काव्य धारा

बाबा को ढूंढती दुल्हन की नज़रे
चारों तरफ खुशहाली है, सबके चेहरे पर लाली है
ढूंढ़ रही है आपको नजरे, बाबा आप नज़र क्यों नहीं आते
हल्दी मेरे तन पर लगी, महेंदी से हथेली मेरी सजी
चूडियां शोर करती है, चुनरी की चमक बढ़ती है
ढूंढ़ रही है……….
पैरों में पाजेब बजती हैं, जोड़े की रंगत लाल है,
नाक की नथनियाँ गोल है, गुलाबों से सजे बाल है ।
खुशियों से भरा समा है, आप ही मेरा जहाँ है,
हर पल भटकती है नजर, जाने आप कहाँ हैं
सबने आपको भुला दिया, पर मैं भूल न पाऊंगी
शादी के बाद कहीं मैं, पराई तो नहीं हो जाऊँगी ।।
कैसे रची ये शादी, जिसमे आपका एहसास नही
आज भी वीरान है ये दुनियाँ, जिसमें आपका आभास नहीं
कैसी अभागी दुल्हन हूँ, आपसे लिपट कर रो न सकी मैं,
आँसू तो बहुत गिरे पर, दुशाला आपका भीगों न सकी मैं
आज आखरी बार तो, विदा किया होता,
आज तो अपने से जुदा न किया होता
जीवन भर ये गम मैं भूल न पाऊंगी,
आपकी लाडली हूँ बस आपकी ही कहलाऊंगी
ऐसी क्या जल्दी थी, जो संसार ही छोड़ दिया,
मैने संभलना भी न सीखा, आपने हाथ छोड़ दिया
रह रह कर ये प्रश्न सताता है, आपके साथ गुजरा,
हर लम्हा याद आता है।
ओ बाबुल प्यारे क्यों, इतनी बड़ी सज़ा दी,
बेटी के रस्मों को छोड़, खुदा की रस्म निभा दी ।।
कोई भी जनम हो मेरा, आपको पिता पाऊँ मैं,
वरना आपसे पहले जीवन, अधूरा छोड़ जाऊँ मैं ।।
ढूंढ़ रही है आपको नज़रे' बाबा आप नज़र क्यो नहीं आते
बोलो बाबा आप नजर क्यों नहीं आते
Email.narsing.mohan@gmail.com
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