काव्य धारा

मैं नारी हूँ…
मैं नारी हूँ, ईश्वर का वरदान हूँ,
इस सृष्टि का सम्मान भी हूँ|
मैं फूलों सी कोमल हृदयी हूँ,
कभी- कभी पत्थर सी कठोर भी हूँ|
मैं ममता, प्रेम, दया की कहानी हूँ,
करुणा का इतिहास भी हूँ|
मैं क्षमा और सहनशीलता की मूर्ति हूँ,
अखंड हिमालय सी अटल भी हूँ|
मैं अपने अस्तित्व बनाये रखने की हकदारी हूँ,
जिद पर आगयी तो प्रतिज्ञा का प्रतीक भी हूँ|
मैं माँ, बेटी ,बहन ,पत्नी और सहेली आदि बन सकती हूँ,
प्यार और स्नेह की प्रतिमूर्ति भी हूँ|
मैं नव समाज के निर्माण में भागीदारी हूँ,
टीचर, डाक्टर, पैलट आदि सौ-सौ अवतारधारी भी हूँ|
मैं ममतामयी कृति हूँ,
वात्सल्य दीप की ज्योति भी हूँ|
मैं बिना रुके, थके वक्त के साथ आगे बढने वाली हूँ,
सभी को मिलाकर बहनेवाली नदी भी हूँ|
मैं विधाता की सुंदर अद्भुत सृष्टि हूँ, मैं नारी हूँ, मैं नारी हूँ|
पी. लावण्या
शिक्षिका
एम. जे. पी. टी. बी. सी. डब्ल. आर. ई. ऐ. एस गुरुकुल


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