Monday, July 4

मैं लिखता चला - कमलेकर नागेश्वर राव 'कमल' (काव्य धारा)

काव्य धारा


मैं लिखता चला


मैं लिखता चला,
आज मैं लिखता चला
बचपन में माॅं को खोकर
माॅं का प्यार न पाकर
कितना रोया, कितना रोया
आज मैं माॅं के तस्वीर के सामने
दीप बनकर हाथ जोड़ रहा
माॅं की ममता के तड़प में
ऑंसू बहाते हुए 
मॉं के चरणों में .......
मैं लिखता चला,
आज मैं लिखता चला ।

मेरे उज्ज्वल भविष्य की आशा
उन अंधेरी रातों में बिन सोये
सपनों की रचना में लग्न पिता की ऑंखें 
आज भी याद है, आज भी  याद है
जो मंजिल है  आज खड़ा मेरा
बुनियादी थके हुए पैरों पर 
मैं लिखता चला,
आज मैं लिखता चला।

सभी कहे  ये कहॉं आगे बढ़े
समय था सहने की
आया जिंदगी में सूरज की रोशनी
अब खिलने लगे
कविता के फूल "कमल" बनकर
जो मुझे साथ दिये,
जो मुझे हाथ दिये 
सभी की याद में
मैं लिखता चला,
आज मैं लिखता चला।



कमलेकर नागेश्वर राव 'कमल'
98484 93223

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