो सकता है शगुन राशि हो सकता है या पुणे हो सकता है हर प्रकार के विषयों को हम काव्यप्रकाश में डाल सकते हैं हिंदी साहित्य के इतिहास को विभिन्न दृष्टिकोण से अलग-अलग देखा जा सकता है पराया आध्यात्मिक आदर्श मुल्क रहा है इसका भौतिक घटनाओं की 16 अध्यात्मिक तत्वों प्रभात प्रभात तो जोड़ना चाहिए


भारतीय दर्शन शाश्त्र            

*दार्शनिकों के अनुसार भारत दो शब्दौ से बना है।

भा शब्द का अर्थ ज्ञान, रत शब्द का अर्थ खोज।

*अंर्तदृष्टि द्वारा एन्न्दिया एवम अनैन्दिर्य अनुभूति या साक्षात्कार ही दर्शन है।

*परम्परागत जीवन और ्जगत की प्रारंभ और अंत को परमतत्व को देखना ही दर्शन शाश्त्र है।  

*जीवन और जगत को पढना ही दर्शन शाश्त्र है।

*ज्ञान के प्रति जिज्ञासा से उत्पन्न ही दर्शन शाश्त्र है।

*दृश्यते इति दर्शनम्।

*श्वयम से आत्मा साक्षात्कार करना ही दर्शन शाश्त्र

*दर्शन शाश्त्र को अंग्रेजी मेphilosiphyकहते हैं।

Philosophy शब्द ग्रिक भाषा से ली गई है।

Philosophy शब्द दो शब्दों से बना है।

Philosशब्द का अर्थ हिंदी मे प्रेम,

Sophiaशब्द का अर्थ हिंदी मे ज्ञान

ग्रिक देश मे sophiaनाम की एक सुंदर युवती हुआ करती थी। philosophyका अर्थ पाश्चात्य देशो का

मत है कि प्रेम से ज्ञान की ओर।

*संश्कृत भाषा के अनुसार दर्शन द्रश्,युट

इसका अर्थ अंतर द्रष्टि से देखना।

*हिंदी मे दर्शन शब्द द्रश धातु से बना है।इसका अर्थ है देखना।

*हर एक इन्सान दार्शनिक है।

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        भारतीय दर्शन शाश्त्र के प्रकार

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आश्तिक  : वेदों को मानने वाला

*संख्यादर्शन :महर्षि कपिल मुणि(सत्यकारीवादी सिद्धांत प्रमाण है।१तत्वश्तर और बुद्धि का विशद विवरण श्रृष्टि का क्या  क्रम ३प्रकृति और पुरुष से श्रृष्टि कैसे बनती है? प्रकृति और पुरूष का श्वरूप क्या है?५अंत मे मोछ प्राप्ति के लिए प्रयास करता है।)

*योग दर्शन  :पतंजलि महर्षि(इनका प्रमुख मत है ओम श्री परमात्मे नमः, वे चार सूत्रों को मानते हैं।१समाधीवाद२साधना३विभूतिवाद४कावल्यवाद)

*न्याय दर्शन  :महर्षि गौतम,गणेश उपाध्याय(जिस प्रक्रिय द्वारा मश्तिष्क तर्क के माध्यम से उचित निष्कर्ष पर पहुंचे इसे न्याय दर्शन शाश्त्र कहते हैं।न्याय शाश्त्र के१६सूत्र हैं।प्रमाण,प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क,निर्णय, वाद,जल्प,वितंडा, हेत्वावाद,छल,जाति, निग्रह)

*वैशेषिकदर्शन:कणाद महर्षि(विशेष को अधिकृत करके बताए जाने वाले शाश्त्र को वैशेषिकदर्शन कहते हैं।इस दर्शन मे छह पदार्थ हैं।द्रव्य,गुण,कर्म,सामान्य, विशेष, संवायन।पदार्थों के गुण,धर्मों की चर्चा की जाती है।)

*पूर्वी मीमांसा  :जैमनी महर्षि(प्रमाण तर्क के द्वारा विषय की विवेचना की शाश्त्रीय वचनों को लेकर की जाने वाली।तत्व,ज्ञान, मूल्य मीमांसा।*मीमांसा दर्शन का मुख्य विषय वाक्य है।)

*उत्तरी मीमांसा(वेदांत दर्शन):बादरामण महर्षि(वेदों का अंतिम शाश्त्र वेदांत शाश्त्र है।ब़ह्म सूत्र सिद्धांत भी कहते हैं।वेदान्त वेद उपनिषदों को मानता है।अतःब्रह्म जिज्ञासा:।वेदान्त प्रमाण, सृष्टि पर आधार है।)

*आश्तिको का कथन है।

ईश्वर के बिना कुछ नहीं।हमारा जन्म ईश्वर की देन है।हमारा जीवन मरण सब कुछ ईश्वर के हाथों मे है।

