(हिंदी हूँ मैं...)

आज का दौर अनेक विमर्शों का दौर है। उनमें दलित, स्त्री,
आदिवासी विमर्श विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। इन विमर्शों में अपनी अस्मिता, अपने
अधिकारों, न्याय की चर्चा होती है। प्रत्येक विमर्श का एक निश्चित उद्देश्य है। उन
उद्देश्यों की पूर्ति इन विमर्शों के माध्यम से की जाती है। इन प्रचलित विमर्शों
के साथ-साथ नवविमर्शों की अवधारणा भी प्रचलित होने लगी है। पर्यावरण विमर्श इन नवविमर्शों में से एक विमर्श है।
जिसके अंतर्गत पर्यावरण की समस्याओं और किसानों की स्थितियों पर गंभीरता से विचार
विमर्श किया जाता है।
विवेकी राय के उपन्यासों में भी प्रेमचंद के
उपन्यासों में पर्यावरण और किसानों की दयनीय स्थिति, उनकी विडंबना की नियति को
उजागर किया है। यह कैसी विड़ंबना है कि समग्र संसार का अन्नदाता पर्यावरण और किसान
सभी ओर से उपेक्षित है। पर्यावरण और किसान जैसी दुर्दशा आज किसी की नहीं है। किसान
समग्र अभावों की मार को चुपचाप सहता रहता है। उसमें निरंतर जी तोड़ कष्ट करने की
और जीने की आश्चर्यजनक आकांक्षा होती है। वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निरंतर
संघर्ष करता है। किसानों की पीढ़ी दर पीढ़ी जी तोड़ मेहनत कर और अभाव का जीवन
व्यतीत करने के लिए अभिशप्त है । गोदान के अभागे होरी से लेकर आज तक की न जाने
कितनी पीढ़ियाँ आयी-गई किंतु उनकी दुर्दशा में तनिक भी परिवर्तन नहीं हुआ है।
विवेकी राय ने इन्हीं समग्र बातों को पने उपन्यासों में उजागर किया है ।
विवेकी राय ने
अपने उपन्यासों में जो पर्यावरण और किसान की त्रासदी को दर्शाया है वह केवल उनकी
किसानों के प्रति कोरी सहानुभूति नहीं है बल्कि वह भोगी हुआ यथार्थ है । विवेकी
राय अध्यापक, लेखक होने के साथ-साथ किसान भी है । इसलिए वह किसानों के जीवन संघर्ष
से, उनकी वेदनाओं से, उन पर आने वाले प्राकृतिक संकटों को भली-भाँति जानते हैं।
विवेकी राय ने अपने ‘बबूल’ नामक उपन्यास में किसान वर्ग की प्राकृतिक
आपदाओं के कारण होने वाली तबाही को मार्मिक रूप रेखांकित किया है। उपन्यास का नायक
महेसवा नामक पात्र समग्र भारतीय किसानों का प्रतिनिधित्व करता है। उपन्यास में
विवेकी राय ने महेसवा की त्रासदी, नियति व विवशता आदि का अनेक प्रसंगों के द्वारा
चित्रण किया है, वह केवल एकमात्र महेसवा का नहीं है, बल्कि आज के समग्र भारतीय
किसानों का है। आज का प्रत्येक किसान स्वयं को महेसवा के स्थान पर पाता है, उसमें
उन्हें अपना प्रतिरूप दिखाई देता है क्योंकि उसकी परिस्थितियाँ भी महेसवा के समान
ही दयनीय है ।
विवेकी
राय ने अपने उपन्यासों में जो प्रमुख समस्या है वह प्राकृतिक आपदाओं की है क्योंकि
प्रकृति भी सहायतों की अपेक्षा किसानों के साथ धोखा करती है । कभी-कभी इतनी बरसात
होती है कि बाढ़ के कारण समग्र खेतों की फसल चौपट होती है तो कभी-कभी अकाल के कारण
समग्र हरी-भरी फसल जल जाती है। प्रकृति किस तरह किसानों के साथ छल करती है इसका
वर्णन उपन्यास के अनेक ह्रदयद्रावक प्रसंगों में दिखाई देता है । उनमें एक प्रसंग
उल्लेखनीय है । जब बाढ़ आती है तो घुरबिन अनेक देवी-देवताओं को अपने खेतों में उगी
फसल की रक्षा करने की गुहार लगाता है, गिड़गिड़ाता है और रोता है । जब बाढ़ के
पानी से उसकी फसल बर्बाद होती है तब वह जोर से रोने लगता है तथा उसका धीरज छूटने लगता
है । यह प्रकृति भी किसानों के साथ कितनी निर्ममता का व्यवहार करता है । पानी से
समग्र फसल नष्ट होने के बाद उसकी जो मनोदशा होती है वह पीड़ादायक है। उपन्यासकार ने
उसकी मनोदशा का वर्णन इस प्रकार किया है- “मेले
