Tuesday, August 23

ये कहाँ आ गए हम !!! - फ़रज़ाना (जाना) (मैं कविता...)

 (मैं कविता...)


ये कहाँ आ गए हम !!!


ये कहाँ आ गए हम !!!
हम दूर बहुत अपनों से हैं !
दर्द को दिल में सुलाके हैं |
चाहे बात ख़ुशी की हो ,
या कभी अकेलेपन की हो |
हाल कुछ हमारा भोलेनाथ जैसा है ,
हर हाल में हमें तांडव करते रहना है |
कुछ करने की चाह ने हमें अपनों से ,
लाकर खड़ा कर दिया दूर अपनों से |
अब तो किसी के पास घड़ी भर की फुर्सत नहीं है ,
जाने क्या हासिल करना है पता भी तो नहीं है |
हम जब बच्चे थे,
शायद तभी हम बहुत खुश थे |
माँ के हाथों से एक साथ खाना खाते थे सभी ,
साथ न रहा कोई अभी ,मन की बात बस मन में ही रह गई |
हम नाटक बहुत अछे से कर लेते हैं ,
दुखों को सीने में दबाके, झूटी मुस्कान भरते हैं |
हम दूर बहुत अपनों से हैं,
छोटे से पेट को भरने ये कहाँ आ गए हैं |
कभी इच्छाओं ने तो कभी ज़रूरतों ने ,
झुकाकर रख दिया सारी ज़िंदगी को, हसरतों ने |


फ़रज़ाना (जाना)
एम.ए, बी. एड
हिंदी शिक्षिका एवं
हिंदी विषय की नेता(Subject Leader)मंथन विश्व विद्यालय
गाँव- भानूर
रामचंद्रापुरम मंडल
संगारेड्डी जिला
हैदराबाद
99594 86458

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