(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित " स्वराभिषेक विचारों का " साझा संकलन से)
विशेष : प्रस्तुत अभिव्यक्ति आज के उजड़ते विश्वास के माहौल में पवित्र से पवित्र रिश्तों का, आदमी के शक और वहम की बलिवेदी पर चढ़े बेवस रिश्तों के दर्द को बयां करती है . जो कि सत्य घटना पर आधारित है . परन्तु, बिहार के एक राजनीतिज्ञ द्वारा पिता पुत्री के रिश्तों पर की गयी शर्मनाक टिप्पणी के सन्दर्भ में भी इसे देखा जा सकता है.
तुझे याद हो न हो, मुझे याद है
वो अल्फ़ शरद सुबह
जब तूने किया था क़त्ल
जिस्म का नहीं, पवित्र रिश्तों का
मेरे ही आँगन में मेरी आत्मा का
उस आधी कायनात का
जो आदिम काल से होती रही है शिकार
तेरे वहम और शक का
ज़हर में डूबा तेरा एक-एक लफ़्ज़
लफ़्ज़ लफ़्ज़ में भरा
ज़हर से भी ज़हरीला तेरा वहम
बेरहमी से रौंद रहा था पवित्र रिश्तों को
ख़ून से लथपथ रिश्तों की
बेबस मूक सदा
तूने सुनी हो या न सुनी हो
तेरे कानों से टकराती जरूर होगी
मेरे दिले आँगन में
बिखरा ख़ून का हर कतरा
तेरी नंगी सोच और वहम की गवाही दे रहा था
मेरा चुप रहना मेरी कमजोरी नहीं थी
मेरी मजबूरी पवित्र रिश्तों को सरेआम
रुसवा होने से बचाने की थी
वर्ना, मौत को सामने देख
कोई हथियार डाल देता है क्या
तेरा हर शब्द छलनी कर रहा था
रिश्तों के विश्वास को, विश्वास की आबरू को
मेरी हर लाचार सिसकी
गवाह थी तेरी हैवानियत की
तुझे याद हो न हो , मुझे याद है
तूने बिना सोचे समझे सीधे प्रहार किया था
पाक रिश्तों की अस्मिता पर
तूने प्रहार की दर्द भरी आवाज़
सुनी हो न सुनी हो, लेकिन -
हर रोज उठते–बैठते, सोते जागते
तेरे कानों के पर्दों से टकराती ज़रूर होगी
यदि जिंदा होगी तेरी आत्मा
यक़ीन होगा खुद पर
नि:संदेह छलनी करती होगी वो बेकसूर चुप्पी
तेरी आत्मा और जज़्बात को, और -
उस चुप्पी के भय से भागते–भागते
एक पल के सुकून की तलाश में
इधर उधर भटकता ज़रूर होगा , लेकिन -
बेबस चुप्पी की सदा
तेरा पीछा नहीं छोड़ती होगी
धिक्कारती होगी उस लम्हे को
जिसमें तूने किया था क़त्ल,
दुनियां के सबसे पवित्र रिश्ते का
तुझे याद हो न हो, मुझे याद है
आखिर ! वो कौन सा ज़हर था
तेरा वहम या फिर अवसाद
जिसने पूरी बेरहमी के साथ
तार तार किए थे पवित्र रिश्ते
तेरा हर एक शब्द
कर रहा था बलात्कार पवित्र रिश्तों से
बे-कसूर सिसकियों की चीख़
तूने सुनी हो न सुनी हो, लेकिन मैंने सुनी है
वो लाचार आवाज
वो मज़बूर सिसकियों के आँसू
और उन आंसुओं की लाचारी
अपनी ही कोख के जियाए
बेबस अंकुर के सामने
रुसवा होने का गम,
गमों में छिपे दर्द की कराहट
तुझे सोने नहीं देती होगी , यदि तुझ में
जिंदा होगा इंसान और इंसानियत
तूने मेरा क़त्ल तो किया परंतु-
मेरी आत्मा के लहू से
तेरे दिल की दीवार गल रही है
तुझे मालूम हो न हो ,मुझे मालूम है -
जब भी एकांत में सोचता होगा
अंजाम-ए-ख़ून , तेरी आत्मा तेरे बुजूद को
धिक्कारती जरूर होगी
आखिर ! मानव के भेष में हे दानव
तूने ऐसा क्यों किया , क्यों करता है ?
क्यों करता रहा है, बिना देखे सुने और समझे
पवित्र से पवित्र रिश्तों का ख़ून
सिर्फ और सिर्फ वहम और शक की आड़ में
या फिर नैतिकता के नेपथ्य में छिपी अनैतिकता के बहाने
यदि यही तेरी फितरत है जीने की
तेरी राजनीति की ,यही है तेरा बजूद
तो धिक्कार है तेरे जीने को, तेरे बजूद को
कभी तूने अपने गिरेबान में झाँककर देखा है
नहीं देखा है, तो देख,
मैं थी, मैं हूँ और मैं रहूँगी
इस दुनियाँ में
तेरी हैवानियत को नंगा करने के लिए
रिश्तों के ख़ून के दर्द की आवाज
और उस आवाज का दर्द, मैं
आज भी सुनती हूँ ,कल भी सुनती थी
हाँ, अब आगे नहीं सुनूंगी क्योंकि-
अब मैं खड़ी हो चुकी हूँ
तेरे सामंती पुरुषत्व के खिलाफ़
तुझे सुनाई दे रहा है क्या ?
💐💐💐💐💐💐
© डॉ. चक्रपाल सिंह
स्वतंत्र टिप्पणीकार
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