(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
नैनों सेअश्क मोतियों से बिखरते रहे हैं
चांदनी में रेत कण चम चम चमक रहे है
यही अश्क अनमोल मोतियाओं समान हैं
अनमोल मोतियों क्यों सिसकने लगते है
जज्बातों में जब घात प्रतिघात होता है
नयन नीर मोती बन गालों पे लुढ़कते हैं
पुरानी यादें तन मन को कष्ट से भरते हैं
दुष्चिन्ताऐं अपना सर उठाना चाहती हैं
मन कीभावनाएं जब भी पीड़ित होती हैं
तीव्रतम संतापो की ही आवृत्ति होती है
सुमन खिलते बागों मे रौनक बढ़जाती है
तन मन व जीवनी में प्रसन्नता भरती है
जब भीमन बहुत ही प्रसन्न होता जाता है
मेरे भी मन में भी मधुर रागनी बजती है
शीत में गुनगुनी धूप बड़ा ही सुख देती है
गुनगुनी धूप मेरेअंग अंग को सहलाती है
समय साथ साथ मन में बदलाव आता है
तन में भी दिव्यता सी भरती ही जाती है
भोर की लालिमा सुदूरपूर्व में छा जाती है
सम्पूर्ण अवनी भी जागृत मुस्कुरा जाती है
जब भानु की रश्मियांभी तन में समाती हैं
शरीर में स्वास्थ्य की जागृति होतीजाती है
बहुत कष्टों से पीड़ित है जन-जन का मन
नेत्रों सेअश्क मोतियों की ही वर्षा होती है
अश्कअनमोल मोती की मूल्यवान थाती है
अश्क के मोतियों को संभालना पड़ता है
की जरूरत होती है
💐💐💐💐💐💐
उमेश चंद श्रीवास्तव नंवांकुर
92473 34421
----------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363

.jpeg)
No comments:
Post a Comment