(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन से)
युगों युगों से चलने वाली, भारत की अमर कहानी।
सौ सौ नमन पितरों को, जिनके हम हैं निशानी ।
कुंवार महीना कृष्ण पक्ष में ,लगा पितरों का मेला ।
घर-घर आकर देख रहे हैं ,अपने जनों का झमेला ।
जल तर्पण करके हम ,अपने पितरों को नहलायें।
खीर पुड़ी बड़ा भोग लगाकर ,सेवा खूब बजायें ।
किसी दिन दादी आएगी, और किसी दिन दादा ।
पूजा पाठ करके निभायें,पितरों का ही वादा ।
किसी दिन पिताजी आएंगे, और किसी दिन भ्राता।
पुत्रों के सौगात रसीले, पितरों को भी है भाता ।
प्रभु भजन में ध्यान लगाकर, जिसने पितरों को पूजा ।
उस मानव से बढ़कर,कोई, इस जहान में है न दूजा ।
याद करें भागीरथी को ,जो तप में ध्यान लगाया ।
पितृ जनों के उद्धार को ,स्वर्ग से गंगा लाया ।
ध्यान प्रभु में लगाकर ,सब मांगे ये वरदान।
भटक रहे पितृ जनों का ,हो जाए कल्याण ।
भारत की ये पावन धरा, स्वर्ग से भी सुन्दर है।
मृत जनों के लिए सम्मान,हम सब के अंदर है।
पितृ जनों की सेवा कर, सुख समृद्धि पायें।
चलो वंश परंपरा को, हम सब आगे बढ़ायें।
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© चन्द्रहास सेन शिक्षक
ग्राम व पोस्ट कोसरंगी, थाना खरोरा
जिला रायपुर छत्तीसगढ़
पिन 493225
9752468692
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