स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
मैं और मेरी व्यथा
मैं नारी ! मेरी व्यथा की मैं
कुछ बोल सुनाने आई हूं
जन्म से जीवन पर्यंत तक
की कथा बताने आई हूं।
जब मां की कोख में अंकुर बन,
आशा की किरण बन आई थी
पल-पल डरी सहमी मां
संसार के भय से घबराई थी
क्या होगा नौ मास के बाद,
बालक या बाला होगी
पुरुष प्रधान समाज में!
इस अबला की क्या हालत होगी ?
इस भय में मां भूल गई
अपनी सुध- बुध जैसे खो गई
ना खाती, ना पीती,बस रोती थीं
समाज व संसार से भयभीत होती थी
यह कैसा असमंजस व विडंबना है
स्वतंत्र न उसकी भावना है
प्रगतिवाद की बस बातें हैं
लड़की को कम ही आंके है।
अब समाज चक्षु खोल के तू
देख ले क्या , कुछ बदला है।
बेटियां ::आकाश चूमती है
सबल बन गई, ना अबला है।
डॉ. संगीता कुमारी तिवारी (पांडेय)
SA हिन्दी
कीज हाई स्कूल
सिकंदराबाद,
हैदराबाद, तेलंगाना।
संपर्क सूत्र:9397053627
pandeysangeeta69@gmail.com
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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami
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