(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "शब्द मेरे, विचार सबके" साझा संकलन से)
ना जाने कैसे है लोग जीने को जी नही चाहता
कहते है दुनिया बदल गयी झूठ हम बदल गए
ना जाने कैसे है आज के बच्चे स्मार्ट फोन छोड़ना नही चाहते
पढ़ते लिखते कम किसी की नही मानते जिन्दगी बिगाड लेते
ना जाने कैसे है जवान सीमा को छोड आना नही चाहते
कहते है देश की रक्षा करना कहते करते दिन बीत गए
ना करते प्यार किसी से माँ बाप के साथ रहना नही चाहते
धन दौलत के लिए लड़ते भाई बहन सब बदल गए
ना जाने कैसे है शराबी एक दिन भी बोतल छोड़ना नही चाहते
कहते है कुछ नही होता सेवन करते करते शरीर बिगाड लेते
ना जाने कैसे है किसान अपनी जमीन छोड़ना नही चाहते
धूप मे वर्षा मे काम करते करते सारी जिन्दगी गुजार लेते
ना जाने कैसी होती है लड़की कभी माइका छोड़ना नही चाहती
पर शादी कर नया घर बसाती अपना नाम तक बदल लेती
ना जाने कैसे होते है बुजुर्ग किसी को छोड़ना नही चाहते
सबकी ओर से सोंचते अपना अस्तित्व तक भुला देते
ना जाने कैसे होते है नेता कुर्सी दूसरो को देना नही चाहते
अधिकार चलाते सम्पत्ति लुटाकर देश का ढंग ही बदल डालते
ना जाने कैसा है सोना अपने आप को पिघलना नही चाहता
लेकिन गहने बनकर अपना मान सम्मान बदल डालता
ना जाने कैसा है कागज - कलम किसी को छोड़ना नही चाहता
वह नये रास्ते दिखाकर मानव को ऊँचा स्थान दिलाता
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© के कृष्णा कुमारी
97042 09042
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