Friday, December 1

फटे बिस्तर की चाहत - डॉ. मैत्री सिंह (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)

 (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित  "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)




फटे बिस्तर की चाहत 
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मूल कन्नड़ कहानी

कहानीकार: संध्या होंगुंटीकर
अनुवादक :  डॉ. मैत्री सिंह     


    मलप्पा.. उजाला कब का हो गया पानी ले आ, चाय बनाने के लिए भी पानी नहीं हैं.. सिद्धम्मा बेटे को  जगाने लगी। बंद आंखें खुलने से इनकार कर रही थीं।

    पिता आवाज  सुन बोरवेल की तरफ दौडा हैंड पंप मरने लगा।

    बसवराज बोला  मल्लू के बारे में बात करने जमींदार के पास जाना हैं । चिंता ने ऐसे ही जीना मुश्किल कर दिया हैं उस पर यह गर्मी भी सोने नहीं देती। दिन भर आग बरसती धूप.. रात में पकाने वाली उमस। सिद्धम्मा ने पूछा  "बंबई जाना पक्का है क्या ?  बंबई में चार बच्चों को लेकर बचत कैसे होगी ?  बसवराज बोला " छोटी बेटी को ले जायेंगे, जमींदार के पास बेटे को  दासता के लिए  भेज देंगे " सिद्धम्मा अवाक होकर देखने लगी उसका स्कूल..?"  स्कूल जाकर क्या होगा, उसे काम सीखने दे। जमींदार को देखते ही मल्लू की जान निकल जाती थी काम कैसे कर सकेगा इस चिंता ने नींद उड़ा दी।

    मलप्पा रोने लगा, बसवराज ने फटकार लगाई "चुपचाप पड़ा रह.. रात में भी सोने नहीं देते..।

    सिद्धम्मा के  बेटे मल्लिकार्जुन की आयु आठ के आस पास होगी।

    गांव में खेती किसानी ही एकमात्र जीविका का साधन था।

    जमींदार  मल्लू के मन में विचित्र डर उत्पन्न कर रहा था।   उसने दोस्तों से कहा नया खेल खेलेंगे , आकाश से बरसात को बुलाने का खेल! सबको गोलाकार में खड़ा किया,

    "आओ आओ बरसात के देवता, केले के खेत में पानी नहीं है,

    बरसो बरसो वर्षा के देव

    फूलों के बगीचे में पानी नहीं हैं " इस तरह दिन बीतने लगे।

    सिद्धम्मा को बार बार मल्लू पूछता," मां आज बारिश आयेगी क्या ? इस पर सिद्धम्मा चिढ़ जाती, बादल नहीं, बिजली नहीं, आकाश आईने की तरह  हुआ हैं बारिश कहां से आयेगी।

    मां बाप का बंबई जाना और मेरा जमींदार के घर रहना तय हैं। दिल जोरों से धड़कने लगा। जमींदार की मूछें याद आई। साक्षात कंबल कीड़े समान कांटेदार मूछें लाल आंखें..!

    मुझे उड़ना आता तो बादलों तक पहुंच जाता उनसे पानी बरसाता..। मल्लू की चिंता ज़िद बन  गई। जमींदार की जान ली जाए या बरसात कराई जाए।  ओढ़ने के लिए चादर पर डाली गई कंबल से उसके नुकीले भाग चुभ रहे थे। पर मल्लू सब कुछ भूल कर आसमान को घूर रहा था, विस्तृत, असीमित  आकाश..बिना किसी व्यवधान के एक सी बड़ी काली चादर बिछी हुई. कंबल की तरह लगी। लेकिन कंबल में तो इधर उधर बहुत से छेद थे, आकाश रूपी चादर में कहीं भी छेद नहीं हैं। इस चादर को किसी भी तरह से फाड़ना होगा।

    " जोरों की बरसात, घर की छत से गिरता हुआ पानी आंगन में तेजी से बह रहा था। वह पानी तेजी से जमींदार का घर, आंगन चबूतरा, पूजा घर.. सब डूबा दिया। जमींदार लाल आंखें लिए जोर से चिल्ला रहा था, उसकी मूछें बारिश में भीग कर ठंड से कांप रही थीं, पानी जमींदार की बाहों और गले तक आ गया था। आखिर पानी उसके सिर को डुबोने लगा।

    चादर फटी, बरसात आई, जमींदार  पानी में बहा जा रहा हैं मां इधर देख.. चादर (आकाश की) फट गई हैं..जमींदार नहीं रहा..पानी में बहा जा रहा हैं " मल्लू सिद्धम्मा की पीठ पर अपने पैर चला रहा था।

    ए लड़के! क्या बड बड़ कर रहा हैं..कौन सी चादर फटी हैं..चादर फटने पर बरसात होती है क्या..? चुपचाप सो जा " उसे धकेलते हुए सुलाने लगी।

