स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
जिंदगी आहिस्ता चल
जिंदगी आहिस्ता चल
अभी तेरे रंग देखने बाकी हैं l
रात अंधेरी में भी आशा की
किरणों जैसा देखना बाकी हैं I
रंग बदलती दुनिया के
हर कोने को समझना बाकी हैं I
किस्मत के घूमते चक्र में
वक्त का रंग बदलना बाकी हैं l
अनगिनत प्रश्नों के बीच
चक्रव्यूह का सिलसिला बाकी हैं l
आघात प्रतिघात करते
कड़ी धूप सी परेशानियां बाकी हैं I
दर्पण पूछे अकेला बिंब
कोई तो पुरानी पहचान बाकी हैं I
जिंदगी के मुश्किल मोड़ों पर
मंद मंद मुस्कान बाकी हैं I
जिंदगी के इंद्रधनुषी झूलों पर
डर का फिसलना बाकी हैं ।
हर सैलाब फीका सा लगा
अभी संघर्षों का फसाना बाकी हैं I
दास्तां यूं ही दिल में समाए हुए
उलझनों से सुलझना बाकी हैं l
जिंदगी के कारवां में यूं ही
दुविधाओं में जलना बाकी हैं I
मुसीबतों के काफिले में
कश्मकश में चलना बाकी हैं ।
जिंदगी बस मुट्ठी भर
रेत की तरह फिसलते जाना बाकी है।
डॉ दुर्गेशनंदिनी
80190 01223
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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami
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