(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ. दयानंद शास्त्री* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का")
फूलों की कलियों में,
कलियों की महक में।
किरणों के स्पर्श से,
पाते हैं सुकून हम, प्रकृति के अनुराग से।
चिडियों के चहकने में,
झरनों के कल-कल में।
लहरों की तीवृता में,
चंचल हवा से,खुश हम प्रकृति के अनुराग से।
बदलते बिगडते रिश्तों से,
संकुचित बन गये हैं मानव।
दुष्टों की बावली दुनिया में,
जश्न मना रहे हैं रोज दानव।
फिर भी हम जीवित हैं, प्रकृति के अनुराग से।
मिट गयी मन की तरलता,
सूख गयी हृदय की आर्द्रता,
अदृश्य हुई अंतकरण की द्रवता,
फिर भी हम जी रहे, प्रकृति के अनुराग से।
बड़े नादान हैं मानव हम,
फॅंसे मोबाइल के चक्कर में।
अमन चाहते हैं जीवन में,
बेचैन बनकर घूमते बेवजह।
चल रहा यह जीवन, प्रकृति के अनुराग से।
आओ, चले हम फिर से
प्रकृति से जुड़कर जिएंगे।
पायेंगे शास्वत सुकून यहॉं,
अंततः सभी जीव, प्रकृति के अनुराग से।
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© बजरंग शंकर माली
गेस्ट फैकल्टी, हिंदी विभाग,
शासकीय प्रथम श्रेणी महाविद्यालय,
जेवर्गी, कलबुरगी। पिन-585310
संपर्क- 9591148529
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