(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "यादगार शब्दों का सफर")
हे शारदे ! हे वीणावादिनी !!
हमने झाँका तुम्हारे नयनों में,
निर्झर बहता अपार दया वृष्टि ।
कभी न हटाना किसी के सिर से,
अपने कर की असीम कृपा कर दे।।
हे कृपापाणिनी !
हे शारदे ! हे वीणावादिनी !!
रग-रग में प्रदीप्त हो सद्बुद्घि की लौ,
नस-नस में वीणा की झंकार भर दे ।
सुगम विद्या की बहे मंदाकिनी ,
मधुरता की अलाप भारत में भर दे।।
हे वरदायिनी !
हे शारदे ! हे वीणावादिनी!!
तम को समेट , प्रसार करो उजियारा,
कंठ-कंठ में नित नये सुर बहार भर दे।
विकृत हुई समाज को दे आकृति,
पल -पल रोशनी की अवलंब आधार दे।।
हे ज्योतिदायिनी !
हे शारदे !हे वीणावादिनी !!
दे , मन-ब्योम में प्रकाश पुँज को ,
उज्जवलित वसन की भंडार भर दे।
पथ दो भटके राही को भवसागर में,
जन-जन में वीणा की संचार कर दे।।
हे सुरदायिनी !
हे शारदे ! हे वीणावादिनी !!
हे शारदे !हे वीणावादिनी !!
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© डाँ. रेखराज सुमरण साहू
(जुनवानी धमतरी)
ग्राम रावनगुडा, पो. पुरी
तह. /जिला धमतरी
पिन. 493663 (छ.ग.)
मो.नं. 97535 18730
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