काव्य धारा

अभागी उर्मिला
जाने क्यों मेरा नाम, रखा गया उर्मिला
जीवन तो सुख दुःख है पर, मुझको केवल दुःख ही मिला
अब क्या करू मैं, किसी से अपना गिला
मेरा भाग्य विधाता ही, मेरा दुश्मन हो चला
बिना अपराध के क्यों चला, ये दण्ड का सिलसिला
14 वर्ष की अग्नि में तो, मेरा सारा जीवन जला
ऐसा दुःख दुनिया में, कौन सह पाएगा भला
देखो मेरे प्राण नाथ को, मुझे अकेली छोड़ राम के साथ चला
पूछती हूँ विधाता से क्यों, मेरी आँखों में आँसू दिए
अब तुम ही बताओ भगवन, बिना लक्ष्मण के हम कैसे जिये
कांटों से भी अभागी हूँ मैं, जिसे हाथों से हटाते हो
सीताराम के कष्टों को तुम, जल्दी से मिटाते हो
मेरे लिए पल भर न तरसे, सेवा में अपने-आपको जुटाते हो
ऐसा क्या पाप किया मैंने, जो मेरा प्यार घटाते हो
अयोध्या की रानी हूँ मैं, पर विधवा जैसी जीति हूँ
तुम्हारी यादो में साजन, पल-पल मैं जहर पीति हूँ
हर एक चीज है यहाँ, पर तुम्हारा प्यार नहीं
साँसे तो चल रही है मेरी, उसमें सुख संसार नहीं
कैसी माझी हूँ मैं, जिसका कोई पतवार नहीं
शायद मुझ जैसी दुनिया में, कोई और लाचार नहीं
सौभाग्यशाली है वो हवाएं, जो तुम्हे छूकर चलती हैं।
देखा मुझ अबला को, जो तुम्हारी राह में हाथ मलती हैं।
जुदाई की ये ज्वाला, दिन-रात देह में जलती है।
तुम्हारे आने की आस, मेरी आँखो में हर पल पलती हैं।
जाने से पहले एक बार तो बताते, तुम्हारे चरणों की धूल तो ले लेते
अपने प्राणेश्वर का वरदान समझ, माथे से लगा लेती
डॉ. मंजू
सह प्राध्यापिका
गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज
हयात नगर रंगा रेड्डी
Email.manjuteacher1983@gmail.com
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