(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन से)
फूल खिले बागों में, कोयल गाए राग बहार।
छेड़ दिए हैं पवन बसंती ने मन- वीणा के तार।
मनवा बहक बहक जाए...
कोयल है कितनी काली मगर, वाणी कितनी मीठी है।
मीठे बोल से ही कोयल, बनी बसंत बसीठी है।
वाणी का मोल समझाए...
ऋतु-बासंती ने बिखेर दी, मस्ती धरा के कण कण में।
प्रकृति पुलकित, हर्षित भू, छाई बहार वन-उपवन में।
मौसम यूँ उत्सव रचाए...
मंद मंद पुरवाई सबको, बाँट रही कस्तूरी गंध।
प्रेम की पाती बाँचे भँवरे, फूलों से जोड़ नेह-संबंध।
सुमन सकुचे शरमाए...
मौलश्री मुस्काई, गुलमोहर हँसा, महका हरसिंगार।
टेसू ने गुलाल लगाया, अमलतास पहनाए हार।
दुल्हन-सी धरा सजाए...
पपीहे का पी कहाँ पी कहाँ, मन में हूक उठाए।
अनुरागी पवन की मीठी छुअन, बिरहन को तड़पाये।
पी बिन मन अकुलाए...
छा गए आँखों में सबकी, देखो वासंती सपने।
आया फागुन अब रंगों की गागर लगी छलकने।
कोयल फाग सुनाए...
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© शिवकुमार अंगारे
ग्राम- बंगला- मटिया
बालोद
9753035380
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