(''गीता प्रकाशन'' द्वारा प्रकाशित नयना जैन कृत साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का )
लफ्ज़ इतने है नहीं, मेरी जुबान में, मैं क्या कहूं उस कोहिनूर के गुणगान में,
जो जन-जन के लाल है, पिता सम पालन हार है,
ब्राह्मण के जाये फूल, त्याग मोह घमंड है,
चमके हैं भव्य भाल, वो विभूति बड़ी महान है ||
मैं क्या कहूं उस कोहिनूर के सम्मान में लब्ज इतने हैं नहीं.....
पठन-पाठन में व्यस्त, योग पवित्रता में जो मस्त है,
निश्चल, निर्मल निरंतरता से जीवन निज प्रशस्त हैं,
ज्ञान सूर्य सम चम -चम चमके, शिव शांति के शांति धाम है ||
मैं क्या कहूं उस कोहिनूर के यशोगान में,लफ्ज़ इतने हैं नहीं मेरी................
खुशी की खुशबू है अपार, नील आनंद गगन से है प्यार,
तन देह उनकी है नहीं पर, पावन पुनीत तन मन के है श्रृंगार,
करत- करत करके कहना, कहकर कर से लिखना यह है व्यवहार
मैं क्या कहूं उस कोहिनूर के गुणगान में, शब्द इतने हैं नहीं मेरी जुबान में..........
मनन- चिंतन बेमिसाल है, देव फरिश्तों सम चाल है,
वनराज शेर -शेरनी सी है गर्जना,अमृतवेला राजयोग कमाल है,
दुनिया का बेताज बादशाह है न कोई,संगम युग वर्तमान में,
मैं क्या कहूं उस कोहिनूर के सम्मान में,लफ्ज़ इतने हैं नहीं मेरी जुबान में.....
दया, करुणा, सत्य, पावनता इनकी माता है,
सेवा,धारणा,प्रेम पालना इनके भ्राता है!
बिंदु के सिंधु है,ये ज्ञान के दरिया हैं,
हम दरिया के बिंदु हैं,बेजुबान बन कर कह उठे "अनु" अपनी जुबान में,
मैं क्या कहूं उस कोहिनूर के सम्मान में,लफ्ज़ इतने हैं नहीं मेरी जुबान में...
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© अनिता भणावत
9972926555
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