Thursday, August 3

मौली का इंडिया - डॉ.प्रज्ञा झा (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. सरोज चक्रधर कृत साझा संकलन "साहित्याकाश रचनाकारों का ... " साझा संकलन से)

  (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. सरोज चक्रधर कृत साझा संकलन  "साहित्याकाश रचनाकारों का ... " साझा संकलन से)


मौली का इंडिया
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    मौली, जी भर के शैतानियां करके थक कर मेरी गोद में सो गई थी। एयरपोर्ट में फ्लाइट का इंतजार करना मुझे हमेशा से बहुत उबाऊ लगता है और साथ में एक छोटा बच्चा हो तो कहना ही क्या। मन इतना दुखी था कि बार-बार आंखें छलक जा रही थी। कबीर से छुप छुप कर लगातार आँसू पोछ रही थी ।लग रहा था चिल्लाकर रो पडूँ पर ऐसा ना कर पाने की वजह से गले में दर्द हो रहा था और कुछ अटका सा लग रहा था।

    सारा!!!... सारा!!!, मैंने चौक कर कबीर की तरफ देखा तो वह झल्लाकर कहने लगे "कहां खोई  हो, कब से आवाजें दे रहा हूं, लो कॉफी पियो।लगता है तुम बहुत थक गई हो"। मैंने कॉफी लेते हुए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि मुझे इतना प्यार करने वाला जीवनसाथी मिला, पर कबीर इतना महत्वाकांक्षी क्यों है ?? हमारी शादी को 4 साल हुए हैं। दिल्ली में कबीर की अच्छी खासी नौकरी थी,किसी बात की कोई कमी नहीं थी ,अचानक एक दिन ऑफिस से लौटकर कबीर ने बताया कि दक्षिण अफ्रीका की एक बहुत बड़ी कंपनी में उन्होंने साक्षात्कार दिया था जिसमें उनका चयन हो गया है और हमें हमेशा के लिए जोहानसबर्ग शिफ्ट होना पड़ेगा । मेरे लिए यह सुनना किसी सुनामी या एटम बम के फटने से कम ना था ।

    मैं ...सारा शर्मा , जिसके दिल में भारत बसता हो, वह भारत से दूर कैसे रह पाएगी। मेरे लिए यह बात ऐसी थी जैसे किसी छोटे से बच्चे को उसकी मां की गोद से हमेशा के लिए दूर किया जा रहा हो।

    मैंने कबीर को बहुत समझाने की कोशिश की, पर उन पर तो विदेश जाने की धुन सवार थी । मुझे रायपुर में रहते मेरे मम्मी पापा का चेहरा याद आ गया। उम्र हो चली है दोनों की और मुझमें तो उनके प्राण बसते हैं। कैसे रहेंगे वे दोनों मेरे बिना । कबीर के घर वाले तो उनको प्रोत्साहित कर रहे थे ,मुझे यह देखकर बहुत हैरानी हुई ।मुझे विदेश ने कभी आकर्षित नहीं किया। विशुद्ध भारतीय हूं और रहूंगी। मुझे खुश रहने के लिए बड़े-बड़े कारण नहीं चाहिए ।मैं तो मेहंदी लगा के, रंगोली बनाकर और रायपुर की गलियों में घूमकर भी बहुत खुश हो जाती हूं। 

    रायपुर में हमारा बहुत बड़ा सा परिवार रहता है, जिसमें हम ढेर सारे भाई बहन हैं। और सब के बीच में प्यार और अपनेपन को समय की धूल भी धुंधला नहीं कर पाई है। सब मिलकर जोर शोर से सारे त्यौहार मनाते हैं। शादी के बाद, जब भी रायपुर गई, तो जैसे मंदिर में माथा टेकते हैं वैसे नत्थू लाल की कुल्फी, सदानी चौक के समोसे, कचोरी, कोतवाली चौक की दही कचोरी ,जय स्तंभ चौक का फालूदा, फूल चौक के गुपचुप और दही भल्ले, नेताजी के रसगुल्ले खाए बिना तो रायपुर का ट्रिप ही नहीं होता था। मौसम के हिसाब से बेर ,इमली,आँवले, गंगाइमली  की अलग ही जगह है मेरे दिल में।

