(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ. दयानंद शास्त्री* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का")
जिधर देखो उधर नकली ही नकली,
असली कहीं नज़र नहीं आता आज।
दिखावे का बडा दबदबा है यहॉं,
सरलता सच्ची हमें मिलेगी कहॉं?
नकली बडा लुभाता है यारों।
असली तो अपना सत्कर्म करता,
नकली बडा चालाख है बन बैठा।
अंतर दोनों में का, समझ न पाते हम,
हारा असली, जीता नकली, बेबस हम।
नकली बडा चालबाज है यारों।
यदा यदा हि धर्मस्य ----------
सत्यमेव जयते यह कैसा?
मिलती हताशा ईमानदार को,
बेइमानी से हॅंसता है पैसा।
नकली ही है आज आदर्श यारों।
बकवास कर बिकता लोहा यहॉं,
अ-बोलों का सोना बिकेगा कहॉं?
दोनों के उलझनों में अटके हैं हम,
सुलझाने वालों की ताक में बैठे हम।
नकली बडा नेकनामी आज यारों।
दाये हाथ से दिया हुआ दान,
बाये हाथ को भी ज्ञात न होना।
सार्थक समय वह छुट गया पीछे,
दान का धर्म दिखावे में आया आगे।
यह जमाना बडा नकली यारों।
पाप से कोई नहीं डरता आज,
सब पापी से डरने लगे हैं हम।
वाचाल राजाओं की आवाजें हैं बुलंद,
मासूम प्रजा की जुबान आज हुई है बंद।
यह नकली बडा चालबाज यारों।
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© डॉ. लक्ष्मण मारुतिराव भोसले
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग,
शासकीय प्रथम श्रेणी महाविद्यालय,
जेवर्गी, कलबुरगी।
8970861391
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