स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
आजादी का अमृत महोत्सव
माँ भारत की अमृत - सन्तान
बने सदा दायित्व- अजरामर बन-चिरन्तन से
परम वैभव माँ - जब जगद्गुरु - कल्याणदायिनी
त्रस्त रही तब मुष्कर शक्ति - विकृत विष संस्कृति
सन् सत्तावन पूर्व से - पूर्ण परिवर्तित दिशाएँ
तन-मन-जीवन बलिकर- चरण-चारण
अलक्ष्यित उम्र - वीरवर हिन्दुस्तान के
धीवर सहित - पथ - महामृत्यु के - पुष्प-शीर्ष-से
खंडित हुई सोने की चिड़िया
अखंडित चिर-नव माँ भारत बन
संविधान मम गण-विधान है
रहती जनता जन्नत - सुख से
मिटी नहीं विवक्षा अब भी - वर्ग-कर्म धर्म की
बनी दुर्व्ययता - अमृत आजादी की
पर, कहती शक्ति तेरी - 'सृजाम्यहम'
भूखे तो नहीं वे - मदचूर्ण कुपुत्रों पर
जगे चेतना - द्यौत विमल-सी
छटे तम - भानूदय सुस्वर में
राम - कृष्ण - नौ-दस अवतारों के
रहे प्रज्जवल ' आजादी अमृत-महोत्सव
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गद्य लेख
स्वतंत्र भारती ! तेरा अमृत-महोत्सव
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माँ भारती, मैं तेरा पुत्र, तेरे चरणों में चंद बातें सुनाता चाहता हूँ, मुझे सांत्वना दो। जंबू द्वीप के - भरत वर्ष के - भरत खंड की सनातनी माँ ! अगणित तेरी उम्र, रही बात सही, आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, और तेरे उत्सव सदा मनाते रहेंगे।
कया माते, तेरी सन्तान-परम्परा सब मातृ-आदर्शों से चल रहे हैं? विश्वव्यापी तुम्हारी संस्कृति पाकर धरा-मंडल से आए योग्य - अयोग्यों को अपनी गोद में पनपाती हुई तू वैश्विक भावनाओं का केन्द्र बनकर विराजमान हो गई हैं।
युगांतरों की ॠषि-संस्कृति योग- भूमि से हटकर - आज 'भोग-भूमि' बनती जा रही है। राक्षसी भावनाओं से जीनेवालें अन्यों को जीने नहीं दे रहे हैं। धर्म - अर्थ - विज्ञान - संस्कृति - राजनीति - अन्य सभी क्षेत्रों में उथल-पुतलों से जीर्ण-शीर्ण न होकर - सद्धर्म वीर बनकर परम वैभव
प्राप्ति के लिए अग्रसर तुम्हारी प्रजा को आशीष दें माँ! माँ भारती तेरी जय!
तेरी जनता की विजय हो ।
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अरवपल्लि सुब्रह्मण्यम
94404 11303
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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami
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