Wednesday, July 6

मैं नारी हूँ… - पी. लावण्या (काव्य धारा)

काव्य धारा


मैं नारी हूँ…


मैं नारी हूँ, ईश्वर का वरदान हूँ,

इस सृष्टि का सम्मान भी हूँ|

मैं फूलों सी कोमल हृदयी हूँ,

कभी- कभी पत्थर सी कठोर भी हूँ|

मैं ममता, प्रेम, दया की कहानी हूँ,

करुणा का इतिहास भी हूँ|

मैं क्षमा और सहनशीलता की मूर्ति हूँ,

अखंड हिमालय सी अटल भी हूँ|

मैं अपने अस्तित्व बनाये रखने की हकदारी हूँ,

जिद पर आगयी तो प्रतिज्ञा का प्रतीक भी हूँ|

मैं माँ, बेटी ,बहन ,पत्नी और सहेली आदि बन सकती हूँ,

प्यार और स्नेह की प्रतिमूर्ति भी हूँ|

मैं नव समाज के निर्माण में भागीदारी हूँ,

टीचर, डाक्टर, पैलट आदि सौ-सौ अवतारधारी भी हूँ|

मैं ममतामयी कृति हूँ,

वात्सल्य दीप की ज्योति भी हूँ|

मैं बिना रुके, थके वक्त के साथ आगे बढने वाली हूँ,

सभी को मिलाकर बहनेवाली नदी भी हूँ|

मैं विधाता की सुंदर अद्भुत सृष्टि हूँ, मैं नारी हूँ, मैं नारी हूँ|



पी. लावण्या

शिक्षिका 

एम. जे. पी. टी. बी. सी. डब्ल. आर. ई. ऐ. एस गुरुकुल 

8499030188

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