(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "यादगार शब्दों का सफर" से)
“कभी सोचा ना था कि तुम इतने खास बन जाओगे।
मेरी बाहों को थाम, मेरे दिलबर, मेरे प्रीत बन जाओगे।।”
मैं चुपचाप तन्हा अकेले सोचा करती थी,
अपने गम को दुनिया वालो से छुपाया करती थी,
कोई हमदम ना कोई साथी था,
गम का दामन थाम, खुद से बातें किया करती थी,
“कभी सोचा ना था कि तुम इतने खास बन जाओगे
मेरी बाहों को थाम, मेरे दिलबर, मेरे प्रीत बन जाओगे”
कहने को तो, दुनिया में लोग बहुत हुआ करते थे,
लेकिन, हम अपने दिल का हाल लोगों से कह पाया करते थे,
तब जीवन में, जीने की हसरत बूँदो में बह जाया करते थे,
हर तरंगे सोए दिल को झंझोरकर उठाया करते थे,
“कभी सोचा ना था कि तुम इतने खास बन जाओगे
मेरी बाहों को थाम, मेरे दिलबर, मेरे प्रीत बन जाओगे”
वो पहली मुलाकात, मेरी सपनों की ऊँची उड़ान थी,
मेरे जीवन में, रंग भरने की पहली शुरुआत थी,
उनकी आँखों से, मैं दुनिया देखा करती थी,
अब इस दुनिया में, मैं खुद को पाया करती थी।।
“कभी सोचा ना था कि तुम इतने खास बन जाओगे
मेरी बाहों को थाम, मेरे दिलबर, मेरे प्रीत बन जाओगे”
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© सोनी कुमारी राजेश
शोधार्थी, हिंदी व्याख्याता
हैदराबाद, तेलंगाना.
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