    कबीर जगदलपुर के हैं। लेकिन उनसे ज्यादा तो मुझे वहां से मोह है। बस्तर का विश्व प्रसिद्ध दशहरा, चित्रकूट ,तीरथगढ़ ,चित्रधारा जैसे  खूबसूरत जलप्रपात, भोले भाले खूबसूरत आदिवासी लोग, वहां मिलने वाले तरह-तरह के कंद मूल फल ,इंद्रावती नदी और वहां के जन-जन के दिल में बसने वाली देवी दंतेश्वरी मां। दंतेश्वरी  माई के दर्शन के बिना तो बस्तर प्रवास पूरा ही नहीं होता था। कबीर चिढ़ाते हैं .....शायद तुम संसार की पहली बहू हो जो ससुराल जाने के लिए इतनी लालायित रहती है। मैं बस मुस्कुरा देती।

    अब यह सब छोड़ कर इतनी दूर जाना पड़ रहा है ,जहां से जब मर्जी तब उठ के आ भी नहीं सकते। मन चीत्कार उठता है कि मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था जो मुझे यह कालापानी  की सजा मिल रही है। मैं अपना देश छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहती ।सब कुछ तो है यहां!!! परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम, चाहे किसी भी धर्म का त्यौहार हो ,मनाता पूरा देश है। ईद में सेवई खाने सहेलियों के घर जाती हूं ,क्रिसमस में हम सब मिलजुलकर केक बनाते हैं और होली दिवाली जैसे मेरे तो सारे त्यौहार मेरे सहेलियों के बिना अधूरे हैं। क्यों लोग अपने देश की मिट्टी से दूर जाना चाहते हैं। प्रसाद बनने की खुशबू बताती है कौन सा त्यौहार आने वाला है। त्योहार भी ऐसे जो रिश्तो और पर्यावरण के महत्व को समझाते से प्रतीत होते हैं।

    मेरी बेटी मौली सिर्फ 1 साल की है, भारत से दूर रहकर मैं उसके अंदर भारतीयता को कैसे जीवित रख पाऊंगी यही सोच सोच कर मेरा सर फटा जा रहा था। मेरी हालत देखकर कबीर ने यह वादा किया कि जब भी मुझे मम्मी पापा और बाकी सब लोगों की याद आएगी, तो मुझे कुछ दिनों के लिए भारत भेज दिया करेंगे। इससे मेरे दिल को थोड़ी राहत मिली।

    हम जोहानेसबर्ग पहुंच गए ।बहुत ही आधुनिक शहर था। हमारी कॉलोनी में लगभग हर बिल्डिंग के नीचे स्विमिंग पूल और जिम था। ऐशो आराम की सारी चीजें थी बस नहीं थी तो मेरे देश ,मेरी मिट्टी की खुशबू। धीरे-धीरे पता चला कि हमारी कॉलोनी में बहुत से भारतीय परिवार रहते थे।

    मैंने उनसे मेलजोल बढ़ाने की कोशिश की। फरवरी खत्म होने को थी अगले महीने होली थी। मम्मी के हाथों की बनी गुजिया याद करके मेरे आंखों में आंसू आ गए। मैं तो प्रसाद सिर्फ खाती थी।कभी मम्मी के साथ बनाने की कोशिश भी नहीं की ।मम्मी तो एक्सपर्ट थी, सब कुछ चुटकियों में बना देती थी। 

    2 दिन बाद हमारी बिल्डिंग में एक किटी पार्टी का आयोजन था। सभी भारतीय महिलाओं ने मिलकर यह ग्रुप बनाया था। मैं वहां पहुंची तो सब बहुत स्नेह से मिली और दिल ,दिमाग, नाक, सब में भारतीय पकवानों की खुशबू आने लगी ।आंखों में आंसू आ गए ।लगा शायद मन का वहम है यहां कौन भारतीय पकवान बनाएगा। आजकल तो शॉर्टकट का जमाना है और भारतीय पकवान स्वादिष्ट होने के साथ-साथ श्रमसाध्य भी होते हैं। सब बैठ कर बातें करने लगे। गेम्स  हुए, फिर नाश्ते की बारी आई , तो मैं दंग रह गई क्योंकि वहां थे गरम समोसे कचोरी, जलेबियां, ढोकले ,दही बड़े ,चाट, गुपचुप और भी ना जाने क्या क्या । सब कुछ शुद्ध भारतीय था। वहां बसा था भारत से दूर एक छोटा भारत।

    मेरी तो आंखों में आंसू आ गए, पता नहीं ईश्वर ने मुझे इतना भावुक क्यों बनाया ।आंसू तो मानो पलकों पर ही रहते हैं। हमेशा बहने को तत्पर ।होली में भी भारतीय महिलाओं ने पूरा इंतजाम रखा था। रंग अबीर गुलाल ,गुझिया, सलोनी शकरपारे, चाकोली ।मैं फिर हैरान रह गई।

