काव्य धारा

दिमाग के गहराइयों में
लहराता अतृप्त सा कुछ
वासनाओं के जाल में फँसकर
बुरी लत का गुलाम हो गया है..!
सुलगती सिगरेट की धुँए में
बुद्धि भ्रष्ट हो कर,
जंगली भूख की पुकार से
चरित्र विचार शून्य हो गया है
न खाना.., न पीना..,
न सुध.., न बुध..,
बस अलमस्त समा में
गति चैतन्य का सो गया है..!
हरदिन नशे में दुत्त होकर
बेहोश हो रही है जवानी
कोकाइन और हेराइन से
और भी हो गयी है दीवानी..!
सँभल जाओ वर्ना यह जहर
खाई में तुमको खींचता है..
कीमत पूरी लेकर यह वेहशत
तुमको मौत के कुएँ में ढकेलता है..!
डॉ वरप्रसाद वासाला
हिन्दी सहायक आचार्य,
हिन्दी विभाग,
श्री
राजाराजेश्वरा शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय,
करीमनगर।
9490189847,
varavhindiresources@gmail.com


👏👏🌹🌹 good poem keep it up like this and educate the society sir
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