गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *अरविंद सिंह चौहान'* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का"
(आज इस बदलते हुए परिवेश में शिक्षकों की छवि सामाजिक रूप से कुछ बदल गई है परंतु शिक्षक आज भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन किस तरह कर रहे हैं वो इन पंक्तियों से समझा जा सकता है।)
कुछ बीज इसे जब मिलते हैं,
तब ऐ माली बन जाता है।
धीरे-धीरे इन बीजों को बढ़ने की राह दिखाता है।।
यह शिक्षक है ..................
तपते सूरज सा ताप कभी,कभी कोमलता दिखलाता है।
यह शिक्षक हैं अपने बच्चों को पौधों सा अपनाता हैं।
बढ़ने पर पौधों के मन ही मन हर्षाता है ,
फूल लगे उस डाली पर ,खुद को ऐ महकाता हैं।
फलो के लद जाने पर उस पर ऐ खूब इतराता हैं।
यह शिक्षक है अपने बच्चों को पौधों सा अपनाता है।।
यह शिक्षक है ....................
कच्ची माटी को हाथों मे ले ,ऐ शिल्पकार बन जाता है
रूखी-सूखी ,फटी माटी को अपनी मेहनत से चिकनी बनाता है।
फिर भी उस माटी को नैतिकता के चाक पर घुमाता है।
धीरे-धीरे उस माटी से मनमाफिक आकार बनाता हैं।
अब इस बर्तन को ये अपने अनुभव से पकाता है।
इस सूखे बर्तन पर ये अपने सपनों के रंग सजाता है।
आखिर मे अब तैयार पात्र को दुनिया को दिखलाता है।
यह शिक्षक है ,कच्ची माटी से सुंन्दर बर्तन बनाता है।।
यह शिक्षक है ................
💐💐💐💐💐💐
अरविन्द सिंह
सहायक अध्यापक
कम्पोजिट उच्च प्राथमिक विद्यालय वम्हौरी घाट,
ब्लाक-महरौनी,जनपद-ललितपुर
उतर प्रदेश
9450032056
singharvind11683@gmail.com
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