Saturday, July 2

मां - डॉ चंद्रकांत बलभीम बिरादार (काव्य धारा)

काव्य धारा


मां 
               
मां तो होती हैं महान
जिसके पाओ शिस नमाते हैं।
वह हमारे लिए अपने सपनों को त्यागकर 
हमारे जीवन को संजोने का काम करती है।
वह सबसे महान हैं जो हमारे जीवन की पहचान है । 
हमारे जीवन में चार चांद लगाने की करती है कामना।
मां के बिना सब अधुरा है। 
उस अधुरे को वह अपने ही आप कर देती है पूरा।
मां का बेटे के प्रती होता है 
बड़ा लगाव लेकिन बेटा जब बाप बन जाता है तो वह हो जाता है 
पराया और अपने से बना देता है दूरियां उस लिए 
आज मां शब्द मां बनकर ही रह गया है लेकिन 
उस शब्द को अधुरा रखने का काम एक मां ही करने लगी है। 
वह अपने आप में उलझ जा चुकी है उस लिए तो कहने लगे हैं
 दस बच्चों को संभालने में नहीं डगमगाती थी मां 
लेकिन दस बच्चों के लिए मां बोझ लगने लगी है।
यार यह तो आज के जीवन शैली का तकाजा बन चुका है।
एक हाथ से लेना और दूसरे हाथ से चुकाना है। 
यह सब पता होने पर भी जीवन एक खिलौना है। 
इतना सब मां के साथ होने पर भी मां एक महान हैं। 



डॉ चंद्रकांत बलभीम बिरादार
अतिथि अध्यापक
सरकारी प्रथम श्रेणी महाविद्यालय कमलापुर 
जिला कलबुरगि राज्य कर्नाटक
9739930881

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