Wednesday, July 6

अपरिवर्तित - डॉ के पद्मा रानी (काव्य धारा)

काव्य धारा


अपरिवर्तित


परिवर्तन शाश्वत नियम है

प्रकृति का

प्रगति के पथ पर

चलते रहने के लिए,

पर जिसने जाना प्रकृति परिवर्तित है

वह रह गया अपरिवर्तित

 

धनवान युगों से

धनवान ही बनता है आया है

कभी उससे कम का ओहदा

उसको कहाँ मिलता है ?

 

निर्धन युगों से अब तक

निर्धन ही बनता आया है

घर -परिवार को भरपेट

रोटी कहाँ खिला पाया है

 

कुटज बने रहे वैसे ही

रहता जिसमें कृषक महान

बिन पानी और धूप के

छप्पर कहाँ बना पाया है

 

तन मन देकर पालन करते

बेघर बनकर सब कुछ सहते

इन माता पिता को  रेंगता देख भी

संतान कहाँ आश्रय देते हैं

 

शोषक की लाठी में

दीमक न तो  लगता है

ना ही चाबुक में कीड़े

जाने किस मिट्टी का बनता है

 

रिश्वतखोर का वही काम

कम से ज्यादा

ज्यादा से और ज्यादा

वह जिम्मेदार कब बनता है

 

बेटी का दहेज देकर भी

बेटे का दहेज लेता है

बेटी को राख बनता देख

बेटों का बाप कहाँ पिघलता है

 

चारों ओर की हाहाकार ,चीत्कार 

संजो रहा है खिसियाते हुए

उसे मिटाने दिलासा देने

प्यार कौन लुटा रहा है

 

परिवर्तन निर्जन वन में होता है

हर वर्ष सहर्ष

जल थल नभ

सबमें नवजीवन का

इसको जानकर भी

जड़ बनकर रह गया

ज्ञानी, महाज्ञानी

अपरिवर्तित !!



डॉ के पद्मा रानी 

सहायक आचार्य

शासकीय महिला महाविद्यालय

खम्मम

91774 86704

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