गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *अरविंद सिंह चौहान'* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का"
(अतुकान्त कविता)
रेल में बैठा मुसाफिर क्या करे,
सोचता लम्बा सफर- कैसे कटे।
गाड़ी पटरी पर दौड़ रही है,
जाने कब पटरी से उतर जाए,
या 'चैन पुलिंग' ही हो जाय।
कोई ठिकाना नहीं।
इंजन-
इस इंजन को करेंट चाहिए,
डीजल लुब्रिकेंट चाहिए,
वरना एक्सिलिरेशन ही न हो,
चले ही नहीं ,भागे ही नहीं।
और चले, तो वैक्यूम क्रिएट न हो।
तो ब्रेक ही न लगे।
इसलिए रिपेयर और मेंटेनेंस चाहिए।
रास्ते में स्टेशनों की भरमार है ,
नदियों पुलो का अंबार है,
इसलिए,
स्पीड कभी धीमी कभी तेज
होती रहती है,
वैसे सरपट दौड़ती है,
और स्टार्ट हुई तो,
डेस्टिनेशन तक पहुंचती है।
ये ओटोमैटिक सिग्नलिंग भी,
क्या चीज है भाई ,
पर ये भी फेल हो जाती है कभी कभी-
और तब,
फास्ट ट्रेन हो या पैसिंजर,
गुड्स हो या लोकल,
बीच मैं ही रुक जाती है।
इसलिए,
ऐ सफर करने वाले-
राहगीर ,
बेचैन न हो,
जब सफर पर उतरा है
तो उसे पूरा कर-
पूरा कर,पूरा कर।
देख-
पार हो जायेगा।
बस गीत गाता चल,
उस प्रणेता के,
उस नियंता के,
जिसके हाथ में
सबकी डोर है,
वही पहुंचा देगा
डेस्टिनेशन तक।
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के. एम. श्रीवास्तव
झाँसी
94159 89233
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