(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "शब्द मेरे, विचार सबके" साझा संकलन से)
अयोध्या की सरयू से पूछा था मैंने -'
"चलो खेलें होली"
झुकाकर सर शर्म से सरयू बोली- नहीं
मेरी आशाएं जली, आकाक्षाएं गलीं,, मैं क्या खेलूँ होली?
कश्मीर की घाटी से पूछा था मैं ने
" चलें खेलें होली"
सिसकियाँ भरती हुई घाटी बोली- "नहीं "
खून से सनी है मेरी गली-गली
कुम्हला गयी मेरे मन की कली
मैं क्या खेलूँ होली?
हैदराबाद के पुराने शहर की मिट्टी से पूछा था मैं ने--" चलो खेलें होली "
आहें भरती हुई मिट्टी बोली-- नहीं
कई बार मैं छली
मेरी रूह के भीतर मची है खलबली
मैं क्या खेलूँ होली?
गोकुल चाट भंडार के बगल में खड़े आम के पेड़ की शाखा पर बैठी कोयल से पूछा था मैंने
चलो खेलें होली।
आंसू डब डबाती कोयल बोली- "नहीं"।
कई गोदें हुईं सूनी आत॔कवाद की
मेहरबानी।
मायूस हो मुंह लटकाये खडा था मैं।
इतने में " वो" आया, मुझे देख मुस्काया, गले लगाया, हाथ दबाया
उसकी आँखों में थी चमक आशा की
दमक आश्वासनों की
उसने निकाली अपने जेब से पुडिया गुलाल की
बस अगले पल में रंग गये थे रंगों में
खिल गया था अंग-अंग
वह था------ काल पुरुष (समय)।
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© डाॅ लक्ष्मणाचार्य .म
9640233930
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