में माँ का आँचल चूट गए भूले बालक-सा यह एकदम कलेजा फाड़ रहा है...हाय हो संझा माई
! आह ! आह ! अहि हो
गंगांमाई ! अब हम कवना देशो भीक माँगे जाई ए भगवान... अरे अब
त टेहुन भर पानी होगइल ए दादा ! हम कइसे जी ही...।”1 बाढ़ की भाँति अकाल भी एक भीष्ण समस्या है जिसकी मार को प्रत्येकवर्ष पर्यावरण
और किसानों को झेलना पड़ता है । इस उपन्यास में अनेक ऐसे किसान हैं जो बाढ़ और
अकाल का शिकार हैं । इन प्राकृतिक अपदावों की मार सहना मानो उनकी नियति बन गया है
। इस उपन्यास में महेसवा अकाल का शिकार है। उसके खेत की हरी-बरी लहराती धान की फसल
पानी के अभाव में सुख जाती है और उसकी चिंता करने से किसान भी सूख कर कंकाल एवं हड्डियों
के ढाँचा बन रहा है।
किसान पूर्णरूप से प्रकृति या पर्यावरण पर
निर्भर रहता है । वह आज भी निरंतर प्रकृति का को पभाजन बन रहा है। संसार में किसान
ही एक मात्र ऐसा उत्पादक है जिसे उसने रात-दिन मेहनत कर उपजाए अनाज का मूल्य बाजार
में तय करने का हक नहीं है । उसे केवल श्रम करने का अधिकार है। कितनी विड़ंबना है
कि दिन-रात कड़ी मेहनत कर अन्न उपजाते हैं, किसान और उसे कम मूल्य में खरीद कर
अमीर व्यापारी और दलाल बनते है। यह सरासर उसकी दिन-दहाड़े लूट ही है। उसे रात-दिन
मेहनत कर उपजाए गए अन्न का उचित मुआवजा भी नहीं मिलता । इससे अधिक उसकी त्रासदी
क्या हो सकती है। इस समस्या को विवेकी राय ने अपने उपन्यास ‘सोनामाटी’ में उठाया है । पात्र के माध्यम से कहते हैं- “किसान के अनाज के व्यापार में आज जिसने हाथ लगाया कल उसकी मंड़ी में कोठी खड़ी
हो गयी, गोला दमदमाने लगा और गद्दी के इर्द-गिर्द सुनहरे शुभ-लाभ का ताम-जाम
इकट्टा हो गया । इधर किसान पुश्त-दर-पुश्त उसी अनाज को पैदा कर-करके आज भी उसी
तंगदस्ती, फटेहाली और बेहाली में बिलबिला रहा है । खेत देखकर, रकबा देखकर, गल्ला
देखकर और किताबी अनुमान लगाकर किसान को खुशहाल बादशाह घोषित करने वाले कितने भ्रम
में हैं । शहरी नेता, व्यापारी और शहरी सरकार के लोग कभी क्या किसान का दर्द
समझेगे?”2 सरकार की पर्यावरण और
किसानों के दुर्दशा के प्रति उदासीनता एक चिंता का विषय है। आज देश में प्राकृतिक
संसाधनों का नुकसान किया जा रहा है और किसानों की आत्महत्याओं का प्रमाण दिनों-दिन
बढ़ रहा है। इस पर कोई ठोस पर्याय नहीं निकाला जा रहा है। विवेकी राय ने ‘बबूल’ उपन्यास में कपड़ों के अभाव में डूब कर
आत्महत्या करती दरपनी के द्वारा से उजागर किया है। भारत में पर्यावरण संरक्षण और किसानों का राष्ट्रीय स्तर पर कोई
संगठन नहीं है। उनके इस असंगठन का लाभ प्रत्येक स्तर पर समाज में उठाया जाता है।
अगर राष्ट्रीय स्तर पर उनका कोई संगठन बनता है तो इसका बहुत कुछ लाभ पर्यावरण और
किसानों को होता है हालांकि वह अपने अधिकारों लिए अपने अनाज को उचित मूल्य प्राप्त
होने के लिए और उनका व्यापारियों, दलालों के माध्यम से होने वाले शोषण के विरोध
में अपनी आवाज को एक साथ बुलंद करना चाहिए। लेकिन दुर्देव है कि उनका इस प्रकार का
कोई संगठन नहीं है। सरकार भी पर्यावरण और किसानों की दयनीय स्थिति पर गंभीर होकर
कोई पर्याय नहीं निकालती है। विवेकी राय ने पर्यावरण और किसानों के इस असंगठन के
कारण होने वाली क्षति पर भी उपन्यासों में विचार विमर्श किया है। ‘समर शेष है’ उपन्यास में एक पात्र सुराज से किसानों
के असंगठन के संदर्भ में कहते हैं कि- “दुर्भाग्य यह है कि
इनकी कोई आवाज नहीं है । आज किसान जैसा असंगठित कोई नहीं है । इसने बैल की तरह उपर
से लादी सारी व्यवस्था को स्वाकार कर लिया है । इसे जो बेचना है वह गाजर-मूली के
मोल बिकेगा और इसे जो खरीदना है वह केसर-कस्तुरी जैसा । मन करता है आग लगा दूँ इस व्यवस्था