    मल्लू के स्कूल की राह पर जमींदार का घर। वह बिना आहट के धीरे धीरे चोर कदमों से जमींदार के घर के सामने से गुजर रहा था। जमींदार की गरजती आवाज कानों में पड़ते ही वह तेजी से दौड़ पड़ा। बसवराज ने  मुंबई चलने की सूचना दी तो सिद्धम्मा ने  रास्ते के लिए रोटी बनाई उसे ठंडा होने के लिए  फैला दिया। किसी भी तरह वर्षा हो जाए इसलिए  गांव में होम, ईश्वर आराधना, मनौती, शांति पाठ चल रहे थे।

    मुहल्ले की साबव्वा बुजुर्ग महिला थी कहने लगी, बहनों घर घर जाकर  मेंढ़क को नहलाना होगा तभी बरसात होगी। इस सलाह को सुन मल्लू गड्ढे से मेंढ़क  ले आया। औरतों ने मिलकर मेंढ़क के पैर में सुतली बांधी और उसे मूसल के बीचोंबीच बांध दिया। मूसल को नीम के पत्तों से सजाया गया। किसी एक लड़के को बिना कपड़ों के घर घर जाकर मेंढ़क को नहलाना होगा, ऐसा कहने पर कोई तैयार नहीं हुआ। तुरंत मल्लू इस काम के लिए राज़ी हो गया। औरतें हंसने लगीं "तुझे नंगा होकर घर घर  मूसल लेकर घूमना पड़ेगा" लेकिन मल्लू इरादों पर अटल रहा, इतने पर भी बरसात न हुई तो..उसके दोस्त उस पर हंसते, शोर मचाते चलने लगे। मल्लू अपना काम पूरा करने के बाद तेज़ी से दौड़ पड़ा।

    रात में बिजली चमकने लगी, कहीं से तेज़ हवा बहने लगी। बारिश होने लगी, सबसे पहले मल्लू जागा । आकाश में घोर अंधेरा फैला हुआ था, बादलों को देखने की उसकी कोशिश अंधेरे में असफल रही। मल्लू के चेहरे पर टप टप बूंदें  पड़ने लगीं जैसे प्यार से उसे सहला रही  हों। मल्लू दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर जोर से गाने लगा।

    "आओ आओ इंद्र भगवान

    केले के बगीचे में पानी नहीं हैं

    बरसो बरसो इंद्र देवता

    फूलों के बगीचे में पानी नहीं हैं"

    वर्षा "टप टप" करते बड़ी बड़ी बूंदें बरसा रही थीं। आंगन पूरी तरह भीगने पर सिद्धम्मा और बसवराज उठे। मल्लू को बरसात में खेलते देख कहा कि अब अंदर चल, बीमार हो जाएगा।

    भीगे कपड़ों में मां के पास लेटते हुए पैर मारते हुए मां से पूछा "अम्मा, बरसात हुई, मुंबई तो नहीं जाओगी न.." बड़ी आशा से पूछी गई यह बात बरसात के शोर में सिद्धम्मा को सुनाई नहीं दी।

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संध्या होंगोंटिकर की लघु कहानी "फटी चादर की चाहत"

कहानी का संक्षिप्त परिचय : 

    यह कहानी जमींदारी प्रथा तथा उनके अत्याचार को उजागर करती हैं। गरीब परिवार का एक लड़का गांव में सूखा पड़ने के कारण जमींदार के घर रहने के लिए विवश हैं। लड़के के मां बाप बड़े लड़के को बंधुआ मजदूर के तौर पर जमींदार के यहां भेज कर अपनी अन्य संतान के साथ जीविका की खोज में मुंबई  जाने की योजना बना रहे हैं। पैसे की तंगी के कारण मुंबई जाने का कार्यक्रम टल रहा हैं और बरसात भी अपनी ज़िद पर हैं। ग्रामीण प्रदेश में मान्यता हैं कि  किसी लड़के को निर्वस्त्र  होकर मेढ़क को धागे से बांध कर घर घर जाना होगा । घर की औरतें मेढ़क पर पानी डालेगी और इस तरह इंद्र देवता प्रसन्न हो कर वर्षा करेंगे। गरीब परिवार का लड़का जमींदार के यहां रहने की बात से बुरी तरह डरा हुआ हैं और इसलिए वह मेढ़क को लेकर घर घर घूमने के लिए राज़ी होता हैं । लड़के के दोस्त उसका मजाक उड़ाते हैं लेकिन वह उनकी परवाह नहीं करता और सचमुच उस रात धुआंधार बरसात होती हैं तो लड़के की खुशी की सीमा नहीं रहती।  इस कहानी में काले बादल को चादर के रूप में देखा गया हैं यह चादर फटेगी तो बारिश होगी.. यह कथन कहानी में आया हैं। अंततः चादर का फटना लड़के को अपरिमित खुशी से भर देता हैं कि उसे अब जमींदार के घर काम करने नहीं भेजा जाएगा । इसलिए शीर्षक  "फटी चादर की चाहत" दिया गया हैं जो सार्थक हैं।


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डॉ. मैत्री सिंह

94485 83688

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