(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "कम्पन शब्दों का" साझा संकलन से)

ना गति है,
ना नियति,
ना ही प्रकृति का परिवर्तन।
है चेतना संग जागृति,
है अन्वेषण की स्मृति।
अनंत से अनंत तक,
शून्य से ब्रह्म 'शून्य' तक।
अदृश्यता का भाव लिए,
ओजस्वित-प्रभाव लिए।
बढ़ रहा जो नित्य अर्क है,
हे मनु! दृष्टिपट खोल,
देख! ये कालचक्र है।
ना क्षय है,
ना नश्वर।
ना ही स्थिरता का पन।
है ऊर्जा संग अनुरक्ति,
है संवर्धन संग संस्कृति।
धरा से क्षितिज तक,
आदि से अनादि तक।
साधना का ताप लिए,
सिद्धि का प्रताप लिए।
चमक रहा जो पीत अभ्रक है,
हे मनु! मानसपटल खोल,
देख! ये कालचक्र है।
ना देह है,
ना आत्मा।
ना ही भेद-अभेद का दर्पण।
है निरंतरता संग अभिवृद्धि,
है विकास संग समृद्धि।
उत्पत्ति से सृष्टि तक,
जन्म से मृत्यु तक।
भवितव्यता का भास लिए,
जीवन का प्रकाश लिए।
क्षण-क्षण जो मंथित तर्क है,
हे मनु! अज्ञानता-पाश तोड़,
देख! ये कालचक्र है।
💐💐💐💐💐💐
कवि पी यादव 'ओज'
साहित्यकार
चौकीपाड़ा, झारसुगुड़ा।(ओडिशा)
99375 10641
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GEETA PRAKASHAN
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