(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *संजय कुमार पांडे * कृत साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का " )
और दूर हो गई
प्रथम स्पंदन के साथ
इस धरती पर तुम आई
देख मुझे तुम धीरे से मुस्काई
यूं कि जैसे तुमने जाना हो इस चिर बंधन को
तुमसे बंधी रिश्तों की वह डोर
जिससे मैं चिर वंदनीय "मां" कहलाई
तुमने मुझ पर वात्सल्य की ओस बिछाई
मेरे ह्रदयगत भावों को सहज ही समझ पाई
तुम ही संगनी बनी मेरी
हर एक पल की
मेरे अधूरे रह गए सपनों को यथार्थ मैं बदलती
तुमने दी मुझे इक नई पहचान
मूक भाषा की तुम बनी अभिव्यक्ति
तुम मेरी छाया मेरा प्रतिरूप हो
अपने आप को जाना तुझमें
तेरा मेरा साथ
चिरंतन अमर
अभी कल ही की बात थी
मेरी गोद मैं खेली, दौड़ी, पल्लू पकड़
तुम बोली अपनी तोतली ज़ुबान से, "इम्मी"
ना जाने तुम कंधे से पार हो
आज तुम्हारा बोर्ड का पहला पेपर था
और तुम टाटा मां कहती
मुझसे दूर......दूर और दूर और दूर हो गई
रचने इक नया युग
उन्नति, प्रगति, उत्कर्ष, उत्थान, स्वाभिमान, सम्मान
समाहित सर्वस्व तुम में मेरे प्राण..
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© श्रीमती कल्पिता चौरसिया
95117 67446
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