(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
आराधना, ईश्वर की सभी करते हैं,
स्तुति तथा करुणा की दुआ से प्रभु का गुणगान करते हैं,
ईश्वर हमारी हर प्रार्थना का उत्तर समय के अनुसार देते हैं,
परंतु मनुष्य इस समझ से परे होते हैं।
अपनी मांग की पूर्ति तत्क्षण मिलने की आशा में बेचैन रहते हैं,
उत्तर न मिलने पर दिल छोटा कर दिन-रात दुख में डूब जाते हैं,
प्रभु की आस्था से मन मचलकर धैर्य घटता है ।
ईश्वर मनुष्य की अज्ञानता पर मुसकुराते हुए कहते हैं –
“हे मानव ! तुम्हारी और मेरी सोच में बहुत अंतर है,
तुम आरंभ से अंत की यात्रा में हो,
पर मैं अंत से आदि के रहस्य का स्वामी हूँ ।
कब ? किसे ? क्या ? प्रदान करना मुझे ही ज्ञात है,
अपने भक्तों के कष्ट पर मुझे खेद है,
चिंता और परेशानी मिटाकर मुझ पर विश्वास बनाए रखो,
प्रतिदिन सच्चे मन से आराधना करो,
मुँह माँगा वर सही वक्त पर अवश्य पाने की आशा रखो,
तुमसे यही मेरी अपेक्षा है । "
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98841 29645
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GEETA PRAKASHAN
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