जो अच्छे कार्य से श्व़र्ग को प्राप्त कर सकते हैं

और बुरे कर्मों से नरक प्राप्त कर सकत है।

अच्छे कर्मों से पुनर्जन्म भी प्राप्त होता है।

नाश्तिक  :वेदों को मानने वाला

*जैन दर्शन   :जैन महर्षि(जैन धर्म)

*बौद्ध दर्शन   :गौतम बुद्ध महर्षि(बौद्ध धर्म)

*चार्वाक दर्शन :चार्वाक महर्षि(चार्वाक धर्म)

ईश्वरवादी   :ईश्वर को माननेवाला।

योग दर्शन,न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, वेदांत दर्शन।

अनिश्वरवादी :(ईश्वर को मानने वले)जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन, चार्वाक दर्शन, संख्या दर्शन, पूर्वी मीमांसा।

 

चार्वाक दर्शन

*अन्र्तदृष्टि द्वारा ऐन्द्रीय एवं अनैन्दिय अनुभूति या साक्षात्कार ही दर्शन है।

*चार्वाक दर्शन को नाश्तिक शिरोमणी उपाधि से बुलाया जाता है।

*चार्वाक शब्दों चर्व,वाक शब्दों से बना है।

*चर्व शब्द का अर्थ खान पान।

*वाक शब्द का अर्थ बात।

*चार्वाक शब्द का अर्थ है खाने पीने की बाते।

*पुराणो के अनुसार देवताओं के सौतले भाई असूर थे।देवताओं के अनुसार सूर अच्छे हैं, और असूर बुरे हैं।देवताओं के गुरु गुरु बृहश्पति देव और असूर समान शिक्षा दी।भगवान विषणु के आदेश पर गुरु बृहस्पति चार्वाकों को नाश्तिक ज्ञान की बोध दी।

चार्वाक दर्शन हिंदुओंऔरसभी  धर्म ग्रंथो का खंडन ंकरता है।चार्वाक दर्शन को लोकायत दर्शन भी कहा जाता है।

*चार्वाकों का सिद्धांत है

यावत् जीवित् सुखमय जीवेत्:

इसका अर्थ है सभी लोगो का जीवन सुख हो।

*चार्वाक दर्शन ईश्वर, श्व़र्ग, परलोक, पुर्नजन्म,पाप ,पुण्य,मोछ को नहीं मानता।इसी लोक का विचार करता है।इसीलिए चार्वाक दर्शन को भौतिक दर्शन

भी कहा जाता है।वह हर पल हर क्षण खुशी और सुखी से जीना चाहता है।यह शरीरमिट्टीहै।मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी।शरीर नशवर है।आत्मा भी शरीर के साथ साथ समाप्त हो जाएगी।

* 

एक कहता है मेरे पिता का श्व़र्गवास हो गया।पांच हजार लोगों को बुलाता है और उनकी यादमे भोजन खिलात है।

चार्वाक उसके पास जा कर कहता है,पिता को तुमने जिदंगी भर खाना नहीं दिया।आज मरने के पश्चचात् पिता के नाम पर खिलाना व्यर्थ है।मैंने अपने पिता का कर्मकाण्ड नहीं किया।जब तक मेरे माता पिता जिन्दा रहे मैंने उनकी सेवा की।उनके मृत्यु के बाद मैंने किसी को उनके नाम पर खाना नहीं खिलाया।उनके मृत्यु के बाद इस लोकायतन से संबंध जोडो।

 चार्वाक दर्शन तीन तत्व है।

१नीति मीमांसा २ज्ञान मीमांसा३तत्व मीमांसा

१नीति मीमांसा  :संश्कृत मे एक प्रचलित चौपाई है।

याव् जीवेत् सुख जीवेत्

ऋण कृत्वो घृतं पिवेत्

भश्मोभूतश्य्  देहश्य्

पुनर्जन्म   कुतः

इस का अर्थ है जीवन को दिल खोलकर जीना है।

पुर्नजन्म नहीं है।जहाँ दुख है वहीं नरक ,जहाँ सुख है वहीँ श्रवर्ग।

      अधिक से अधिक लोग सुख पाने के लिए, दु्खौ को जीवन भर झेलते रहते हैं।वाश्तव मे जो उसके पास है, उस से वह सुख रह सकता है।पर सुख कहीँ मिलेगी सोचकर भटकते रहता है।तृप्ती ही हमारा सुख हैऔर असंतृप्ती ही हमारा दुख है।

    इस दुनिया मे हम जब आए थे।हम अपने साथ कुछ नही लाए    और इस दुनिया को छोड़कर जब जाएंगे हमारे साथ कुछ नहीं आएगा।बस अच्छा या बुरा नाम ही इस दुनिया मे रहेगा।जब तक यह शरीर है खुश रहो।इस लोक को श्व़र्ग बना दो।हमारे जीवन का हर पल हर क्षण आनंदमय हो।

 

