काव्य धारा

अब नहीं लगता है डर
धूल, मिट्टी और कणों से,
विस्फोटक पदार्थ और परमाणु बमों से,
आदी हो चुका हूँ मैं,
इस तरह की जिंदगी जीने को।
कब क्या घटित ही जाए यहाँ…?
नहीं रहती जानकारी किसी को
चलती तो हैं सुइयाँ कालचक्र की
मगर, बहुत कुछ रह गया है पीछे।
फिर भी चलते रहना है साथ समय के
पूरा करना ही है पड़ाव ज़िन्दगी का।
पल, प्रतिपल जीना है हर हाल में
सबके साथ…, सबके बीच…
और बाँध देना है पुल,
पार करने को सफर ज़िन्दगी का।
क्योंकि जान चुका हूँ मैं जीने का मतलब,
नष्ट होती संस्कृति और
प्रकृति के विरुद्ध हो रहे षड्यंत्र
सभ्यताओं के अनुगमन हो रहे कारणों को…।
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