(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन से)
आओ आज करें सब मिलजुल, उनके सपनों को साकार
जिन्होंने दिया विरासत में, हमारे सपनों को आकार।
संप्रदाय की लकीरों में, नहीं बटेगा कोई मजहब
राष्ट्र धर्म से प्यारा है, मानव की मानवता है मजहब
आओ अपने मस्जिद को, अंतर मंदिर में बसा ले
सबके गिरजाघर को अपने, घर का गुरुद्वारा बना लें
चीखों का सब दर्द बांट लो, कहीं ना बहाओ लहू की धार ।
आदर्शों की दीपक ज्योति, लिए चलो प्रगति के द्वार
गौतम ईसा नानक कबीर, आएंगे अब फिर एक बार
श्रम से बनो महामानव अब, आगे ही आगे बढ़ना है
ऊंची नीची पगडंडी है, किंतु शिखर पर चढ़ना है
जाति धर्म की बात नहीं अब सुनो ध्यान से कर्म ललकार।
आओ मेरी तरुण सेनानी, रक्तों का उबाल लिए
जुट जाओ धरा की धारा में, तांडव का मशाल लिए
बलिदानों से नहीं डरोगे, मेरी शपथ यही नहीं है
अन्याय के खिलाफ लड़ोगे, गुम आवाज़ कहीं नहीं है
वाणी का समूचा शंखनाद, हर आंसू से करो प्यार।
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© अरुण कुमार साहू
अध्यक्ष
नावल टीचर्स क्रिएटिव फाउंडेशन
जिला बालोद,
छत्तीसगढ़
99932 33585
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