2*ज्ञान मीमांसा 

 ज्ञान मनुजश्यम तृतीय नेत्रम्ः                

*ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है।

*वह प्रमाण को मानता है।

*वह प्रत्यक्ष को मानता है।

*जगत को सत्य मानता है।

*ईश्वर को नहीं मानता है।

*धर्म जाती को नहीं मानता है।

*श्रवर्ग और नरक को नहीं  मानता है।

*मोछ को नहीं मानता है।

*उदाहरण 

गुलाब का फूल काटों के बीचोबीच से निकाला जाता है।

*मछली की सेवन के लिए मछली की काटें निकाल कर सँतृप्ती से खाना ही सुखमय जीवन है।

हर पल खुश रहो।

*हृर घडी बदल रही है रूप जिदंगी

छाव हैं कहीं पर धूप जिदंगी

हर पल जिऔ जी भर जिंऔ

जो है समा कल हो हो।

वे भूत भविष्य को नहीं मानते हैं।

वे पुरूष और श्त्री दोनो को समान मानते हैं।

    वे अपनी पत्नी को कुन्कम तक  नहीं लगता है और कहता है कि तुम भी मेरे मां के समान हो।मेरे समान हो।

    गांधी ,राजाराममोहनराय,श्वामी विवेकानंद ने वर्तमान समाज की भलाई और समाज की सुख चिंतन मार्गों मे चले।

    चार्वाक ने राजाऔ का समर्थन किया।

    ब्राह्मणौ की तीर्व विमर्श के कारण,निन्दा के कारण,

    अंत मे लोगों ने चार्वाक मुणि को शूली पर चढाया

 

- तत्व मीमांसा

*शरीर खत्म आत्मा खत्म

खेल खत्म दुकान बंद

*आज पर विश्वास

*चर्तु भूतों से संबंध रखता हैऔर अपने आप को उन्हीं    से उत्पन्न हुआ समझता है।

*यर्थाथवाद को वह मानता है।

*पृथ्वी, जल,वायु, अग्नि जो आखों से देखी पर विशवास रखता है।वह आकाश को नहीं मानता।

*ईश्वर नहीं, आत्मा नहीं, श्वर्ग नहीं, नरक नहीं।

वह कहता है कि इसी लोक को श्व़र्ग बना दो।

*उदाहरण के लिए उनका मानना है कि कोई वश्तु सढ जाए उसमे से कीडे मकोड़े जन्म लेते हैं।उसी तरह मेरा भी जन्म हुआ है मरण के पश्चचात्य मेरा शरीर भी नश्वर हो जाएगा।आज हम पाश्चात्य देशों को देखकर valantanceday  का नया अनुकरण कर रहे हैं।

    छठवी शताब्दी में ही हमारे देश में प्रबंधचंर्दोत्सव त्यौहार मनाते थे।इस त्यौहार मे रात भर सभी लोग मिलकर नृत्य करते थे।चार्वाकों हमेशा कहा करते थे।

    सर्वदर्शन संग्रह प्रबंध चंर्दोदयः।


बौद्ध धर्म

    बौद्ध धर्म की स्थापना 620 ईस्वी में हुई। तत्कालीन सामाजिक स्थिति, धर्म, शिल्पी कला ,व्यापार श्रेणी, व्यवस्था और राज्य व्यवस्था के आधार पर जानकारी से हमें प्राप्त होती है ।बौद्ध साहित्य दो भाषाओं में प्रचलित है। पहली वाली प्रारंभिक भाषा जो पाली भाषा में लिखी गई और दूसरी भाषा देव भाषा संस्कृत भाषा बौद्ध साहित्य का प्रारंभिक भाषा पाली भाषा रही। इसमें त्रिपिठक साहित्य बौद्ध साहित्य पहला है। त्रिपिटक माननीय तीन बार पीठ साहित्य तीन पिठक साहित्य में पहला पिठक है। सुक्त पिठक दूसरा है विनय पिठक। तीसरा है अभिधम्म पिठक।प्रथम सुक्त पिठक बैठक में बुधनी कथा वाचन की यानी बुध के उपदेशों का संग्रह करता है।आनंद ने इसमें लिपिबद्ध रूप से सुक्त निकायों का बाटा गया ।आनंद पाली भाषा लिपि में सर्वप्रथम बुद्ध की कथा का वर्णन उन्होंने किया। सुक्त निकल के निकायों को 5 भागों में बांटा   इसमें बौद्ध संघ का नियमों का पालन कैसे किया जाता है। इस विनय पाठक में प्रस्ताव लाया गया। इसका निर्माण आनंद कर्ता के गौतम बुध के दूसरे शिष्यओ पानी के द्वारा किया गया पानी ने प्रति मोक्ष सुख का विभिन्न खत्म भी की रचना की अब तीसरी बैठक आती है। अभी दम इसने मोगली पुरुष के दृश्य रचना की बौद्ध दर्शन का संग्रह इन्होंने 48 भागों में की विभिन्न कथावस्तु यमक पठान बुद्ध वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था को करते थे। यदि कोई व्यक्ति संघ में प्रवेश करता है तो उसकी जाति एवं वन अपने आप समाप्त हो जाएंगे। वह सिर्फ बौद्ध भिक्षु बन जाएगा 73 महिलाओं द्वारा बताए गए संग्रह गाथा यह सिर्फ अब दूसरा में बहुत संस्कृत साहित्य यानी संस्कृत भाषा में बौद्ध धर्म का रचनाएं बहुत संस्कृत साहित्य ने महत्वपूर्ण ग्रंथ ललित विस्तार है ।इसकी रचनाकार हरीभद्र है। ललिता विस्तार पर एडमिन और अर्नाल्ड ने अंग्रेजी में लाइट ऑफ एशिया नामक ग्रंथ लिखा था। इसने गौतम बुध के बारे में विस्तार से वर्णन निर्माण किया गया है ।मूर्ति निर्माण किया गया है ।जो बुध की पहली मूर्ति मथुरा शैली मानी जाती है। बहुत संस्कृत साहित्य में दूसरी साहित्य विश्व की मांग मानी जाती है। इसकी रचना का रचना है ।बुद्धू विश्व दिमाग में बौद्ध साहित्य निदान गाथा पर आधारित है। इसी निदान का था पहली बुध की जीवनी दी गई है। नीलम दी पन हो नाक से ना इसी तरह 75 प्रकार के व्यवसाय के बारे में भी श्रेणी व्यवस्था महावास्तु 32 प्रकार के लिपियों की जानकारी दी।

