Friday, July 8

संत कबीर के दोहों में गुरु की महत्ता - प्रो. विजया भारती जेल्दी (भारतीय साहित्य के विविध स्वर)

भारतीय साहित्य के विविध स्वर




संत कबीर के दोहों में गुरु की महत्ता

    कबीर दास जी भारतीय संत परंपरा के महान कवि माने जाते हैं। साधुओं के संगत में रहकर उन्होंने ज्ञानार्जन किया । देश भर भ्रमण करते हुए अपनी वाणी के माध्यम से इन्होंने अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाया । ये ज्ञान संपन्न थे। देशाटन करते हुए संत- महात्माओं से मिलकर उनके द्वारा उन्होंने ज्ञानार्जन  किया ।

    हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने इनकी भाषा का मूल्यांकन करते हुए कहते हैं कि "भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप से प्रकट करना चाहा है,उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया है--बन गया है तो सीधे- सीधे, नहीं तो दरेरा देकर । भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार -- सी नज़र आती है। उसमें मानो ऐसी हिम्मत ही नहीं है कि इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फ़रमाइश को नाहीं कर सके।"

    अत्यंत सरल और सहज रूप से ये अपने विचार लोगों के सामने रखते थे। इसलिए वे सामान्य जनता के बहुत अधिक निकट थे। कबीर जी एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। तत्कालीन समाज में हिन्दू और मुसलमान धर्मों में प्रचलित दुराचारों का उन्होंने डटकर विरोध किया। जाति- पाती के भेद भाव को ये नहीं मानते थे। अपने उपदेशों के द्वारा सामाजिक विषमताओं को सुधारने का उन्होंने प्रयास किया था।

    कबीर जी निर्गुण भक्ति धारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक हैं। संत संप्रदाय में विशिष्ट स्थान रखते हैं। इनके उपदेश दोहे और पदों के रूप में बीजक नामक ग्रंथ में संग्रहित हैं। जिसके तीन भाग हैं - साखी,सबद,रमैनी। इनकी भाषा साधुक्कड़ी मानी जाती है। ये गुरु को अधिक महत्व देते थे जो इन्होंने अपने पूर्ववर्ती संप्रदायों से ग्रहण किया है। संत काव्य परंपरा के पूर्व सिद्ध और नाथ गुरु को अत्यधिक महत्व देते थे क्योंकि सिद्ध  संप्रदाय में साधना विशेष महत्व रखती थी,गुरु के बिना साधना असंभव सी बात थी इसलिए गुरु की आवश्यकता व अनिवार्यता के कारण गुरु का महत्व बढ़ता गया । नाथ संप्रदाय में भी गुरु को वही प्रतिष्ठा मिली जो सिद्ध संप्रदाय में थी। संतों ने भी इन दोनों संप्रदायों का अनुसरण किया और गुरु को अत्यधिक प्रधानता प्रदान किया ।

    कबीर दास जी ने गुरु को गोविन्द से भी अधिक ऊँचा स्थान दिया और कहा-- 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाय।

बलिहारी गुरु आपणौं,गोविन्द दियो बताय।।

    इस दोहे में कबीर कहते हैं कि गुरु और गोविन्द दोनों मेरे सामने खड़े हों तो मैं पहले गुरु के ही चरण स्पर्श करूंगा क्योंकि उन्हीं के द्वारा मैं ने गोविन्द के बारे में जाना है।

    ज्ञान का प्रकाश प्रदान करने वाले गुरु को जीवन में कभी न भुलाने का संदेश देते हुए कहते हैं--

ग्यान प्रकास्या गुरु मिल्या, सो जिनि बीसरि जाइ।

जब गोविन्द कृपा करी, तब गुरु मिलिया आइ।।

    गुरु जो हमारे ज्ञान के प्रकाश दाता हैं,  उन्हें कभी भी भूलना नहीं चाहिए। क्योंकि इस दुनिया में सद् गुरु का मिलना अत्यंत कठिन है। ऐसे गुरु हमें परमात्मा की कृपा से ही मिलते हैं, जिन्हें भुलाना नहीं चाहिए।

    गुरु और गोविन्द के अभिन्नता को मानते हुए कबीर जी निम्न प्रकार से कहते हैं--

गुरु गोविन्द तो एक है, दूजा यहु आकार।

आपा मेट जीवित मरै, तो पावै करतार।।

    गुरु और गोविन्द दोनों आत्म-रूप में अभिन्न हैं। इनका अंतर केवल इस माया रूपी शरीर के कारण ही है। इसीलिए जब जीवित हैं,तभी अपने अहंभाव को मिटाकर, शिष्य मृतक तुल्य बनजाय तो परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। 

    सतगुरु से शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं -

कबीर सतगुरु ना मिल्या, रही अधूरी सीख।

स्वांग जती का पहरि करि, घरि घरि मांगै भीख।।

    इस दोहे में कबीर जी कहते हैं कि यदि शिष्य को सदगुरु नहीं मिलते तो उसकी शिक्षा अधूरी रह जाती है, इस अवस्था में वह केवल योगी का रूप धारण कर योगी होने का अभिनय करता है और घर घर भटकता है।

    कबीर जी ने गुरु को जीवन के बाहर और भीतर बहुत व्यापक दृष्टिकोण से आंका है। उनके शब्द -  वाणियों में स्पष्ट संकेत है -- "गुरु केवल गुरु है, गुरु की समानता किसी से नहीं हो सकती । गुरु ज्ञान स्वरूप है, गुरु से दीक्षित जीव अपने लिए ही नहीं, अपितु औरों केलिए भी कल्याणकारी सिद्ध होता है।"