    बातों बातों में पता चला कि कोई मिसेज पांडे हैं,  मथुरा की । वे ऑर्डर पर सारे भारतीय पकवान बना देती हैं। मैंने फोन नंबर लेकर उनसे बात की। लगा दिल से दिल मिल गए। बहुत तसल्ली हुई उनसे बात करके।उन्होंने मुझे मिलने बुलाया मैं सोचती रह गई पर जा नहीं पाई। कुछ महीने गुजर गये।

    कबीर और मौली यहां आकर अच्छे से रच बस गए थे, एक मैं ही थी जिसको अपना देश, अपने लोग, अपनी मिट्टी रह रह कर याद आते थे। मैं वहां के माहौल में सामंजस्य बैठा ही नहीं पा रही थी ।

    एक दिन कबीर ने कहा .."तुम कोई प्ले स्कूल क्यों नहीं ज्वाइन कर लेती तुम्हारा भी मन लगेगा और मौली को भी बच्चों का साथ मिलेगा"। मुझे यह बात ठीक लगी।

    जुलाई से मैंने स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। अब मैं थोड़ी व्यस्त रहने लगी थी। 15 अगस्त आने वाला था ।मैं फिर उदास हो गई ।पता नहीं तिरंगा भी मिलेगा या नहीं ।मौली को इंडिया के झंडे के बारे में बताना बहुत जरूरी था और बूंदी के लड्डू के बिना कैसा 15 अगस्त!!

    मैंने मिसेज पांडे का नंबर ढूंढा और उन्हें बूंदी के लड्डू का ऑर्डर दिया। मैंने सोच लिया था कि लेने मैं खुद जाऊंगी तो उनसे मुलाकात भी हो जाएगी। थोड़ी झिझक भी हो रही थी, क्योंकि इतने महीने हो चुके थे मुझे यहां आए हुए पर उनसे मिलना नहीं हो पाया था। 

    उनके दिए समय पर मैं उनके घर पहुंची। मेरे डोर बेल बजाने पर  एक 12-13 साल के बच्चे ने दरवाजा खोला  और मुझे आदरपूर्वक बैठाकर वह मिसेज पांडे को बुलाने चला गया। उस कमरे को देखकर लगा जैसे मैं छोटे से भारत में आ गई हूं ।वहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर आसाम तक ,लगभग हर राज्य की सजावटी वस्तुएं थी। मुझे लगा मेरी तरह मिसेस पांडे के दिल में भी पूरे समय अपना देश रहता है। भले ही वह भारत से इतनी दूर है पर दिल से वो अपनी मिट्टी से ही जुड़ी हुई हैं।

    तभी व्हीलचेयर में एक महिला मेरे सामने आई।अपना परिचय मिसेस पांडे के रूप में दिया। मेरे चेहरे पर हैरानी के भाव को भांपते हुए बोली... "मैं व्हीलचेयर में बैठकर सारे भारतीय पकवान बना लेती हूं ।शुरू शुरू में दिक्कत होती थी ,पर अब तो आदत सी हो गई है। कहने लगी ,कहते हैं दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है और अगर दिल भारतीय हो तो पकवान भी तो भारतीय ही बनाने होंगे। हम दोनों ही मुस्कुरा पड़े। जीवन के प्रति ,उनके जज्बे को देखकर मुझे अलग ही ताकत मिली।

    अगले ही दिन 15 अगस्त था। मुझे मौली को सब कुछ समझाना बताना था। पर वक्त ही नहीं मिला, अगली सुबह मौली की आवाज से नींद खुली। कह रही थी ..."ममा जल्दी उठिए, मुझे आप को विश करना है आज हमारी कंट्री इंडिया का इंडिपेंडेंस डे है। हैप्पी इंडिपेंडेंस डे ममा,जय हिंद जय भारत ममा"। 

    मेरे आंसू फिर  बह चलें पर इस बार खुशी के थे और कबीर खड़े मुस्कुरा रहे थे ।मैंने झट से अपने आंसू पोछे और गर्व से कह उठी ....जय हिंद जय भारत भारत माता की जय।


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© डॉ.प्रज्ञा झा

सह - प्राध्यापक

School of Education  

MATS UNIVERSITY , 

RAIPUR, CHHATTISGARH.

92291 32040

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