    यहां मैं आपको एक विषय बताना चाहता हूं ।गौतम बुद्ध एक राजकुमार थे। उनका नाम था सिद्धार्थ ।वह बचपन से ही रोगियों को, बदसूरतओं को नहीं देखा था ।राज महल में अपने मां पिताजी भाई बहनों से खुश सुंदरवन में रहता था। एक सुंदर युवती यशोधरा से उनका विवाह हुआ और उन दोनों का मिलन से सुंदर अति सुंदर राहुल सुपुत्र का जन्म हुआ। पर भी वह खुश ना थे। मुरझाए हुए फूल भी कभी नहीं देखे थे। एक दिन वह शहर को देखने के लिए पहली बार गए शहर में उन्होंने कई लोगों को देखा जिसके पास खाने के लिए खाना नहीं, पहनने के लिए कपड़ा नहीं, रहने के लिए मकान नहीं, वो देने के लिए चादर नहीं इस प्रकार अनेक रोगों को भी रोगियों को भी देखा तब उनके मन में बड़ी ठोस पहुंची तब उन्होंने इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए राज्य छोड़कर वनवास जाने के लिए तैयार हो गए और वन में जाकर बौद्ध वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या किए और अपना जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पण किए।

        धीरे-धीरे मूल संस्कृत भाषा कई भाषाओं में  की जननी है ।सर्वप्रथम संस्कृत डिंगल-पिंगल  की भाषाओं की जननी बनी। पठन हेतु डमरू की आवाज में पढ़ी जाती थी।  डिंगल- पिंगल की लिपि सर्प लिपि थी। हमारी भारतीय संप्रदाय और सनातन धर्म के अनुसार हमारी मूल भाषा संस्कृत है। वेदों और पुराणों की भाषा संस्कृत में लिखी गई है।अनेक विद्वानों के अनुसार उपनिषद भी संस्कृत भाषा में ही लिखी गयी है। कालांतर संस्कृत भाषा मैं परिवर्तन होने लगी और अनेक भाषाओं की संस्कृत भाषा जननी बनी है।

    राहुल सांकृत्यायन के अनुसार हिंदी के प्रथम कवि सरहपा माने जाते हैं। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार हिंदी के प्रथम काल भी अपभ्रंश काल को माना जाता है। जो हिंदी साहित्य के पूर्व भाग में हम प्रारंभ  हुआ है। अपभ्रंश काल की तीन धार्मिक रचनाएं हैं। सिद्ध,नाथ, जैन चार्वाक है।