    निम्न दोहे में कबीर कहते हैं--

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ।।

    गुरु कुम्हार और शिष्य घड़े के समान हैं। जिस प्रकार कुम्हार अपने घड़े का दोष दूर करने केलिए भीतर हाथ का सहारा देकर ऊपर से गढ़ता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को बाहर से कठोर अनुशासन में गढ़कर,अन्तर से प्रेम करते हुए शिष्य की बुराइयों को दूर कर देते हैं।

    नाम की उपासना करने वाले कबीर एक दोहे में इस प्रकार कहते हैं- 

राम नाम के पंटतरे, देबे को कुछ नाहिं।

क्या ल गुरु संतोषिए, हौंस रही मन मांहि।।

    इस में कबीर कहते हैं कि राम नाम अमूल्य है, देने योग्य कोई अन्य वस्तु उनकी तुलना नहीं कर सकती । गुरु ने इसी नाम का दान दिया है, इसलिए मन में यह अभिलाषा दबी रही कि कौन सी वस्तु देकर उन्हें संतुष्ट करुं। 

    गरु के महत्व का कारण यह है कि साधक के साधन- काल में अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं, अनेक प्रकार की शंकाएं आती हैं। ये शंकाएं कभी इतनी गंभीर हो जाती हैं, तथा विघ्न इतने भयंकर हो जाते हैं कि साधक अपने पथ से भ्रष्ट हो जाता है। ऐसी दुविधा की अवस्था में साधक अपने गुरु से अपनी शंकाओं की निवृत्ति करा सकता है।

    सतगुरु के मिलने पर शिष्य की  दशा बताने के संदर्भ में कबीर जी कहते हैं - 

हंसे न बोलै उनमनी, चंचल मेल्हया मारि।

कहै कबीर भीतरि भिद्य, सतगुरु के हथियारि।। 

    जिसका अर्थ है, उनमनी दशा में पहुंचा हुआ शिष्य न तो हंसता है, न ही बोलता है। क्योंकि वह मन तथा तन की चंचलता को मार कर दूर कर देता है,किन्तु इसका श्रेय उसे नहीं, बल्कि गुरु को है,जिनके हृदय बाण से उसका ह्रदय विद्ध हो चुका है।

    निम्न दोहे में कबीर जी इस प्रकार कहते हैं--

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार।

लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखसवणहार।।

    कबीर जी कहते हैं कि सतगुरु की महिमा वर्णनातीत है,उन्होंने ज्ञान प्रदान करके जो उपकार किया है,वह कह  नहीं सकता क्योंकि अनंत नेत्रों के समान ज्ञान - चक्षु को खोल दिया है, जिससे परम सत्ता देखी जा सकती है।

गूंगा हुआ बावला ,बहरा हुआ कान।

पाऊ थै पंगुल भया,सतगुरु मारया बाण।।

    कबीर कहते हैं कि सतगुरु ने शब्द का ऐसा बाण मारा कि जो वाचल था,गूंगा हो गया, जो सुनता था,बहरा हो गया, जो तीर्थयात्राओं में भटकता था,पंगु होकर एक स्थान पर बैठ गया। अर्थात उसे कहने- सुनने और भ्रमण करने की आवश्यकता नहीं रह गयी ।

    कबीर कहते हैं कि इस संसार में गुरु के समान कोई हितैषी और अपना सगा नहीं है,इसलिए मैं अपना तन- मन और सर्वस्व गुरु के प्रति समर्पण करता हूं जो क्षण भर में ही अपनी कृपा से मनुष्य को देवता बनाने में समर्थ हैं।

    निम्न दोहे में देखिए कबीर क्या कहते हैं--

सतगुरु हम सू रीझि करि, एक कह्या प्रसंग ।

बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग।।

    इसमें कबीर कहते हैं कि सतगुरु ने हम पर प्रसन्न होकर ईश्वर-भक्ति का उपदेश दिया है,जिसे सुनते ही प्रेम के बादल उमड़ पड़े,मेरे सारे अंग उससे भीग गये।

    एक और दोहे में कबीर जी इस प्रकार कहते हैं--

सतगुरु सांचा सूरिवां, सबद जु बाहया एक।

लागत ही मैं मिल गया, पडया कलेजै छेक।।

    अर्थात सतगुरु सच्चे वीर हैं,वे शब्द बाण चलाने में अद्वितीय हैं । उन्होंने ऐसा बाण मारा कि उसके लगते ही 'मैं'-- मेरा अहंभाव मिट्टी में मिल गया और प्रेम की पीर उत्पन्न करने करने वाला छेद हो गया ।

    अतः कबीर जी अपने दोहों के द्वारा अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति दिखाते हैं और सतगुरु की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं कि सच्चे ज्ञान की प्राप्ति से ही ईश्वर में लीन हो सकते हैं ।आधा अधूरा ज्ञान अनर्थ दायक है। पूर्ण मन से गुरु के उपदेशों को ग्रहण कर उनका अनुसरण करने पर स्वयं भी लाभान्वित होंगे तथा ‌‌औरों के मन में भी ज्ञान के दीप जला सकेंगे।


संदर्भ ग्रंथ

१. कबीर ग्रंथावली -- डॉ॰ श्यामसुंदर दास

२. कबीर ग्रंथावली--डॉ॰ एल.वी.राम 'अनन्त'

३. कबीर वाणी सत्य -- ज्ञानामृत ----लालचंद दूहन  'जिज्ञासु'

४. कबीर-- साखी सार---- डॉ॰ राम वशिष्ठ, डॉ॰ तारकनाथ बाली

५. कबीर ग्रंथावली--डॉ॰ पुष्प पाल सिंह

   

प्रो. विजया भारती जेल्दी

हिन्दी विभाग

आन्ध्र विश्वविद्यालय

विशाखापट्टनम 

92475 15269

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