भारतीय साहित्य विविध स्वर
है हृदय-रक्त की बात दूर, पन्नग सहता स्पर्श नहीं,
नहीं फणी बस, पन्नगारि भी सुन लो भारतवर्ष यही,
अगर समझता शान्ति-बीन पर रहे नाचता, दिवास्वप्न है,
देने को संदेश यही तो पोखरण का वह प्रयत्न है।
नहीं चाहते हम रुक जाये वीणा की झंकार कभी,
नहीं चाहते शान्ति-सिन्धु में उठे अकारण ज्वार कभी,
घुसपैठों की डाल मथानी किन्तु मथे यदि सागर को,
भूल जाय फिर 'भू' अमृत पर भूले मत भीषण गर को।
जला नहीं ज्वाला से दानव क्योंकि बली नृप दानी था,
पर 'भू' हित जलने वाला वह नहीं मात्र अभिमानी था;
किन्तु दान का बल खोकर यदि दानव-बल वह दिखलाता,
होते कैसे नष्ट-भ्रष्ट वे यही पोखरण बतलाता।
डॉ॰ बुद्धदेव विभाकर
9934704478


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