(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित " स्वराभिषेक विचारों का" साझा संकलन से)

नियति की माया के आगे,
कहो!कब किसी का बस चला।
होनी थी या स्वार्थ किसी का,
जाने कैसे,कोई कहो!भला ?
गुरुद्रोण की पाठशाला में,
पल रहा था एक धनुर्धर।
पांडव के बीच अर्जुन नाम से,
ढल रहा था एक धुरंधर।।
सीख रहे थे गुरुद्रोण से पांडव,
तीर-धनुष का सटीक निशाना।
एकलव्य भी वहां चोरी-चोरी,
सीख रहा था लक्ष्य को भेदना।।
देख गुरुद्रोण सबकुछ भांप चुके थे,
अर्जुन का प्रतिद्वंदी जान चुके थे।
होगा न कभी एकलव्य श्रेष्ठ धनुर्धर,
षड्यंत्र मन ही मन वो रच चुके थे।।
दिवस एक द्रोण ने एकलव्य को,
गुरु-दक्षिणा का नियम बताया।
काट अंगूठा तुरंत एकलव्य ने,
गुरु-दक्षिणा का ऋण चुकाया।।
ज्ञान के बदले अंगूठा दक्षिणा में!
कहो जग! कहां का यह न्याय है ?
हे गुरुद्रोण! आप ज्ञान बेच कर,
क्यों एकलव्य से किया अन्याय है?
है गुरु नहीं,वह श्रेष्ठ इस जगत में।
जो सदा छल-षड्यंत्र रचाता है।
अपने निज स्वार्थ की खातिर जो,
शिष्य की भावी प्रसिद्धि मिटाता है।।
ऐसा गुरु मिले जगत में तो सुनो!
ज्ञान गुरु से कभी न ग्रहण करना।
अपने पौरूष,पराक्रम,बुद्धिबल से,
अपने जीवन का इतिहास लिखना।।
बनना हो आदर्श शिष्य जग में तो,
एकलव्य के जैसा ही शिष्य बनना।
यदि गुरु मिले गुरुद्रोण के जैसा तो,
कभी भूल से भी एकलव्य न बनना।।
💐💐💐💐💐💐
कवि पी यादव 'ओज'
साहित्यकार
चौकीपाड़ा, झारसुगुड़ा।(ओडिशा)
99375 10641
----------------------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363
.jpeg)
No comments:
Post a Comment