सिद्ध

    सिद्ध 84 सिद्धों के नाम के है। सरहपा कंकालीपाअमीनपा, गोरक्षपा, चौरंगीपा, दिनापा, शांतिपा, संदीपा, चमड़ीपा, कपड़पा,नागार्जुन, कन्हापा, आकरपा,नरियापा थकनापा, आरोपा, शिल्पा, तिलोपा, छत्रपालपा, भद्रपदपा, संदीपा, आजापा, दीपा, काल्पा, धूमदीपा, कंगनापा, कमरिया,डेंगीपा, बधाईपा धंधेपा करियापा, धर्मपाल, महिमापा,महिपाल, अंकित, इप्पलापा, भुजपा, इंद्रभूति,कोपा, कुंडलीपा, कमरिपा, जालंधरपा, राहुल ,ध्रुव रीवा, दुख रीवा, मेदिनीपुर , एंजेलापा, घंटापा, जोगीपा, चुकापांडरीबा निर्गुण पर जयंत जयंत चट्टी पर चंपा का पार्क देखना पाली पाली पाली पाली भद्रपद कल कल कल कल आप कंकाली परी उधर ही पर कपल पर कृपा सागर पर्व भक्षक बोध तारीख का लिफाफा कोकिला पलंग पर लक्ष्मी कडपा समुद्र भली पा यानी सिद्धू के अंत में अदरक  शब्द जाता है इसलिए चौरासी सिद्धों के अंत में अक्षर मे पा अक्षर से पहचाना जा सकता है। यह सिद्ध है। किसी भी भाषा के साहित्य को उनके साहित्य के आधार पर लिखा जाता है। साहित्य की दिशा के आधार पर यह समाज के आधार पर हिंदू धर्म के आधारभूत वेदों, उपनिषदों, पुराण हैं। हिंदू धर्म का दूसरा नाम सनातन धर्म है। वेदों को किसी सुरती के नाम से पुकारते हैं ।संहिता ब्राह्मण ने अरण्यकम, उपनिषद राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सिद्ध के प्रथम कवि सरहपा हैं। सरहपा की रचना दोषृकोष है। इस रचना में गुरु की सेवा के बारे में लिखा गया है। सरहपा के मुख्य शिष्य है ।सरहपा की रचना चर्या पद है ।सिद्ध सरहपा सातवीं शताब्दी के माने जाते हैं ।साहित्य के अनुसार कुल मिलाकर सिद्ध कवि 84 हैं ।सिद्धों में प्रथम कवि  सिद्ध कवि धनपाल माने जाते हैं ।सबरपाल सहज और साधारण जीवन बिताई थी। सिद्धों  जीवन को सर्वोपरि माना बंधनों से मुक्त जीवन उन्होंने निभाया। ईश्वर की उपासना करते थे और बंधन मुक्त  जीवन जीते थे और तपस्वी मुख्य रूप वे थे ।उन्हें बंधन से संबंध ना था और वह सहज जीवन जीने वाले नहीं थे। वह ईश्वर की उपासना करते हुए अपना जीवन यापन करते थे। 84 सिद्ध मैं मछोरा ,चमार ,धोबी ,डोम , कुम्हार, लकड़हारे, दर्जी ,शूद्र निम्न जातियों के थे। इनमें से अग्रवर्ण कोई नहीं थे। सब निम्न वर्ग के जाति के थे। सिद्ध विद्याधर राजा हरिश्चंद्र की परिक्रमा का वर्णन भी सिदध शारंगधर आयुर्वेद की ग्रंथ लिखे ।वह अच्छे सूत्र कार थे। इसलिए उन लोगों को सिद्ध कहा गया। उनका मुख्य लक्ष्य था कि सिद्ध पाना ही सिद्ध का अर्थ है ।स्वर्ग प्राप्त करना या ईश्वर को पाना इसी सिद्ध का लक्ष्य था। इसलिए उनका नाम सिद्ध गया भरत मुनि ने अपभ्रंश नाम देखकर लोग भाषा को देश भाषा का अपभ्रंश भाषा या प्रकृति भाषा का नाम दिया। सिद्धों की रचना सातवीं शताब्दी से मिलती है। सातवीं शताब्दी में श्रावकाचर की रचना देव सेना चार्य दोहे अपभ्रंश भाषा में उन्होंने लिखा ।अपभ्रंश भाषा की एक दोहा को हम पठित करते हैं।

 पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ । देहहि रूध्द बसंत जाण।

अमणागमण तेन बिखंडिअ । तोबि णिलज्जइ भणइ हऊं पंडिअ ।।

         तत्सम संस्कृत संकोच में घटती गई। बौद्ध धर्म विकृत होकर वज्रयान संप्रदाय के रूप में देशों के पूर्व भागों में प्रचलित थी। बहुत तांत्रिकों बीच वामाचार अपनी चरम सीमा को पहुंची गई। यह बिहार से लेकर आसाम तक  फैली थी। और सिद्ध कहलाते थे। 84 सिद्ध इन्हीं ने हुए सिद्धियों और विभूतियों के लिए प्रसिद्ध थे 10 वीं शताब्दी से ही पाया जाता है ।बिहार के नालंदा और विक्रमशिला विद्यापीठ अनेक प्रमुख स्थान थे 84 शब्द के नाम संस्कृत रचनाओं के अतिरिक्त अपनी वाणी अपभ्रंश मिश्रित देश भाषा या काव्य भाषा में भी बराबर सुनाते रहे। बौद्ध गान दोहा बंगला अक्षरों में प्रसिद्ध रचना है ।शब्दों में भी सबसे पुरानी सरह हैं ।उनका पूरा नाम सरहपा है ।विनयतोष भट्टाचार्य ने सिद्धों को समय विक्रम संवत् 690 माना जाता है। बौद्ध धर्म तांत्रिक रूप धारण किया था ।उसने से पांच ध्यानी बुद्ध और शक्तियां के अतिरिक्त अनेक बोधी तत्वों की भावना की गई जो सृष्टि की परिचालन करते हैं।

