स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
कितने ही देशों से भारत आए लोग अनेक
रंग रूप वेश भाषा न थी जिनकी एक
कुछ लेने धन आए तो कुछ करने व्यापार
विविधता भरी सभ्यता का फिर यहीं बने आधार
कौन है हम में परदेसी ? कौन है
भारत वासी ?
नहीं जान सकता कोई हम में बनीं एकता ऐसी
इन सबको एक सूत्र बांधने चली ए पावन धरा
विश्वव्यापी का मंत्रणा यह वसुधैव कुटुम्बंका
सिर्फ केवल एकता का ही प्रतीक मानवता
जिसे समय समय जग को
देता भारत रहा सभ्य
मानवता।
यहाँ सिर्फ जन्म होना ही नहीं
जिस शरीर में आने लड़ते झगड़ते भगवान सभी ।
मानव होना है तो मानवता का अधिकार जमाओ
जो न जात धर्म रिश्ता से न जुड़ा हो
यही विश्व व्यापी का सरताज तथ्य तो हमको
आज़ाद
बनाएगा पीढ़ी पीढ़ी से भारत को
बने आधार भरी सभ्यता भरी विविधता का यहाँ
कौन है हम में परदेसी ? कौन है भारतवासी
?
डॉ रमेश जवलकर
9396880315
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