स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
आजकल यत्र - तत्र हर तरफ
कैसा यह शोर है
अंधकार में डूबा हुआ
कैसा यह भोर है
दमन और द्रोणा का हर
तरफ जोर है
कैसे कहें किसे भला
सभी यहां चोर है
संसार के चकाचौंध में,
जीवन मूल्य कहीं खो गया
इच्छाओं की होड़ में
मानवता का त्रास हो गया।
आत्मा कहते कुछ
तू करता कुछ और है,
रहता तू क्यों वहां
जहां न तेराठौर है।
साया भी आज
संग चलने से डरता है
बेबस है इसीलिए
साथ में वह रहता है।
पुकार के कह रहा
आज यह दिल मेरा,
जो तू कह रहा
नहीं काम वो तेरा।
इस भीषण कोलाहल में भी,
धरती लगती है विरान
आवाज तो है लेकिन
गुम हो गई है तान।
कहां गुम हो गया
वह गौरव पुरातन- पावन
दिलों को फसाने वाला
कहां है वह सुंदर- सावन।
दूसरों के लिए
उपदेश बड़े होते महान,
अपने आप को परख
तू कितना है इंसान।
सजीवता को लाना है
धरती के वीराने में,
नए साज को लाना है
जीवन के तराने में।
इंसान बनकर आया
इंसानियत भी अच्छी सीख ले,
मिलती अगर कहीं यहां
तो मानवता की भीक ले।
दमन रूपी तूफान का
बहुत हो चुका खेल सारा,
प्रेम- रूपी सागर की
बहने दो अब निर्मल धारा।
रामायण का पाठ
सही अर्थों में पढ़ना है,
लेकर सभी को संघ
दुर्गम पर्वत पर चढ़ना है।
शोर भरे इस वातावरण में
उस एकांत को ढूंढ ज़रा ,
प्यार की हरियाली से
चमन हो जो हरा -भरा।
गीत ऐसा कुछ सुनाओ
जो मधुर हो मन-भावन,
कर्म बंसी ऐसी बजाओ
सारा जग बन जाए वृंदावन।
विज्ञान ने तो प्रदान की
ढेर- सारी सुलभ- सुविधा,
पर आत्मा- विकास को
हो गई बड़ी दुविधा।
विज्ञान- प्रगति युग में
नहीं किसी को शांति यहां
आक्रोश- बर्बरता की
नित् नयी है क्रांति यहां
मानव- प्रगति युग का
इंतजार है सबको
जो नीति -आचार का
पाठ पढाएगा हमको।
मानव- प्रगति युग
युगों में महान होगा,
सभी इनसां होंगे जहां
ना कोई हैवान होगा।
हे सृष्टि के रचयिता,
तेरी महिमा बड़ी निराली,
ऐसा सुंदर जग बसा दे,
बजाकर तू एक ताली।
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