Sunday, July 10

ग़ज़ल - विनोद कश्यप (काव्य धारा)

काव्य धारा


ग़ज़ल

कहाँ पर रूठे बैठे हो पता तो लिख दिया होता,

हमें भी दिल लगाने का बहाना एक दिया होता।

या ऐसा ज़ख़्म दे जाते जो एक नासूर हो जाता,

तुम्हारी याद का उसके दर्द ने काम किया होता।

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नहीं मालूम था हमको कि दर्दे हिज़्र क्या शय  है?

इसे बर्दाश्त करने का कोई सबक पहले दिया होता। 

हमारी जां पर बनीं है तुम को कुछ भी ख़बर नहीं,

किसी के जीने मरने का ख़्याल पहले किया होता।

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जिया करते हैं हम तो बस तुम्हारा नाम ही ले कर,

हमारा नाम भी कभी जो तुम ने ले लिया होता। 

सिया करते हैं हम तो तन्हाई में हर शब्द सीने के, 

एक आधार ज़ख़्म तुमने 'कश्यप' जो सीया होता।।



विनोद कश्यप

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