(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )
आज फिर लगा कुछ लिखूँ
बहुत दिन हो गए हैं
कुछ लव्ज़ दिमाग़ में
आते-जाते रहे ,
लेकिन इस लम्हे में
अपने आप क़लम उठी
और चल पड़ी।
तुझे देख के
जो मुस्कुराहट आयी है चेहरे पे ,
ये तपिश,ये ख़ुशी ,
ये भावनाओं का सागर
जो उमड़ पड़ा है दिल के भीतर ,
अच्छा लगा ।
जो तूने पलटवार किया ,
अपने नयनों से जो कहना चाहा ,
सौंधी-सौंधी सी मुस्कान ने जो बयान किया ,
तेरे अलकों से खेलने के अंदाज़ ने जो बताया
उनको पहले कभी
महसूस नहीं किया था ,
पहले कभी यह बेचैनी भी
नहीं हुई थी ।
इस बेचैनी का
जो एक मीठा एहसास है ,
अच्छा लगा !
और भी बहुत से जज़्बात हैं
जो बयान करना चाहता हूँ
लेकिन लव्ज़ों की कमी के कारण
थोड़ा मुश्किल हो रहा है
इन शब्दों की कमी
बयान कर रही है
जो शब्द बयान न कर पाए।
दिल की धड़कन भी
बढ़ रही है ,
चल रही है मदहोश से मन में
तेरी महक की आँधी ,
तेरी एक नज़र ने जो घायल किया है ,
अच्छा लगा ।
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© दिव्यांश धाकरे
नोएडा
8630690795
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