    बौद्ध धर्म से अलग होकर वज्रयान संप्रदाय सिद्ध धर्म बना देश की पूर्वी प्रांत वज्रयान संप्रदाय का प्रसार बड़ा जैसे बिहार आसाम उड़ीसा के राज्यों में इस सिद्ध संप्रदाय का प्रसार बड़ा यह तांत्रिक थे जनता का बहुत बड़ा विश्वास था राहुल सांकृत्यायन के अनुसार 84 सिद्धू ने मिलकर सिद्ध साहित्य की रचना की राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सरहपा इनके प्रमुख प्रसिद्ध कवि थे 84 सिद्ध होने नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय में रहकर अपना सिद्ध संप्रदाय का प्रसार किया आठवीं शताब्दी में विक्रमशिला राजा धर्मपाल भागलपुर जिले में किसकी स्थापना की गई उसके पश्चात धर्मपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय नालंदा जिला में स्थापना की दसवीं शीला में 10 वीं शताब्दी में सिद्धू ने वज्रयान संप्रदाय का मूल प्रारंभ की वज्रयान संप्रदाय की प्रमुख विशेषता शांत रस और श्रृंगार रस में रचना लिखी। शब्दों की भाषा संस्कृत अपभ्रंश और देश कार्य की भाषा थी इनकी रचनाएं दोहे चौपाई छंद में लिखी गई यह 3 भोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए स्त्री योग्य स्त्री भोग का आवश्यक मानो निर्गुण प्राप्ति के लिए स्त्री भोग संसर्ग आवश्यक माना गया और भिन्न-भिन्न स्त्रियों की बुक के बारे में भी उन्होंने चर्चा की निर्वाण सुधा को सहवास सुधार के समान बताया गया सिद्धू में राहुल सांकृत्यायन के अनुसार प्रमुख कवि सरहपा माने जाते हैं सरहपा का जन्म 769 ईसवी माना जाता है यह ब्राह्मण थे इनकी रचना दोहा कोश अब सराफा के बाद दूसरा स्थान समर्पण को जाता है शबरपा का जन्म इसी 780 माना जाता है यह क्षत्रिय परिवार में इनका जन्म आना जाता है।शबरपा  सरहपा के शिष्य थे अब तीसरा स्थान लुइपा को जाता है वे कायस्दा  परिवार में जन्म हुआ।लुइपा सरहपा के शिष्य थे। अब शब्दों में चौथा है डोम्भिपा 840 ईसवी में इसका जन माना जाता है इन्होंने डोम्भि गीतिका, योग चर्या की रचना की। सिद्धू में पांचवा स्थान कन्हा पार्क हो जाता है कन्हा पा कर्नाटका में पैदा हुई 820 ईसवी माना जाता है इनकी गुरु जालंधर पर थे कन्हा पानी दो 72 दार्शनिक ग्रंथों की रचना की शब्दों में छठवां स्थान कुवकुरिपा को जाता है इनका जन्म कपिलवस्तु ब्राह्मण परिवार में हुआ था इनके गुरु चर्पटिया थे।

    सिद्धों के नाश के बारे में एक निज गाथा है। सिद्ध कैसे विनाश हुए।  खिलजी 11इसवी में अपना राज्य भर बिहार,आसाम, उड़ीसा राज्यों मे स्थापना भी की थी ।उस वक्त बीमार पढ गए।आरोग्य स्थिति खराब हो गई। वह बीमार पड़ गए ।तब उनकी चिकित्सा के लिए उनके राज्य की ओर से उन्होंने कई लोगों को आमंत्रित किया। पर वह बीमारी से मुक्त ना हो पाए ।तब उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला के बारे में उनको पता चला। तब उन्होंने उन सिद्धियों को बुलाया और उन्होंने उन से अनुरोध किया कि मेरा आरोग्य सही कर दो। उन्होंने खिलजी की बातें मान ली। सिद्ध ने उनका इलाज प्रारंभ कर दिया खिलजीअपना धर्म ग्रंथ कुरान सिद्धो को दिया ।सिद्ध ने अपने तांत्रिक शक्तियों से कुछ कुरान के पन्नों पर उन्हें औषध को डाला और खिलजी को कुरान पढ़ने के लिए कहा ।जैसे-जैसे खिलजी कुरान पढ़ते गए उसका शरीर वैसे-वैसे शरीर स्वस्थ होता गया। जब वे कुरान पढ़ते थे पन्ना पलटने के लिए उन्होंने अपनी उंगलियों को मुंह में लगाते गए और पन्ना पलटते थे जब उनकी उंगलियों में जब मुह मे जीभ पर दवा लग जाती थी ।तो  पन्ना पर जो औषध थी वह खिलजी के गर्भ में जाकर उसे आरोग्य कर दिया। तब उन्हें पता चला हिंदुस्तान के भारतीय सिद्धों में इतना ज्ञान है ।तो उन्होंने सोचा यह तो हमारे देशों से ज्यादा ज्ञानी है ।और मैं स्वस्थ हो गया हूं। इनको ऐसे ही छोड़ दिया दिया गया तो सारे विश्व में छा जाएंगे और सारे विश्व का शासन करेंगे। इस डर से उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय को जला दिया और उस विश्वविद्यालयों में जो पुस्तकालय था वह तीन तीन महीने तक जलती रही। अगर वह ज्ञान का भंडार अगर हमारे पास आज होता तो हमारी देश की स्थिति कैसी होती इसीलिए शत्रु पराक्रम आक्रमण के कारण हमारा देश जो भविष्य दिखाने वाला था ।वह आज भविष्य की ओर देख रहा।