में।”3 विवेकी राय ने किसान वर्ग और पर्यावरण के संबंध में
व्यापक धरातल पर अभिव्यक्त किया है। किसानों को किस प्रकार संघर्ष करना पड़ता है,
कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है इस सच्चाई को विवेकी राय ने अपने उपन्यासों
में किसान पात्रों और विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से चित्रित किया है। उनका समग्र
साहित्य सृजन पर्यावरण और किसानों के संरक्षण का पक्षधर है । विवेकी राय को इस बात
पर गहरा क्षोभ है कि किसानों का कोई हितौषी या पक्षधर दिखाई नहीं देता है। समग्र
संसार की क्षुब्धा की आग को शांत करने वाला पर्यावरण और किसान वर्ग ही स्वयं आज
दाने-दाने के लिए मोहताज हुआ है। किसान वर्ग और पर्यावरण की इसी दयनीय अवस्था का
प्रमाण है विवेकी राय का ‘नमामि ग्रामम्’ उपन्यास। इस उपन्यास में लेखक ने अनेक प्रसंगों के माध्यम से किसान के
शोषण एवं दमन चक्र और पर्यावरण को रेखांकित किया है। किसान किस प्रकार शोषण की
चक्की में पीसता है और पर्यावरण की उसका शोषण करने वाली श्रृंखला कैसी है उसे दर्शाते
हुए उपन्यासकार ने लिखा है- “दुनिया
का प्रमुख धन अन्न मेरा बेटा किसान उत्पन्न करता है, अतः यह दिन की तरह स्पष्ट है
कि दुनिया के प्रमुख धनकुबेरों में किसान का नाम प्रथम होना चाहिए। पर ऐसा नहीं है।
वे लूट लिए जाते हैं। उनकी सिधाई का नाजायज फायदा उठाकर कुछ पेशेवर तिकड़मी जनों
ने ऐसा जाल बिछाया कि वे फँसे ही जाते हैं। फिर एक बार फँसने पर तो छुटकारा मिलना
तो कठिन ही है । मेरे बेटे के अन्न से ही दुनिया का काम चलता है । किंतु किसान
सीधे जरूरतमंदों को बेच नहीं पाता । यही उसका दुर्भाग्य है। व्यापारी हैं, सेठ
हैं, ये किसान का जीवन-रस मोल लेते हैं । फलतः समस्त रस उनके पेट में जाता है।”4 इस प्रकार समग्र अभावों को झेलकर, सभी सुख-सुविधाओं से वंचित किसान वर्ग की
क्षुब्धा को शांत करने के लिए दिन-रात, धूप-जाड़े में कड़ी मेहनत करता है। विड़ंबना
है कि हर स्तर पर वह शोषण का शिकार होकर शोषण की चक्की में पिस रहा है। उसका कोई
पक्ष लेने वाला नहीं है। विवेकी राय ने पर्यावरण और किसानों की इन्हीं दयनीय स्थिति का मार्मिक
चित्रण उपन्यासों में कर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है । उनके उपन्यासों में
किसान पात्र जो पीड़ा भोगते हैं वही पीड़ा वास्तविक जीवन में हमारे किसान भाई भी
भोग रहे हैं और जो पर्यावरण पर खतरा मंडरा रहा है वह यथार्थ रूप में उपन्यासों में
चित्रित है।
विवेकी
राय कृत उपन्यासों का विवेचन करने पर निष्कर्ष के रूप में यही स्पष्ट हो जाता है
कि पर्यावरण की उपेक्षा की जा रही है और किसानों की स्थिति बहुत दयनीय है।
उन्होनें अपने उपन्यासों में पर्यावरण और किसान वर्ग की जिन समस्याओं को उठाया हैं
वह आज भी प्रासंगिक है और आज पर्यावरण और किसान वर्ग निरंतर उन समस्याओं सें घिरता
जा रहा है। पर्यावरण और किसान वर्ग के लिए सरकार कुछ भी नहीं कर रही है।
परिणामस्वरूप किसानों की आत्महत्याओं का प्रमाण दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है और पर्यावरण
का अँधाधूंद तरीके से दोहन किया जा रहा है। ऐसी स्थितियों में विवेकी राय के
उपन्यास अधिक प्रासंगिक है।
संदर्भ
1. विवेकी राय - बबूल, पृ.सं. 13
2. विवेकी राय - सोनामाटी, पृ.सं. 267
3. विवेकी राय - विवेकी राय, पृ.सं. 249
4. नमामि ग्रामम् - विवेकी राय, पृ.सं 18
पि. विजय कुमार
शोधार्थी
पीएच-डी. हिंदी
उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
मो.नं. 9493433760

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