Saturday, January 8

जिंदगी आहिस्ता चल - डॉ दुर्गेशनंदिनी (स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य)

स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य




जिंदगी आहिस्ता चल 


जिंदगी आहिस्ता चल 
अभी तेरे रंग देखने बाकी हैं l
रात अंधेरी में भी आशा की 
किरणों जैसा देखना बाकी हैं I
रंग बदलती दुनिया के 
हर कोने  को समझना बाकी हैं I
किस्मत के घूमते चक्र में 
वक्त का रंग बदलना बाकी हैं l
अनगिनत प्रश्नों के बीच 
चक्रव्यूह का सिलसिला बाकी हैं l
आघात प्रतिघात करते 
कड़ी धूप सी परेशानियां बाकी हैं I
दर्पण पूछे अकेला बिंब 
कोई तो पुरानी पहचान बाकी हैं I
जिंदगी के मुश्किल मोड़ों पर 
मंद मंद मुस्कान बाकी हैं I
जिंदगी के इंद्रधनुषी झूलों पर 
डर का फिसलना बाकी हैं ।
हर सैलाब फीका सा  लगा 
अभी संघर्षों का फसाना बाकी हैं I
दास्तां यूं ही दिल में समाए हुए 
उलझनों से सुलझना बाकी हैं l 
जिंदगी के कारवां में यूं ही
दुविधाओं में जलना बाकी हैं I
मुसीबतों के काफिले में 
कश्मकश में चलना बाकी हैं ।
जिंदगी बस मुट्ठी भर 
रेत की तरह फिसलते जाना बाकी है।


डॉ दुर्गेशनंदिनी
80190 01223

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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami

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