 

नाथ

    हिंदी साहित्य के पूर्व भाग में नाथों की संख्या 9 है। इसमें गोरखनाथ के गुरु का नाम चंद्रनाथ कहा जाता है। और एक विषय यह भी है कि गोरखनाथ और मत्स्येंद्र नाथ दोनों भी सिद्ध थे। और सिद्ध की की मार्ग से उनकी गतिविधियों से नापसंद होकर इन्होंने पश्चिमी राज्यों में नाथों की संप्रदाय का प्रारंभ किया। नाथ संप्रदाय के प्रतिनिधि कवि मछंदर नाथ हैं। गोरखनाथ की पतंजलि में ईश्वर प्राप्ति के बारे में लिखी गई है। मत्स्येंद्र नाथ की  जालंधर को आदिनाथ भी कहते हैं। जालंधर बाल नाथ भी कहते हैं। गोरखनाथ के समय 10 वीं शताब्दी माना जाता है। मीनापा के गुरु चरपतिनाथ हो सकते हैं। गोरखनाथ हट योग साधन ईश्वर बात को लेकर चले थे। गोरखनाथ के गुरु का नाम मरस्वेंदद्र नाथ जी हैं ।गोरखनाथ की रचनाएं सुमावली जो ज्ञान 34 पद, सब्दी। नाथ संप्रदायों के प्रतिनिधि कवि सत्येंद्र नाथ जी हैं ।कुल नाथों की संख्या 9 है। गोरखनाथ के नाथ पंथ का मूल भी बहुत पौधों की यही वज्रयान शाखा है 84 शब्दों में गोरखनाथ भी गिन लिए गए हैं क्योंकि गोरखनाथ गौर छापा वही दोनों एक ही है क्योंकि पहले विश्व युद्ध थे इनके नियमों के उनको पसंद ना आने के कारण  इन्होंने बाहर आकर भारत की पश्चिमी घाटियों में अपना नाथ पंथ का योग प्रारंभ किया उन्होंने सिद्ध मार्ग को छोड़कर नाथ मार्ग ग्रहण किया। गोरखनाथ ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति को लेकर हठयोग सिद्धांत का प्रवर्तन किया। गोरखनाथ अपने ग्रंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागों में पंजाब में किया। पंजाब में नमक पहाड़ियों के बीच वाला नाथों का स्थान बहुत ही प्रसिद्ध और सुंदर है। राहुल सांकृत्यायन जी नाथों का समय विक्रम संवत 10 वीं शताब्दी माना जाता है ।रत्नाकर जो पन कथा उसी काल की ग्रंथ है। गोरखनाथ के गुरु मछंदर नाथ थे मुख्य रूप से नाथ नो है आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैणीनाथ निवृत्तीनाथ, ज्ञानेश्वर नाथ इस प्रकार नाथ परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ के गुरु जलंधर माने जाते हैं ।और गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रर नाथ हैं।जिस प्रकार सिद्धों की संख्या 84 प्रसिद्ध है ।उसी प्रकार नाथों की संख्या 9 प्रसिद्ध है। अभी भी नवनाथ और 84 सिद्ध कहा जाता है ।नागार्जुन, जड़ भरत ,हरिश्चंद्र, सत्यनाथ, भीमा, नाथ ,गोरक्षनाथ ,चर्मट, जलंधर और मलयार्जून ।यह सब नाथ है ।इसमें नागार्जुन,गोरखनाथ, चर्पट और जलंधर सिद्ध  परंपरा में भी हैं। नागार्जुन का समय विक्रम संवत 602 माना जाता है।

 

