काव्य धारा

गाँव का किसान
सबसे प्यारा , सबसे न्यारा
यहाँ हर कोई अपना
हम गए तो हमारा
आप गए तो आपका
किसान! तू अन्नदाता
मिट्टी के कण-कण में बसता
सोने की फसल उगाता
सर्दी ,बारिश,गर्मी से लड़ता|
तू तो देश के अर्थव्यवस्था का मेरुदंड
तेरी ही झोली खाली
तू ही सब सुख - सुविधाओं से वंचित|
स्वार्थ, छल, कपट से तू कोसों दूर
तुझे न भविष्य की चिंता
तू तो वर्त्तमान में जीता
आशावादी मन रखता |
तू सबकी प्रेरणा
तू ईश्वर का प्रतिरूप
तू कर्म का पुजारी
तू माता -पिता|
तेरे ही परिश्रम पर सारा संसार तृप्त है,
मत ख़त्म कर अपने आप को
तेरे बिना संसार अनाथ है |
पार्वती भगवानराव देशपांडे
सहायक प्राध्यापिका,
कस्तूरबा गाँधी डिग्री एंड पीजी कॉलेज
सिकंदराबाद


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