जैन

    जैन धर्म चंद्र गुप्त काल में प्रारंभ हुई। जनों के अपभ्रंश कवियों के लेखक स्वयंभू पुष्पदंत धनपाल चंद्रमणि हेमचंद्र थे। जैन आचार्य हेमचंद्र राजा सिद्धराज के पास रहते थे ।जयसिंह के कभी हेमचंद्र जी जय राजा रामचंद्र की रचना का व्याकरण ग्रंथ जैन आचार्य हेमचंद्र की व्याकरण ग्रंथ का नाम सिद्धराज हेमचंद्र हिंदी के प्रसिद्ध कवि जैन साहित्य के प्रतिनिधि कवि थे। देवसेना आचार्य श्रुति पंचमी कथा योग जयकुमार चरित्र का व्याख्यान काव्य सब चौपाई दोहे के क्रम में लिखा हुआ था। उसको दंत का समय विक्रम संवत 1029 मानी जाती है। उस की रचनाएं पुराण, महा पुराण इनकी भाषा अपभ्रंश भाषा के रूप में लिखिए।

    हिंदी साहित्य के पूर्व काल में डिंगल शब्द सर्वप्रथम भाषा डिंगल दो शब्दों से बना है। डिंगल शब्द  डिम का अर्थ है। डमरु गलत है। गलत से धोनी दंगल की भाषा का प्रयोग डमरू जैसे स्वर सुनाई देती है। जब उनकी ध्वनि का उच्चारण होता है। डिंगल भाषा की लिपि लिपि है। डिंगल भाषा के दूसरे नाम पिंगल है। प्रणाम डॉक्टर साहब ने की मारवाड़ी भाषा को ही डिंगल भाषा कहते हैं। डिंगल भाषा राजस्थान में पाई जाती है। डिंगल शब्द का अर्थ है अनियमित। राजपूती का पार्सल है। श्यामसुंदर कहते हैं। क्या कहते हैं शब्द की उत्पत्ति हुई है।

    सिद्ध,नाथ, जैन ,बौद्ध ,की काव्य की भाषा अपभ्रंश भाषा है। कवि ध्वनि देर से आचार्य के शिष्य थे ।कवि धवन की रचना हरिवंश पुराण है ।श्रावकाचार के शिष्य देव जैन आचार्य थे ।श्रावकाचार की रचना देवसेना आचार्य थी ।हिंदू धर्म के उद्भव का मूलाधार उपनिषद है। अपभ्रंश की अधिक साहित्य जैन ग्रंथों में मिलती है। पुरानी हिंदी की विकास अपभ्रंश भाषा में ही हुई। अपभ्रंश का भी अधिकतर दोहे के रूप में मिलती है। स्वयंभू की रचना पाउ चरियू। पुष्पदंत की प्रमुख रचना आदि पुराण, महा पुराण ।वेद पांच प्रकार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद ,सामवेद ,अथर्ववेद ,पंचम वेद बेली कृष्ण रुक्मणी रे ।हिंदी व्याकरण को पहले लिखने का श्रेय जोशुआ कटलरी हैं ।आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने की। स्वामी दयानंद सरस्वती की रचना सत्यार्थ प्रकाश है। ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राममोहन राय ने की। रामकृष्ण मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने की ।स्वयंभू अपभ्रंश भाषा में प्रसिद्ध रचना है। बौद्धोंधों का मुख्य केंद्र नालंदा है। कादंबरी के लेखक कौन है ।हिंदी साहित्य के प्रथम कवि पुष्प है ।उसका समय विक्रम संवत 770 है। प्राकृत भाषा का धार्मिक साहित्य जैन गुरु वाणी की पाली भाषा का उत्पन्न है। अपभ्रंश भाषा से ही उत्पन्न हुई मुद्दों की भाषा पाली भाषा है। अपभ्रंश भाषा भी अधिकतर दोहे के रूप में प्रतिष्ठित है। गोरखनाथ ने 40 पुस्तकें लिखी। गोरखनाथ भाषा सदुकड़ी है ।गोरखनाथ की वाणी गोरख वाणी है। पुष्पदंत की प्रमुख रचना आदि पुराण और महापुराण है ।स्वयंभू की रचना कर्मचारियों है। हेमचंद्र की रचना सिद्ध हेमचंद्र शब्द अनुशासन है। गोपीनाथ कविराज की रचना गोरक्ष सिद्धांत संग्रह     है।नाथों की भाषा ब्रज और नागर अपभ्रंश है ।गोरखनाथ के संस्कृत ग्रंथ सिद्ध सिद्धांत पद्धति एवं विवेक मार्तांड है। शक्ति संगम तंत्र निरंजन पुराण, वेद पुराण यह सब गोरखनाथ की संस्कृत भाषा की ग्रंथ है। पाली भाषा प्राकृत भाषा और अपभ्रंश भाषा को मिलाने से  पाली भाषा बनी ।बुध्द की भाषा पाली भाषा है ।नाथ संप्रदाय के प्रतिनिधि कवि मत्स्येंद्रनाथ हैं। जैन साहित्य के प्रतिनिधि कवि देव सेन हैं ।और सिद्धों के प्रमुख कवि सरहपा हैं।

 

प्रसादराव जामि

साहित्यिकार

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